
प्रयागराज मेला प्राधिकरण के नोटिस पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का जवाब आ गया है। उन्होंने कहा कि किसी पीठ के शंकराचार्य अन्य तीन पीठ के शंकराचार्य से मिली मान्यता से ही तय होते हैं। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य कोई सरकार या न्यायालय नहीं तय करता है। इस मुद्दे पर राजनीति भी शुरू हो गई है। कांग्रेस की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष अजय राय ने कहा है कि अब प्रदेश की भाजपा सरकार खुद यह तय करने पर उतारू हो गई है कि जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद वास्तव में शंकराचार्य हैं या नहीं।
इधर, अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा है कि शंकराचार्य वह है जिसे बाकी अन्य तीन पीठों के शंकराचार्य मान्यता देते हैं। उन्होंने दावा किया है कि बाकी दो पीठों द्वारका पीठ और श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य उन्हे शंकराचार्य कहते हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती स्वयं को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य बताते हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा है कि पिछले माघ मेले में उन्हे साथ लेकर दोनों शंकराचार्य स्नान कर चुके हैं।
उन्होंने कहा है कि जब श्रृंगेरी और द्वारका के शंकराचार्य यह कह रहे हैं कि वह ही शंकराचार्य हैं, तो आखिर किस प्रमाण की आवश्यकता है कि हम शंकराचार्य हैं कि नहीं। उन्होंने कहा, 'क्या अब यह प्रशासन तय करेगा कि हम शंकराचार्य हैं कि नहीं। क्या उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री या भारत का राष्ट्रपति तय करेगा कि शंकराचार्य कौन है। भारत के राष्ट्रपति को भी यह अधिकार नहीं है कि वह यह तय करें कि शंकराचार्य कौन है।' आदि शंकराचार्य ने चार पीठों की स्थापना की थी- उत्तराखंड के बद्रीनाथ में ज्योतिष पीठ, गुजरात के द्वारका में शारदा पीठ, ओडिशा के पुरी में गोवर्धन पीठ और कर्नाटक के श्रृंगेरी में श्रृंगेरी पीठ।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा, 'शंकराचार्य का निर्णय शंकराचार्य करते हैं। हम निर्णीत हैं क्योंकि पुरी के शंकराचार्य ने हमारे बारे में कुछ नहीं कहा है। उन्होंने न तो यह कहा कि वह शंकराचार्य नहीं है और ना ही यह कहा कि शंकराचार्य हैं। पुरी के शंकराचार्य इस मामले में मौन हैं। इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट में भी जो हलफनामा उनकी ओर से दाखिल किया गया है, उसको लेकर यह भ्रम फैलाया गया कि उन्होंने विरोध किया है। लेकिन जब हम लोगों ने हलफनामे की उच्चतम न्यायालय से कॉपी निकाली तो उसमें यह लिखा गया है कि हमसे कोई समर्थन मांगा नहीं, इसलिए हमने समर्थन नहीं दिया है।'
अविमुक्तेश्वरानंद ने आगे कहा, 'दो शंकराचार्य का प्रत्यक्ष और लिखित एवं व्यावहारिक समर्थन मुझे प्राप्त है। इसके साथ ही तीसरे पीठ के शंकराचार्य की मौन स्वीकृति हमारे साथ है। ज्योतिष पीठ का आखिर और कौन शंकराचार्य है यह बताइए। निर्विवाद रूप से ज्योतिष पीठ के हम शंकराचार्य हैं। अगर इस पर कोई विवाद दिखता है तो इसका मतलब वह दूषित भावना वाला है।' उन्होंने चुनौती देते हुए कहा है कि अगर कोई यह कहता है कि मैं ज्योतिष पीठ पर शंकराचार्य हूं तो वह आकर मुझसे बात करे।
वहीं, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि यह न सिर्फ सनातन परंपरा का अपमान है, बल्कि धर्माचार्यों की गरिमा पर सीधा हमला भी है। एक ओर जगद्गुरु शंकराचार्य को नोटिस भेजे जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भाजपा सरकार और उसके नेता सनातन धर्म के नाम पर बड़े-बड़े भाषण देते नहीं थकते। यह साफ तौर पर सरकार की दोहरी नीति को उजागर करता है। अजय राय ने मांग की कि राज्य सरकार इस पूरे मामले पर अपना रुख स्पष्ट करे और धर्माचार्यों के सम्मान से जुड़े किसी भी कदम से पहले सनातन परंपराओं और धार्मिक मर्यादाओं का ध्यान रखे।
ध्यान रहे कि माघ मेला क्षेत्र में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर प्रयागराज मेला प्राधिकरण द्वारा जारी नोटिस में न्यायालयों के आदेशों का हवाला देते हुए शंकराचार्य पद से जुड़े विवाद का उल्लेख किया गया है और मेला क्षेत्र में किसी भी प्रकार के आयोजन, शिविर या गतिविधि को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। प्राधिकरण की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित वाद और पूर्व में पारित आदेशों के तहत विवादित विषय से जुड़े किसी भी प्रकार के आयोजन या प्रचार-प्रसार की अनुमति नहीं दी जा सकती। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया है कि आदेशों के उल्लंघन की स्थिति में विधिक कार्रवाई की जा सकती है।
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