
नेपाल में बालेंद्र शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने अपनी प्रचंड जीत के साथ उस पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावी ढंग से ध्वस्त कर दिया है, जो लंबे समय से दो पाटों में पिस रही थी। उस व्यवस्था पर एक तरफ नेपाली कांग्रेस तो दूसरी तरफ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) और उसके प्रतिद्वंद्वी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के गुटों का दबदबा था।
बालेंद्र शाह पेशे से रैपर हैं, जो अपनी लोकप्रियता और भ्रष्टाचार विरोधी सक्रियता के बल पर 2022 में काठमांडू के मेयर बने और अब नेपाल का अगले प्रधानमंत्री बनने की कतार में हैं। उनकी जीत राजनीति के अभिजात्य वर्ग के खिलाफ एक विद्रोह को दर्शाती है। आर्थिक ठहराव, भ्रष्टाचार और बुजुर्ग नेताओं के गिरोह से निराश होकर युवाओं ने एक ऐसे बदलाव का समर्थन किया, जो जवाबदेही, सुधार और एक अधिक मुखर राष्ट्रीय पहचान का वादा करती है।
इस ऐतिहासिक चुनाव के झटके ने नेपाल की घरेलू राजनीति को नया आकार देने के साथ-साथ आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक निहितार्थ भी पैदा किए हैं। अब तक नेपाल भारत और चीन के बीच एक नाजुक संतुलन बनाने की कोशिश करता रहा है, लेकिन अब यह स्वतंत्र रुख अपना सकता है। भारत को नए सिरे से नेपाली युवाओं के साथ संबंध बनाने होंगे। लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि उनके साथ वैसे ही घनिष्ठ संबंध विकसित हों जैसा कि उनके माता-पिता या दादा-दादी का भारत के साथ था।
बालेंद्र शाह की राजनीतिक बयानबाजी में अतीत में कालापानी-लिपुलेख सीमा विवाद सहित भारत की क्षेत्रीय भूमिका की आलोचना, भारत पर नेपाल की आर्थिक निर्भरता को कम करने की वकालत और 'ग्रेटर नेपाल' को दर्शाने वाले मानचित्रों के संदर्भ सहित आक्रामक राष्ट्रवादी नारे शामिल रहे हैं।
फिर भी इस तरह की बयानबाजी के बावजूद, भूगोल और अर्थशास्त्र की वास्तविकताएं नेपाल को व्यावहारिकता की ओर धकेलने पर जोर दे रही हैं। भारत-नेपाल संबंध खुली सीमाओं, व्यापार, श्रम प्रवास और घनिष्ठ सांस्कृतिक एवं पारिवारिक संबंधों के माध्यम से गहराई से जुड़े हुए हैं।
नेपाल-भारत चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष के.सी. सुनील ने कहा, 'बालेंद्र शाह और अग्रणी नेता व्यावहारिक लोग हैं और समझते हैं कि अपनी 'नेपाल फर्स्ट' की नीति को बनाए रखते हुए उन्हें भारत के साथ घनिष्ठ संबंधों की आवश्यकता है और हम संबंधों के वास्तव में मजबूत होने की उम्मीद करते हैं।'
नेपाल में सेवा दे चुके और अब नीति निर्धारण में शामिल शीर्ष भारतीय अधिकारियों ने न्यूज एजेंसी 'यूनीवार्ता' को बताया, 'बयानबाजी और शासन कला दो अलग चीजें हैं। सत्ता में आने वाला हर नेपाली नेता 'नेपाली स्वाभिमान' की बात करता है और फिर भारत के साथ व्यापार करता है। नेपाल की जमीनी हकीकत यह है कि भारत के साथ जुड़ाव दो तरफा रास्ता है जिसे आसानी से अलग नहीं किया जा सकता और न ही किया जाना चाहिए।'
भारत का नेतृत्व भी इस वास्तविकता से अवगत दिखाई देता है। उसने राजनीतिक संक्रमण पर सावधानीपूर्वक लेकिन सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावों के सफल संचालन पर नेपाली लोगों को तुरंत बधाई दी। अधिकारियों ने बताया कि 'यह संकेत था कि भारत नेपाल के नए नेतृत्व के साथ रचनात्मक रूप से जुड़ने के लिए तैयार है।'
भारतीय कूटनीतिज्ञों ने भी राजनीति के अभिजात्य वर्ग से परे अपनी पहुंच बढ़ाना शुरू कर दिया है । भारतीय अधिकारियों ने चुपचाप उन युवा राजनीतिज्ञों, नागरिक समूहों और छात्र समूहों के साथ संपर्क बनाना शुरू कर दिया है, जो बालेंद्र शाह को राजनीति के केंद्र में लाने वाले विरोध आंदोलन में शामिल थे।
