Ram Sutar Passes away: देश को अपनी मूर्तियों के जरिए पहचान देने वाले प्रख्यात मूर्तिकार राम सुतार अब हमारे बीच नहीं रहे। बुधवार देर रात उन्होंने नोएडा स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। वे 100 वर्ष के थे और कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे।
बेटे ने दी निधन की जानकारी
राम सुतार के पुत्र अनिल सुतार ने अपने पिता के निधन की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि देर रात नोएडा स्थित घर पर उन्होंने अंतिम सांस ली। गुरुवार दोपहर नोएडा के सेक्टर 94 स्थित श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार किया गया, जहां बेटे ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस दौरान कई कलाकार, प्रशंसक और गणमान्य लोग मौजूद रहे। उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित कई नेताओं ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया।
निधन की सूचना मिलते ही सुबह से ही नोएडा सेक्टर 19 स्थित उनके आवास पर श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लग गया। राजनीतिक दलों के नेता, शहर के लोग और कला प्रेमी बड़ी संख्या में पहुंचे और महान शिल्पकार को अंतिम विदाई दी।
स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से संसद परिसर तक उनकी अमर कृतियां
प्रख्यात मूर्तिकार सुतार का निधन कला जगत के लिए बड़ी क्षति है। उनकी पहचान सिर्फ एक कलाकार के तौर पर नहीं, बल्कि राष्ट्र की स्मृतियों को आकार देने वाले शिल्पकार के रूप में थी। उनकी कला ने देश को दुनिया में अलग मुकाम दिलाया। दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमाओं में शामिल गुजरात के केवड़िया में नर्मदा नदी किनारे स्थित 182 मीटर ऊंची सरदार पटेल की प्रतिमा 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' का डिजाइन उन्होंने ही तैयार किया था जिसने भारतीय शिल्प को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई। संसद परिसर में ध्यान में बैठे हुए महात्मा गांधी और घोड़े पर सवार छत्रपति शिवाजी की प्रतिमाएं भी उन्होंने ही बनाई हैं।
गोंदुर गांव से विश्व मंच तक
19 फरवरी 1925 को महाराष्ट्र के धुले जिले के गोंदुर गांव में जन्मे राम सुतार ने बचपन में ही मूर्तिकला का रास्ता चुन लिया था। उन्होंने अपने गुरु श्रीराम कृष्ण जोशी से शुरुआती शिक्षा ली और फिर मुंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से औपचारिक प्रशिक्षण लेकर ‘आर्ट एंड आर्किटेक्चर’ में गोल्ड मेडल हासिल किया। वर्ष 1959 में उन्होंने दिल्ली में सूचना एवं दूरसंचार मंत्रालय से अपने जीवन के नए करियर की शुरुआत की लेकिन कुछ ही वर्ष बाद उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर पूर्ण रूप से मूर्तिकार की राह चुन ली। इसके बाद दिल्ली में अपना स्वतंत्र मूर्तिकला स्टूडियो स्थापित कर उन्होंने कई ऐतिहासिक प्रतिमाओं तथा कला कृतियों को भव्य आकार दिया।
सम्मान जो उनके कद को बयां करते हैं
उनके योगदान के लिए उन्हें 1999 में पद्म श्री और 2016 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। हाल ही में उन्हें महाराष्ट्र भूषण सम्मान भी दिया गया, जिसे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अस्पताल जाकर प्रदान किया था।