Shabrimala Temple : क्या गैर-भक्त भी मंदिर की परंपरा को चुनौती दे सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट का गंभीर सवाल

sabarimala Case Supreme Court Updates : सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा है कि क्या भगवान अयप्पा के गैर-भक्त जनहित याचिका के जरिए शबरिमला मंदिर की परंपराओं को चुनौती दे सकते हैं? 9 जजों की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है।

Naveen Kumar Pandey
पब्लिश्ड8 Apr 2026, 09:58 PM IST
शरबरिमला केस में सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की पीठ कर रही है सुनवाई।
शरबरिमला केस में सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की पीठ कर रही है सुनवाई।

sabarimala Case : सुप्रीम कोर्ट ने शबरिमला मंदिर मामले में एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। कोर्ट यह समझना चाहता है कि जो लोग किसी खास भगवान या मंदिर में आस्था नहीं रखते, क्या वे भी वहां की धार्मिक रीतियों में दखल दे सकते हैं? ध्यान रहे, इस संबंध में उच्चतम न्यायालय का फैसला देश के हर नागरिक के धार्मिक अधिकारों और कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दाखिल करने के नियमों को प्रभावित करेगा, इसलिए इसका सीधा असर आपकी धार्मिक आजादी और कानूनी अधिकारों पर पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट का केंद्र से तीखा सवाल

उच्चतम न्यायालय की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने बुधवार को केंद्र सरकार से पूछा कि जो लोग भगवान अयप्पा के भक्त नहीं हैं, वे केरल के शबरिमला मंदिर की परंपराओं के खिलाफ कोर्ट कैसे आ सकते हैं? प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली यह बेंच महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर विचार कर रही है। कोर्ट ने कुल सात सवाल तय किए हैं, जिनमें से एक यह है कि क्या कोई बाहरी व्यक्ति किसी धार्मिक समूह की प्रथा पर जनहित याचिका (PIL) दायर कर सवाल उठा सकता है?

आपने जो दलील दी है, उससे यह स्पष्ट होता है कि मूल याचिकाकर्ता (अयप्पा के) भक्त नहीं हैं। किसी भी श्रद्धालु ने इस न्यायालय में इसे चुनौती नहीं दी है। तो फिर, वे याचिकाकर्ता कौन हैं जो इसे चुनौती दे रहे हैं?- जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जज, सुप्रीम कोर्ट

याचिकाकर्ताओं की पहचान पर चर्चा

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि शबरिमला मामले में मूल याचिकाकर्ता कौन है? उन्होंने साफ शब्दों में कहा, 'आपके तर्कों से स्पष्ट है कि मूल याचिकाकर्ता भक्त नहीं हैं। किसी भी श्रद्धालु ने कोर्ट में चुनौती नहीं दी है।' इस पर तुषार मेहता ने बताया कि याचिकाकर्ता 'इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन' नामक वकीलों का एक संगठन है।

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इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन को जानिए
(Notebook LM)

गैर-श्रद्धालु और कानूनी अधिकार

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने स्पष्टता मांगते हुए कहा कि अगर किसी व्यक्ति का उस मंदिर से कोई संबंध ही नहीं है, तो क्या कोर्ट उसकी याचिका पर विचार कर सकता है? उन्होंने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी मुकदमे का ठोस आधार या संबंध सिद्ध नहीं होता, तो उसे खारिज कर दिया जाना चाहिए। प्रधान न्यायाधीश ने ऐसे याचिकाकर्ताओं को न्यायिक प्रणाली का 'अदृश्य पीड़ित' कहा।

विशेषताइंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशनबंधुआ मुक्ति मोर्चा केस
मुख्य मुद्दाधार्मिक स्थलों पर लिंग आधारित भेदभावबंधुआ मजदूरी और मानवाधिकार उल्लंघन
प्रासंगिकताशबरिमला केस की शुरुआत करने वाला समूहभारत में जनहित याचिका (PIL) की नींव
कोर्ट का सवालक्या गैर-भक्त याचिका डाल सकते हैं?क्या तीसरा पक्ष वंचितों के लिए लड़ सकता है?

जनहित याचिका का दुरुपयोग या अधिकार?

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसे 'मौन बहुमत' और 'मुखर अल्पसंख्यक' के बीच की लड़ाई बताया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में ई-फाइलिंग और विधिक सेवा प्राधिकरण जैसी सुविधाएं मौजूद हैं, जिससे कोई भी पीड़ित खुद कोर्ट तक पहुंच सकता है। मेहता ने सवाल उठाया, 'फिर ऐसी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई क्यों की जानी चाहिए? हम जानते हैं कि आज कई जनहित याचिकाएं प्रायोजित होती हैं, जिनके पीछे कोई और होता है।'

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जनहित याचिका का इतिहास।
(Notebook LM)
नौ-सदस्यीय पीठ विरले गठित होती है। जनहित याचिका के अधिकार क्षेत्र की शुरुआत 'बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ' मामले में उस समय हुई थी, जब लोगों के पास अदालत तक पहुंचने का कोई साधन नहीं था। मैंने अपने लिखित निवेदनों में यह बताया है कि आज न्यायिक प्रणाली कहीं अधिक पारदर्शी हो गई है। ई-फाइलिंग के माध्यम से अब एक पत्र भी अदालत तक पहुंच सकता है।- तुषार मेहता, सॉलिसिटर जनरल

शबरिमला मामले का पुराना इतिहास

यह मामला सितंबर, 2018 के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें पांच जजों की बेंच ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा दिया था। इसके बाद नवंबर, 2019 में तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की पीठ ने पूजा स्थलों पर भेदभाव के व्यापक मुद्दों को 9 जजों की एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया था, जिसकी सुनवाई अब चल रही है।

शबरिमला केस में संवैधानिक पीठ के ये नौ जज

पीठ में प्रधान न्यायाधीश के अलावा न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

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