
29 मई 1953 को न्यूजीलैंड के एडमंड हिलेरी और नेपाल के शेरपा तेनजिंग नोर्गे ने पहली बार माउंट एवरेस्ट की चोटी पर कदम रखकर इतिहास रच दिया था। इस कामयाबी के बाद हिलेरी को नाइट की उपाधि मिली और नोर्गे को जॉर्ज मेडल से सम्मानित किया गया। एवरेस्ट की ये फतह पर्वतारोहण के इतिहास का एक ऐतिहासिक पल बन गई। लेकिन उस ऐतिहासिक पल से लेकर आज तक, एवरेस्ट पर चढ़ना केवल हिम्मत और तैयारी का खेल नहीं रह गया है, अब यह एक महंगी और जटिल प्रक्रिया बन चुकी है।
माउंट एवरेस्ट का नाम, पहले पीक-15 था। दरअसल, 1856 में जब ब्रिटिश सर्वे टीम (Great Trigonometric Survey) ने सालों की मेहनत के बाद पीक-15 की ऊंचाई नापी, तो सर्वेयर जनरल एंड्रू वॉ ने इसे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी बताया- लगभग 29,002 फीट। असल में माप 29,000 फीट ही आया था, लेकिन उन्हें ये आंकड़ा बहुत गोल-मोल लगा, इसलिए थोड़ा बढ़ा कर बताया गया।
आज इसकी आधिकारिक ऊंचाई 29,029 फीट (8,848 मीटर) मानी जाती है। उस समय की नीति ये थी कि पहाड़ों को स्थानीय नाम दिए जाएं, लेकिन फिर भी इस चोटी का नाम वॉ के बॉस सर जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर रख दिया गया- जिनका नाम असल में 'ईवरेस्ट' प्रोनाउन्स किया जाता है। हालांकि, नेपाल में इसे 'सागरमाथा' और तिब्बत में 'चोमोलुंगमा' कहा जाता है, जिसका मतलब होता है दुनिया की माता।
एवरेस्ट करीब 5-6 करोड़ साल पुराना है और आज भी हर साल लगभग एक चौथाई इंच ऊंचा हो रहा है। यह हिमालय पर्वत श्रृंखला का हिस्सा है, जो भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव से बना है।
अब सवाल है, माउंट एवेरेस्ट की चोटी तक पहुंचने में कितना खर्च आता है? जवाब है- बहुत। एवरेस्ट चढ़ाई की कुल लागत ₹30 लाख से ₹1.65 करोड़ तक हो सकती है, और यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस कंपनी या रास्ते को चुनते हैं। अगर आप विदेशी ऑपरेटर के साथ जाते हैं, तो कुल खर्च $100,000 से $200,000 ( ₹82 लाख से ₹1.65 करोड़) तक पहुंच सकता है। वहीं, स्थानीय नेपाली ऑपरेटर अपेक्षाकृत सस्ते होते हैं- लगभग $30,000 से $50,000 ( ₹25 लाख से ₹41 लाख)।
चढ़ाई के दौरान जो बड़े खर्च सामने आते हैं, उनमें सबसे अहम है नेपाल सरकार की ओर से ली जाने वाली परमिट फीस, जो $11,000 (लगभग ₹9.13 लाख) प्रति व्यक्ति है। इसके अलावा स्थानीय कंपनी चार्ज $2,500 (लगभग ₹2.08 लाख), रिफंडेबल कचरा फीस $4,000 (लगभग ₹3.32 लाख), सागरमाथा प्रदूषण नियंत्रण शुल्क $600 (लगभग ₹49,800) प्रति व्यक्ति, ऊपरी पर्वतीय क्षेत्रों में रस्सी बिछाने का खर्च $200 (लगभग ₹16,600), और लायजॉन ऑफिसर का खर्च $2,500 (लगभग ₹2.08 लाख) (साथ में फ्लाइट टिकट) शामिल हैं। इसके साथ ही, हेलिकॉप्टर इंश्योरेंस और जीवन बीमा भी अनिवार्य होता है, जो स्थिति और जोखिम के अनुसार महंगा पड़ सकता है।
आज एवरेस्ट तक पहुंचने के लिए दो मुख्य रास्ते हैं- साउथईस्ट रिज (नेपाल) और नॉर्थ रिज (चीन)। 1953 में हिलेरी और नोर्गे ने नेपाल की तरफ से यानी साउथईस्ट रिज के रास्ते से चढ़ाई की थी। यह रूट सबसे ज्यादा लोकप्रिय है, लेकिन इसमें खतरनाक खुम्बु आइसफॉल जैसी चुनौतियां होती हैं। चीन की ओर से आने वाले रास्ते पर बेस कैंप तक वाहन जा सकते हैं, लेकिन समिट डे लंबा और कठिन होता है।
एवरेस्ट चढ़ाई अब सिर्फ रोमांच नहीं, एक 'लग्जरी एडवेंचर' बन चुकी है, जिसमें हर कदम पर फीस और लागत जुड़ी है। सस्ते ऑपरेटरों की बाढ़ और अत्यधिक भीड़ ने सुरक्षा और नैतिकता से जुड़े सवाल भी खड़े किए हैं। फिर भी, हर साल दुनिया भर से लोग अपनी जान जोखिम में डालकर इस चोटी को छूने आते हैं, क्योंकि एवरेस्ट सिर्फ एक पर्वत नहीं, बल्कि एक सपना है।
(इनपुट्स- thebmc.co.uk)
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