Aadhaar Card vs Voter ID: क्या आधार कार्ड हो तो घुसपैठियों को भी वोटर मान लें? सुप्रीम कोर्ट का गंभीर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड सरकारी सुविधाओं का जरिया हो सकता है, लेकिन यह नागरिकता या वोट देने के अधिकार का पक्का सबूत नहीं है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या पड़ोसी देशों से आए लोग सिर्फ आधार के दम पर वोटर लिस्ट में शामिल हो सकते हैं?

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड27 Nov 2025, 05:33 PM IST
CJI सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची।
CJI सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची। (Mint)

Supreme Court News in Hindi: देश के कई राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रही सियासी रस्साकशी के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने बुधवार को साफ शब्दों में कहा कि आधार कार्ड का मकसद सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंचाना है। प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि आधार एक विशेष कानून के तहत बना दस्तावेज है, जो आपको राशन या सब्सिडी दिला सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि यह आपको देश की सरकार चुनने का 'वोटिंग अधिकार' भी दे दे।

विदेशियों को राशन मिले, लेकिन क्या वोट का अधिकार भी दिया जाएगा?

सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्य कांत ने एक बहुत ही व्यावहारिक उदाहरण देते हुए स्थिति को स्पष्ट किया। उन्होंने पूछा, 'मान लीजिए कोई व्यक्ति पड़ोसी देश से भारत आता है, यहां रिक्शा चलाता है या मजदूरी करता है। हमारी 'संवैधानिक नैतिकता' कहती है कि उसे भूखा न रहने दिया जाए, इसलिए उसे आधार कार्ड देकर सस्ता राशन मुहैया कराया जा सकता है। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि सिर्फ इस सुविधा के आधार पर उसे भारत का वोटर भी बना दिया जाए?' कोर्ट का यह सवाल सीधे तौर पर आधार और नागरिकता के बीच की लकीर को गहरा करता है।

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मतदाताओं पर नहीं पड़े नागरिकता साबित करने का बोझ: सिब्बल

दूसरी तरफ, पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्यों की पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट में आम आदमी की दुश्वारियों का मुद्दा उठाया। उनका तर्क था कि देश में बहुत से वोटर अनपढ़ हैं। अगर किसी के पास आधार कार्ड है, तो यह मान लेना चाहिए कि वह यहां का निवासी है। सिब्बल ने कहा, 'अगर आप किसी का नाम वोटर लिस्ट से हटाते हैं, तो नागरिकता साबित करने का बोझ मतदाता पर नहीं होना चाहिए। यह प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए, न कि ऐसी जिससे गरीब आदमी सिस्टम के जाल में फंस जाए।'

सिब्बल ने दलील दी, 'एक धारणा और खुद का घोषणापत्र होता है कि 'मैं एक नागरिक हूं, मैं यहीं रहता हूं और मेरे पास आधार कार्ड है जो मेरे पते का सबूत है।' अगर आप यह अधिकार छीनना चाहते हैं, तो यह एक तय प्रक्रिया के तहत ही होना चाहिए। और वह प्रक्रिया अदालत के सामने सही साबित होनी चाहिए।'

सिब्बल ने कहा कि वे चुनाव आयोग की शक्तियों को चुनौती नहीं दे रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘मेरा जोर सिर्फ प्रक्रिया पर है, जो समावेशी होनी चाहिए। अपनी बात साबित करने का पूरा बोझ वोटर पर डाल देना हमारी आजादी से पहले की संवैधानिक संस्कृति और परंपरा के खिलाफ है।’

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बिहार के उदाहरण से सीजेआई ने सिब्बल को समझाया

कपिल सिब्बल ने जब यह चिंता जताई कि अगर किसी का नाम लिस्ट से कट गया तो उसे पता कैसे चलेगा, तो सीजेआई ने बिहार के पुनरीक्षण (SIR) का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि बिहार में बहुत कम शिकायतें आई थीं। उन्होंने कहा कि मीडिया को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए। बिहार में मीडिया ने हर दिन रिपोर्टिंग की, जिससे सुदूर गांवों में बैठे लोगों को भी पता चला कि वोटर लिस्ट अपडेट हो रही है। कोर्ट ने कहा कि अगर प्रक्रिया पारदर्शी हो और लोगों को जानकारी मिले, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उन्हें मौका नहीं दिया गया। सीजेआई ने कहा, 'अगर ऐसा कोई मामला है जहां किसी असली निवासी या भारतीय नागरिक का नाम लिस्ट से हटा दिया गया है, तो हम ऐसे मामलों की बेसब्री से तलाश कर रहे हैं, ताकि हम प्रक्रिया की खामियों को सुधार सकें।'

डुप्लिकेट और मृतक वोटरों के मुद्दे पर भी हुई बहस

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय की पीठ में शामिल जस्टिस जॉयमाला बागची ने वोटर लिस्ट से 'फर्जी' और 'मृत' वोटरों को हटाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, 'हम किसी निर्वात में फैसला नहीं ले रहे। हकीकत यह है कि जो राजनीतिक दल ताकतवर होता है, वह अक्सर 'मृत मतदाताओं' के नाम का इस्तेमाल अपने पक्ष में वोट डलवाने के लिए करता है।'

बीएलओ की भूमिका पर सिब्बल का सवाल और जज का जवाब

दरअसल, कपिल सिब्बल का जोर इस बात पर था कि अब डुप्लीकेट वोटरों की पहचान करने और उन्हें हटाने के लिए सॉफ्टवेयर मौजूद है, इसलिए बूथ लेवल अफसरों (BLO) को नाम काटने का इतना अधिकार देने की जरूरत नहीं है। इस पर जस्टिस बागची ने कहा, 'सॉफ्टवेयर सिर्फ डुप्लिकेट नाम हटा सकता है, मरे हुए लोगों के नाम नहीं।'

बीएलओ के सर्वे में होने वाली गलतियों की दलील पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा, 'ऐसा नहीं है कि सर्वे हमेशा 100 फीसदी सही ही होता है। इसीलिए ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी की जाती है। अगर उस लिस्ट में कोई गलती हो, जैसे किसी जीवित व्यक्ति को गलत तरीके से मृत दिखा दिया गया हो, तो उसे ठीक किया जा सके। इसीलिए हमने आदेश दिया था कि मृत या जगह बदल चुके लोगों की सूची सिर्फ वेबसाइट पर ही नहीं, बल्कि पंचायतों और अन्य सार्वजनिक जगहों पर भी लगाई जाए।'

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तीन राज्यों ने SIR को सुप्रीम कोर्ट में दी है चुनौती

कोर्ट ने पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में चल रहे एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर याचिकाकर्ता कोई ठोस कारण बताते हैं, तो कोर्ट चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट की समय सीमा बढ़ाने का निर्देश दे सकता है। फिलहाल, केरल मामले की सुनवाई 2 दिसंबर, तमिलनाडु की 4 दिसंबर और पश्चिम बंगाल की 9 दिसंबर को तय की गई है।

चुनाव आयोग का दावा- काम लगभग पूरा, कोई दिक्कत नहीं

दूसरी ओर, चुनाव आयोग की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि प्रक्रिया में कोई बाधा नहीं है। उन्होंने बताया कि 99% मतदाताओं को फॉर्म बांटे जा चुके हैं और 50% से ज्यादा डेटा डिजिटाइज हो चुका है। राज्य चुनाव आयोग और केंद्रीय चुनाव आयोग मिलकर काम कर रहे हैं और स्थानीय निकायों के चुनाव या अन्य लॉजिस्टिक मुद्दों से इस काम पर कोई असर नहीं पड़ रहा है।

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