सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हिंदू कानून के तहत यदि कोई महिला अपने पति की मृत्यु के बाद विधवा होती है, तब भी वह ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण का दावा कर सकती है। कोर्ट ने साफ किया कि पति की मृत्यु ससुर की मृत्यु से पहले हुई हो या बाद में यह बात भरण-पोषण के अधिकार के लिए मायने नहीं रखती।
न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की पीठ ने हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम (HAMA), 1956 की व्याख्या करते हुए कहा कि मृत हिंदू व्यक्ति के सभी उत्तराधिकारी उसकी संपत्ति से उसके आश्रितों का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य हैं। न्यायमूर्ति मिथल ने सरल शब्दों में कहा कि कानून के अनुसार जिन लोगों का भरण-पोषण करना मृत व्यक्ति की जिम्मेदारी थी, उनकी देखभाल उसकी संपत्ति से की जानी चाहिए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 21 के तहत “पुत्र की विधवा” आश्रित मानी जाती है और धारा 22 के तहत वह भरण-पोषण का दावा कर सकती है। इसका मतलब यह है कि बेटे या अन्य कानूनी वारिसों को विरासत में मिली संपत्ति से सभी आश्रितों का भरण-पोषण करना होगा।
पीठ ने आगे कहा कि यदि पुत्र की मृत्यु के बाद उसकी विधवा अपने दम पर या पति द्वारा छोड़ी गई संपत्ति से अपना भरण-पोषण नहीं कर पा रही है, तो ससुर की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह उसका खर्च उठाए। कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिससे यह जिम्मेदारी इस आधार पर खत्म हो जाए कि बहू ससुर की मृत्यु से पहले विधवा हुई या बाद में।
यह मामला महेंद्र प्रसाद नामक व्यक्ति की संपत्ति से जुड़े पारिवारिक विवाद से सामने आया। महेंद्र प्रसाद का निधन दिसंबर 2021 में हुआ था। उनके बेटे रणजीत शर्मा की मृत्यु मार्च 2023 में हुई। रणजीत की पत्नी गीता शर्मा ने अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण के लिए परिवार न्यायालय में आवेदन किया था।
परिवार न्यायालय ने पहले यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि गीता शर्मा ससुर की मृत्यु के समय विधवा नहीं थीं, इसलिए वह आश्रित नहीं मानी जा सकतीं। बाद में उच्च न्यायालय ने इस फैसले को पलट दिया। इसके बाद परिवार के अन्य सदस्यों ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अब यह अहम फैसला सुनाया है।