
sabarimala Case : सुप्रीम कोर्ट ने शबरिमला मंदिर मामले में एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। कोर्ट यह समझना चाहता है कि जो लोग किसी खास भगवान या मंदिर में आस्था नहीं रखते, क्या वे भी वहां की धार्मिक रीतियों में दखल दे सकते हैं? ध्यान रहे, इस संबंध में उच्चतम न्यायालय का फैसला देश के हर नागरिक के धार्मिक अधिकारों और कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दाखिल करने के नियमों को प्रभावित करेगा, इसलिए इसका सीधा असर आपकी धार्मिक आजादी और कानूनी अधिकारों पर पड़ता है।
उच्चतम न्यायालय की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने बुधवार को केंद्र सरकार से पूछा कि जो लोग भगवान अयप्पा के भक्त नहीं हैं, वे केरल के शबरिमला मंदिर की परंपराओं के खिलाफ कोर्ट कैसे आ सकते हैं? प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली यह बेंच महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर विचार कर रही है। कोर्ट ने कुल सात सवाल तय किए हैं, जिनमें से एक यह है कि क्या कोई बाहरी व्यक्ति किसी धार्मिक समूह की प्रथा पर जनहित याचिका (PIL) दायर कर सवाल उठा सकता है?
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि शबरिमला मामले में मूल याचिकाकर्ता कौन है? उन्होंने साफ शब्दों में कहा, 'आपके तर्कों से स्पष्ट है कि मूल याचिकाकर्ता भक्त नहीं हैं। किसी भी श्रद्धालु ने कोर्ट में चुनौती नहीं दी है।' इस पर तुषार मेहता ने बताया कि याचिकाकर्ता 'इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन' नामक वकीलों का एक संगठन है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने स्पष्टता मांगते हुए कहा कि अगर किसी व्यक्ति का उस मंदिर से कोई संबंध ही नहीं है, तो क्या कोर्ट उसकी याचिका पर विचार कर सकता है? उन्होंने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी मुकदमे का ठोस आधार या संबंध सिद्ध नहीं होता, तो उसे खारिज कर दिया जाना चाहिए। प्रधान न्यायाधीश ने ऐसे याचिकाकर्ताओं को न्यायिक प्रणाली का 'अदृश्य पीड़ित' कहा।
| विशेषता | इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन | बंधुआ मुक्ति मोर्चा केस |
|---|---|---|
| मुख्य मुद्दा | धार्मिक स्थलों पर लिंग आधारित भेदभाव | बंधुआ मजदूरी और मानवाधिकार उल्लंघन |
| प्रासंगिकता | शबरिमला केस की शुरुआत करने वाला समूह | भारत में जनहित याचिका (PIL) की नींव |
| कोर्ट का सवाल | क्या गैर-भक्त याचिका डाल सकते हैं? | क्या तीसरा पक्ष वंचितों के लिए लड़ सकता है? |
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसे 'मौन बहुमत' और 'मुखर अल्पसंख्यक' के बीच की लड़ाई बताया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में ई-फाइलिंग और विधिक सेवा प्राधिकरण जैसी सुविधाएं मौजूद हैं, जिससे कोई भी पीड़ित खुद कोर्ट तक पहुंच सकता है। मेहता ने सवाल उठाया, 'फिर ऐसी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई क्यों की जानी चाहिए? हम जानते हैं कि आज कई जनहित याचिकाएं प्रायोजित होती हैं, जिनके पीछे कोई और होता है।'
यह मामला सितंबर, 2018 के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें पांच जजों की बेंच ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा दिया था। इसके बाद नवंबर, 2019 में तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की पीठ ने पूजा स्थलों पर भेदभाव के व्यापक मुद्दों को 9 जजों की एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया था, जिसकी सुनवाई अब चल रही है।
पीठ में प्रधान न्यायाधीश के अलावा न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
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