
US and Iran Relations Timeline: अमेरिका और ईरान- कभी हथियारों और तेल के कारण एक-दूसरे के करीब रहे ये दोनों देश, 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद कट्टर दुश्मन बन गए। बंधक संकट से लेकर परमाणु हथियारों और छद्म युद्धों तक, ईरान पिछले 75 वर्षों से अमेरिकी राष्ट्रपतियों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। यही वजह है कि वाशिंगटन ने अपने कुछ सबसे जोखिम भरे अंतरराष्ट्रीय अभियान ईरान के खिलाफ संचालित किए। यहां दोनों देशों के उतार-चढ़ाव भरे रिश्तों का इतिहास दिया गया है।
1953: वाशिंगटन को डर था कि ईरान के अस्थिर स्वभाव वाले प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेघ इस तेल-समृद्ध देश को आर्थिक बर्बादी और सोवियत संघ (रूस) की गोद में ले जा रहे थे। तब राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर ने सीआईए (CIA) को उन्हें सत्ता से बेदखल करने की मंजूरी दी।
1953 से 1979: इस तख्तापलट ने फारसी शाही शासक शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को शक्तिशाली बना दिया। इसके साथ ही ईरानी तेल के बदले अमेरिकी हथियारों के व्यापार का एक ऐसा दौर शुरू हुआ जो दशकों तक चला। शाह दुनिया के उन गिने-चुने नेताओं में शामिल हो गए जिनका लगातार सात अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने व्हाइट हाउस में गर्मजोशी से स्वागत किया।
1979: ईरान पर अमेरिका का प्रभाव तब पूरी तरह खत्म हो गया जब शाह को देश छोड़कर भागना पड़ा। ईरान की जनता इस्लाम की भावना से ओतप्रोत थी और शाह द्वारा अपनी निजी संपत्ति बढ़ाने के रवैये से तंग आ चुकी थी। इसी समय निर्वासन में रह रहे शिया मुस्लिम धर्मगुरु आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी सत्ता संभालने के लिए तैयार थे, जिन्होंने शाह के अमेरिका समर्थित शासन का हमेशा विरोध किया था।
इस्लामी क्रांति के लगभग 10 महीने बाद, हजारों ईरानी छात्रों ने अमेरिकी दूतावास पर हमला कर दिया और अमेरिकी राजदूत सहित दर्जनों लोगों को बंधक बना लिया।
1980: बंधकों को छुड़ाने के लिए अमेरिका ने एक गुप्त सैन्य मिशन चलाया जो नाकाम रहा और इसमें आठ अमेरिकी सैनिक मारे गए। इस विफलता का असर यह हुआ कि राष्ट्रपति जिमी कार्टर चुनाव हार गए और रोनाल्ड रीगन की भारी जीत हुई।
1981: रोनाल्ड रीगन के राष्ट्रपति पद की शपथ लेते ही तेहरान ने कुछ ही मिनटों के भीतर सभी 52 अमेरिकी बंधकों को रिहा कर दिया।
1983: बेरूत में अमेरिकी सैन्य बैरक पर एक भीषण हमला हुआ जिसका आरोप ईरानी समर्थित गुर्गों पर लगा। इस हमले में 241 अमेरिकी सैनिक मारे गए, जो द्वितीय विश्व युद्ध में 'इवो जिमा' की लड़ाई के बाद अमेरिकी सेना के लिए एक ही दिन में होने वाला सबसे बड़ा जानी नुकसान था।
1981 से 1986: इसे 'ईरान-कॉन्ट्र्रा' मामले के रूप में जाना गया, जो रीगन के कार्यकाल का सबसे बड़ा घोटाला था। रीगन ने ईरान समर्थित समूह हिज्बुल्लाह द्वारा पकड़े गए बंधकों को छुड़ाने के लिए तेहरान को गुप्त रूप से टैंक-रोधी और विमान-रोधी मिसाइलें बेचीं। इस सौदे से मिले पैसे को चोरी-छिपे निकारागुआ के कम्युनिस्ट विरोधी विद्रोहियों (कॉन्ट्रा) की मदद के लिए भेजा गया।
1989: जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश के राष्ट्रपति काल के दौरान, खुमैनी ने लेखक सलमान रुश्दी के खिलाफ 'फतवा' (मौत की सजा) जारी कर पूरी दुनिया को हिला दिया।
1990: पड़ोसी देश इराक के साथ 10 साल तक चले युद्ध से पस्त ईरान ने बुश के लिए तब कोई बड़ी मुश्किल खड़ी नहीं की, जब उन्होंने पहला खाड़ी युद्ध शुरू किया।
