
भारत के कई हिस्सों में आज भी परिवार की इज्जत बेटे से जोड़ी जाती है, जबकि बेटियों को दहेज और शादी के बढ़ते खर्च की वजह से बोझ समझा जाता है। हरियाणा के जींद जिले से आया एक ताजा मामला इसी सोच को फिर सामने लाता है। 19 साल से शादीशुदा इस दंपति के यहां हाल ही में एक बेटे का जन्म हुआ है, जबकि इससे पहले उनकी 10 बेटियां हैं।
स्थानीय मीडिया को दिए इंटरव्यू में पिता ने बताया कि उनकी सबसे बड़ी बेटी श्रिना 12वीं में पढ़ती है और उसके बाद अमृता 11वीं में है। उन्होंने कुछ और बेटियों के नाम बताए, लेकिन सभी 10 बेटियों के नाम याद नहीं कर पाए। यह बात लोगों को हैरान कर गई और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया।
ओजस अस्पताल के डॉक्टरों के अनुसार, मां और नवजात दोनों के लिए यह डिलीवरी बेहद जोखिम भरी थी। बच्चे के शरीर में सिर्फ 5 ग्राम खून था और फिलहाल मां और बच्चा दोनों मेडिकल सपोर्ट पर हैं।
इंटरव्यू के वीडियो सामने आते ही सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। कई यूजर्स ने बच्चों और मां की हालत पर चिंता जताई और माता-पिता की जिम्मेदारी पर सवाल उठाए। लोगों ने कहा कि पितृसत्तात्मक सोच का पूरा बोझ महिलाओं के शरीर और मन पर डाला जाता है।
एक यूजर ने लिखा, “एक महिला ने 10 बेटियों के बाद 11वें बच्चे को जन्म दिया, वो भी एक बेटा। सरकार को इन सभी बच्चों को माता-पिता से अलग कर देना चाहिए, ये लोग बच्चों को पालने के लायक नहीं हैं।”
दूसरे ने कहा, “बेटे की चाह में पुरुष इतने अंधे हो जाते हैं कि महिला का शरीर प्रयोगशाला बन जाता है। 10 बेटियां काफी नहीं थीं। जब बेटा हुआ, तब समाज जागा। यह न परंपरा है, न संस्कृति, यह असुरक्षा और गैर-जिम्मेदारी है। बेटियों के जन्म के लिए महिलाओं को दोष देना बंद करो, पुरुषों से सवाल पूछो।”
एक यूजर ने लिखा, “सोचिए उन 10 बेटियों पर क्या गुजरती होगी, जिनके पिता को उनके नाम तक याद नहीं। न पैसा, न प्यार। ऐसी जिंदगी से बेहतर तो जन्म ही न लेना होता।” किसी ने लिखा, “भारत में बेटे को लेकर जुनून।”
एक और टिप्पणी में कहा गया, “क्या किसी ने मां की मर्जी पूछी? वीडियो में उससे एक सवाल तक नहीं किया गया। अगर महिलाओं को सच में विकल्प मिलते, तो इस देश में तलाक की दर 1% नहीं होती।” एक अकाउंट ने कहा, “बीमार सोच। ये दबाव अक्सर परिवार के बुजुर्गों की तरफ से होता है। पढ़े-लिखे और अमीर परिवारों में भी यह मानसिकता देखी जाती है।”
एक यूजर ने गुस्से में लिखा, “11 साल में 11 बार गर्भधारण। कोई भी महिला इसकी हकदार नहीं है। न वो मां, जिसकी जान जोखिम में है, न वो 10 बेटियां, जिनके नाम तक पिता नहीं जानता। सब कुछ सिर्फ एक बेटे के लिए।”
एक लंबी पोस्ट में लिखा गया, “भारत में बेटियां तब तक बोझ होती हैं जब तक माता-पिता बूढ़े और बीमार नहीं हो जाते। तब बेटियां ‘स्वभाव से देखभाल करने वाली’ बन जाती हैं। जन्म पर अनचाही, लेकिन जरूरत पड़ने पर सबसे जरूरी। बेटे नाम और विरासत के लिए, बेटियां सेवा के लिए। इसे परंपरा कहा जाता है, लेकिन असल में यह पाखंड है।” कई लोगों ने इस सोच की कड़ी आलोचना की कि बेटियों को वंश के समय बेकार और काम के समय अनिवार्य समझा जाता है।
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