नेपाल को पता है कि भारत व्यापार के अलावा उसकी अर्थव्यवस्था में इतनी गहराई से जुड़ा है कि उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। नेपाल में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का 33.5 प्रतिशत हिस्सा भारत का है, जबकि चीन का 12.5 प्रतिशत है। इसलिए दोनों देशों के बीच संबंध व्यापार, ऊर्जा सहयोग और बुनियादी ढांचे पर आधारित अधिक व्यावहारिक ढांचे की ओर विकसित हो सकते हैं।
नेपाल 1950 की शांति और मित्रता संधि में संशोधन के लिए दबाव डाल सकता है, क्योंकि नेपाल इस संधि को 'असमान' कहकर लंबे समय से आलोचना करता रहा है। हालांकि संबंध और प्रगाढ़ होंगे क्योंकि नेपाल आधुनिकीकरण और औद्योगीकरण की कोशिश कर रहा है। शाह की राष्ट्रवादी बयानबाजी के बावजूद, चीन के आर्थिक प्रभाव के भी नेपाल में आसानी से समाप्त होने की संभावना नहीं है। पिछले दशक में, चीन नेपाल के बुनियादी ढांचे में एक प्रमुख निवेशक के रूप में उभरा है, जो सड़कों, जलविद्युत संयंत्रों और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) से जुड़ी संपर्क पहलों के लिए वित्त पोषण कर रहा है।
हालांकि, बालेंद्र शाह ने रणनीतिक सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास प्रस्तावित बीआरआई औद्योगिक पार्क जैसी परियोजनाओं को लेकर चिंताएं भी जताई हैं, क्योंकि इसे नेपाल की संप्रभुता और सुरक्षा प्रभावित करने वाली परियोजना के तौर पर देखा जाता है। उन्होंने चीन और भारत के बीच व्यापार के लिए भारत द्वारा नियंत्रित लिपुलेख दर्रे के उपयोग की भी आलोचना की है तथा इस व्यवस्था को नेपाल के क्षेत्रीय दावों का उल्लंघन बताया है।
बीजिंग समर्थक पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के विपरीत, बालेंद्र शाह किसी भी बड़ी शक्ति के साथ प्रत्यक्ष रूप से झुकने के बजाय स्वतंत्र रहने के लिए दृढ़ संकल्पित दिखाई देते हैं। डेट स्टैबिलिटी (देश के राष्ट्रीय बजट का पांचवां हिस्सा ऋण चुकाने में जाता है) और चीनी फंडिंग पर निर्भरता के बारे में नेपाल के भीतर चिंताएं सार्वजनिक हैं। नतीजतन, नई सरकार कुछ परियोजनाओं पर फिर से बातचीत करने या उन्हें धीमा करने की कोशिश कर सकती है।
भारतीय राजनयिकों ने कहा, 'यदि कोई बाहरी शक्ति वर्तमान में नेपाल की उभरती राजनीति में लोकप्रिय है, तो वह अमेरिका है।' अमेरिका ने नेपाल में विभिन्न पहलों और योजनाओं में भारी निवेश किया है। आरएसपी के माध्यम से राजनीति में प्रवेश करने वाले कई कार्यकर्ताओं ने पहले पश्चिमी संस्थानों द्वारा समर्थित नागरिक समाज कार्यक्रमों के साथ बातचीत की थी।
काठमांडू के राजनीतिक हलकों में एक व्यापक, हालांकि अप्रमाणित, विश्वास यह भी है कि पश्चिमी प्रोत्साहन ने भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों को ऊर्जा देने में मदद की थी। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड में पूर्व डब्ल्यूटीओ अध्यक्ष प्रो. विश्वजीत धर ने आगाह किया, 'हालांकि, बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि बालेंद्र शाह अपनी सरकार को कैसे तैयार करते हैं। आने वाले मंत्रिमंडल में युवाओं के अधिक होने की उम्मीद है। हालांकि यह नेपाल के पुराने राजनीतिक वर्ग से एक बड़ा बदलाव है, लेकिन शासन के लिए प्रशासनिक अनुभव और नीतिगत विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।'
नेपाल के राजनयिकों, तकनीकी विशेषज्ञों और सिविल सेवकों का गहरा अनुभव संस्थागत मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है, जिससे नई सरकार स्थिरता बनाए रखते हुए सुधारों को आगे बढ़ा सकती है।
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