1995: राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने ईरान के खिलाफ सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए और अमेरिकी कंपनियों को वहां पेट्रोलियम संसाधनों के विकास से रोकने का आदेश दिया। उन्होंने सेकंड्री सेंक्शंस की शुरुआत की ताकि गैर-अमेरिकी कंपनियां भी ईरान के साथ व्यापार न कर सकें, जिससे यूरोपीय देश काफी नाराज हुए।
2001: अमेरिका पर अल-कायदा द्वारा किए गए 9/11 हमलों का ईरान से कोई संबंध नहीं था। असल में, तत्कालीन ईरानी राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी ने निर्दोष अमेरिकियों की मौत की कड़ी निंदा की थी।
2002: राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने इराक और उत्तर कोरिया के साथ ईरान को भी एक्सिस ऑफ इविल का हिस्सा बताया। इसी दौरान सबूत मिले कि तेहरान दो गुप्त परमाणु केंद्र बना रहा है। इस जानकारी ने ईरान के प्रति अमेरिका की चिंता को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया, जो आज भी वाशिंगटन की सोच पर हावी है।
2009: बराक ओबामा ने ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के साथ बातचीत की कोशिश शुरू की, जो अंततः बेनतीजा रही। उनके प्रशासन ने 'स्टक्सनेट' (Stuxnet) नाम का एक साइबर हमला तेज किया, जिसका मकसद कंप्यूटर वायरस के जरिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम के सेंट्रीफ्यूज को नष्ट करना था। ओबामा ने ईरान के तेल निर्यात पर भी कड़े प्रतिबंध लगाए, जिससे वहां जनता में भारी असंतोष पैदा हुआ।
2015: ईरान ओबामा के 'परमाणु समझौते' (JCPOA) पर राजी हो गया। इसके तहत ईरान को अपना परमाणु ढांचा नष्ट करना था और अंतरराष्ट्रीय जांच की अनुमति देनी थी, जिसके बदले में अमेरिका ने ईरान की जमी हुई लगभग 100 अरब डॉलर की संपत्ति को मुक्त किया।
2018: डोनाल्ड ट्रंप ने इस परमाणु समझौते को रद्द कर दिया और ईरान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह तोड़ने के इरादे से उसके तेल निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
2020: ट्रंप के निर्देश पर बगदाद में एक कार पर मिसाइल हमला किया गया, जिसमें मेजर जनरल कासिम सुलेमानी मारे गए। सुलेमानी 1979 की क्रांति के बाद ईरान के सबसे शक्तिशाली सैन्य नेता थे और मध्य पूर्व में ईरान के गुप्त अभियानों के मास्टरमाइंड माने जाते थे।
2023: हमास द्वारा इजरायल पर किए गए हमले ने फिर साबित किया कि ईरानी समर्थन अमेरिकी सहयोगियों के लिए कितनी बड़ी मुसीबत है। इसके बाद जो बाइडन ने मध्य पूर्व में सैन्य सुरक्षा बढ़ा दी। ईरान समर्थित गुटों ने इराक और सीरिया में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया, जिसके जवाब में अगले वर्ष बाइडन ने हूतियों के समुद्री हमलों को रोकने के लिए 20 से अधिक देशों का गठबंधन बनाया।
2025: दोबारा चुने जाने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने गाजा, लेबनान, सीरिया और यमन में ईरानी समर्थित समूहों के खिलाफ इजरायल के हमलों का खुलकर समर्थन किया। बाद में उन्होंने ईरान की भूमिगत परमाणु सुविधाओं पर बी-2 स्टील्थ बमवर्षक विमानों से हमले का आदेश दिया। ट्रंप ने दावा किया कि तीन प्रमुख केंद्रों पर ईरान की परमाणु क्षमता पूरी तरह नष्ट कर दी गई है।
2026: इजरायल के समर्थन के साथ ट्रंप ने ईरान पर नया हमला बोला और कहा कि वहां की 8.8 करोड़ जनता को सरकार बदलने के इस मौके का फायदा उठाना चाहिए। ट्रंप ने कहा, 'इतिहास में कोई भी राष्ट्रपति वह करने को तैयार नहीं था, जो मैं करने के लिए तैयार हूं।'
(WSJ की रिपोर्ट से साभार)
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