
अपरा एकादशी को सालभर आने वाली महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में मिलाकर लगभग 24 एकादशी तिथियां आती हैं, लेकिन अपरा एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है क्योंकि इसे आध्यात्मिक पुण्य, क्षमा और सुख-समृद्धि से जुड़ा माना जाता है।
इस साल अपरा एकादशी 13 मई 2026, बुधवार को मनाई जाएगी। हिंदू पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि 12 मई को दोपहर 2 बजकर 52 मिनट से शुरू होगी। हालांकि, हिंदू परंपरा में “उदय तिथि” का नियम माना जाता है, इसलिए व्रत 13 मई को रखा जाएगा। वहीं, व्रत का पारण 14 मई को किया जाएगा।
“अपरा” शब्द का अर्थ असीम या बेहद बड़ा फल माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को श्रद्धा और नियम के साथ रखने से व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और पुण्य की प्राप्ति हो सकती है। कई लोग यह भी मानते हैं कि यह एकादशी जाने-अनजाने में हुई गलतियों और नकारात्मक कर्मों से मुक्ति पाने में मदद करती है। कुछ परंपराओं में इसे गुरु या बड़ों का अपमान जैसे गंभीर दोषों से राहत देने वाला भी माना गया है। यही वजह है कि यह व्रत केवल पूजा-पाठ ही नहीं, बल्कि आत्मसंयम, श्रद्धा और आत्मचिंतन से भी जुड़ा माना जाता है।
अपरा एकादशी की तैयारी आमतौर पर एक दिन पहले से शुरू कर दी जाती है। 12 मई से ही भक्त सात्विक भोजन करना शुरू कर देते हैं और मन को शांत रखने की कोशिश करते हैं। इस दौरान प्याज और लहसुन खाने से परहेज किया जाता है। कई लोग एकादशी से पहले वाली रात भोजन भी नहीं करते और नियमों का पालन करते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से व्रत अधिक श्रद्धा और शांति के साथ पूरा किया जा सकता है।
युधिष्ठिर ने पूछा- जनार्दन!ज्येष्ठके कृष्णपक्षमें किस नामकी एकादशी होती है ? मैं उसका माहात्म्य सुनना चाहता हूं। उसे बताने की कृपा कीजिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले- राजन् ! तुमने सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये बहुत उत्तम बात पूछी है। राजेन्द्र ! इस एकादशीका नाम 'अपरा' है। यह बहुत पुण्य प्रदान करने वाली और बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली है। ब्रह्महत्यासे दबा हुआ, गोत्रकी हत्या करनेवाला, गर्भस्थ बालक को मारने वाला, परनिन्दक तथा परस्त्रीलम्पट पुरुष भी अपरा एकादशी के सेवन से निश्चय ही पाप रहित हो जाता है। जो झूठी गवाही देता, माप-तोलमें धोखा देता, बिना जाने ही नक्षत्रों की गणना करता और कूटनीति से आयुर्वेद का ज्ञाता बनकर वैद्य का काम करता है- ये सब नरकमें निवास करने वाले प्राणी हैं। परन्तु अपरा एकादशी के सेवनसे ये भी पापरहित हो जाते हैं। यदि व क्षत्रिय क्षात्रधर्मका परित्याग करके युद्धसे भागता है, तो वह क्षत्रियोचित धर्म से भ्रष्ट होनेके कारण घोर नरकमें पड़ता है। जो शिष्य विद्या प्राप्त करके स्वयं ही गुरुकी निन्दा करता है, वह भी महापातकों से युक्त होकर भयङ्कर नरक में गिरता है। किन्तु अपरा एकादशीके सेवनसे ऐसे मनुष्य भी सद्गतिको प्राप्त होते हैं।
