Iran War News: दुनिया के सबसे जरूरी समुद्री रास्ते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर संकट गहराता ही जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से इसे तुरंत खोलने की मांग की है। यह रास्ता बंद होने का मतलब है आपकी जेब पर सीधा असर, क्योंकि दुनिया का 25% समुद्री तेल यहीं से गुजरता है। तेल सप्लाई रुकने से पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे हर किसी का बजट बिगड़ सकता है।
तेल सप्लाई का सबसे बड़ा चोक पॉइंट
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से बहुत खास है। यह उत्तर में ईरान और दक्षिण में ओमान के बीच स्थित है। इसकी चौड़ाई केवल 53 किलोमीटर है। 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, यहां से हर दिन 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स गुजरते हैं। ग्लोबल मार्केट में बिकने वाले समुद्री तेल का यह कुल 25% हिस्सा है।
पहला रास्ता: युद्धविराम और टोल टैक्स
पहला विकल्प यह है कि ईरान ट्रंप की मांग मान ले और युद्धविराम हो जाए। ऐसी स्थिति में ईरान इस रास्ते पर अपना कंट्रोल रखेगा। ऐसी खबरें हैं कि पिछले कुछ हफ्तों में ईरान ने कुछ जहाजों से निकलने के बदले पैसे वसूले हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कानून शांति के समय टोल टैक्स की इजाजत नहीं देते, लेकिन युद्ध के बाद ईरान इसे जारी रखने की कोशिश कर सकता है। इससे खाड़ी देशों से आने वाले तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।
दूसरा रास्ता: अमेरिकी सेना की सीधी कार्रवाई
दूसरा विकल्प यह है कि अमेरिका हवाई और मिसाइल हमलों के बजाय जमीन पर सेना उतारे। खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के लगभग 50,000 सैनिक मौजूद हैं। चर्चा यह भी है कि अमेरिका ईरान के खार्ग आइलैंड पर कब्जा कर सकता है, जहां से ईरान का 90% तेल एक्सपोर्ट होता है। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप सहयोगियों के बिना यह जोखिम उठाने के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं।
तीसरा रास्ता: संयुक्त राष्ट्र का हस्तक्षेप
तीसरा विकल्प यह है कि युद्ध खत्म हो जाए लेकिन रास्ता फिर भी असुरक्षित रहे। ऐसी स्थिति में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) दखल दे सकती है। 11 मार्च को इसके लिए एक प्रस्ताव (Resolution 2817) भी अपनाया गया है। इसके तहत ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, चीन और अन्य देश मिलकर एक नेवल गठबंधन बना सकते हैं, जो जहाजों को सुरक्षा के बीच इस रास्ते से बाहर निकालेगा।
क्या अब सब पहले जैसा होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में स्थिति पहले जैसी नहीं रहेगी। अगर शांति समझौता हो भी जाता है, तो भी भौगोलिक स्थिति के कारण ईरान के पास इस रास्ते को कंट्रोल करने की ताकत बनी रहेगी। दुनिया को अब इसी नई हकीकत के साथ रहना होगा।