माघमें जब सूर्य मकर राशिपर स्थित हों, उस समय प्रयाग में स्नान करनेवाले मनुष्यों को जो पुण्य होता है, काशी में शिवरात्रिका व्रत करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, गया में पिण्डदान करके पितरों को तृप्ति प्रदान करनेवाला पुरुष जिस पुण्यका भागी होता है, बृहस्पति के सिंहराशिपर स्थित होनेपर गोदावरीमें स्रान करनेवाला मानव जिस फलको प्राप्त करता है, बदरिकाश्रमकी यात्रा के समय भगवान् केदार के दर्शन से तथा बदरीतीर्थ के सेवन से जो पुण्य फल उपलब्ध होता है तथा सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में दक्षिणा सहित यज्ञ करके हाथी, घोड़ा और सुवर्ण-दान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है; अपरा एकादशी के सेवनसे भी मनुष्य वैसे ही फल प्राप्त करता है। 'अपरा' को उपवास करके भगवान् वामन की पूजा करनेसे मनुष्य सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णुल्लेकमें प्रतिष्ठित होता है। इसको पढ़ने और सुननेसे सहस्त्र गोदान का फल मिलता है।
युधिष्ठिर ने कहा-जनार्दन। 'अपरा'का सारा माहात्य मैंने सुन लिया, अब ज्येष्ठ के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी है उसका वर्णन कीजिये।भगवान् श्रीकृष्ण बोले- राजन्! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवतीनन्दन व्यासजी करेंगे; क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् हैं।तब वेदव्यासजी कहने लगे -दोनों ही पक्षोंकी एकादशियोंको भोजन न करे । द्वादशीको स्त्रान आदि से पवित्र हो फूलों से भगवान् के शव की पूजा करके नित्य कर्म समाप्त होनेके पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्तमें स्वयं भोजन करे। राजन् ! जननाशौच और मरणा शौच में भी एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिये।यह सुनकर भीम सेन बोले- परम बुद्धिमान् पितामह । मेरी उत्तम बात सुनिये । राजा युधिष्ठिर, माता न कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव-ये एकादशीको कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी ने हमेशा यही कहते हैं कि 'भीमसेन ! तुम भी एकादशी को न खाया करो।' किन्तु मैं इन लोगों से यही कह दिया करता हूं कि 'मुझसे भूख नहीं सही जाएगी।'
13 मई की सुबह भक्त जल्दी उठकर स्नान करते हैं और साफ कपड़े पहनकर पूजा शुरू करते हैं। पूजा के दौरान भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर को पीले कपड़े या आसन पर स्थापित किया जाता है। इसके बाद धूप, दीपक, फल, पीले फूल, मिठाई और पीले वस्त्र भगवान को अर्पित किए जाते हैं। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी के पत्तों का विशेष महत्व माना जाता है और इन्हें पूजा में जरूर शामिल किया जाता है।
एकादशी के दिन तुलसी से जुड़ी एक खास परंपरा भी मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। इस दिन तुलसी के पौधे में जल चढ़ाने से भी परहेज किया जाता है। इसलिए भक्त एक दिन पहले ही तुलसी के पत्ते तोड़कर रख लेते हैं ताकि पूजा में उनका उपयोग किया जा सके।
अपरा एकादशी पर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करना बेहद शुभ माना जाता है। इसके अलावा व्रत कथा सुनना और भगवान विष्णु की आरती करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। कई भक्त इस दिन ज्यादा से ज्यादा लोगों में प्रसाद बांटने की भी कोशिश करते हैं, क्योंकि मान्यता है कि दान और प्रसाद वितरण से पुण्य बढ़ता है।
एकादशी के दिन चावल खाने से परहेज किया जाता है। जो लोग पूरा व्रत नहीं भी रखते, वे भी धार्मिक मान्यताओं के कारण इस दिन चावल नहीं खाते। इसके अलावा व्रत के दौरान क्रोध, बुरी बातों और किसी को दुख पहुंचाने वाले व्यवहार से दूर रहने की सलाह दी जाती है ताकि व्रत पूरी श्रद्धा और सकारात्मक सोच के साथ पूरा हो सके।
(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)
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