
मुगल बादशाह शाहजहां 1657 के सितंबर माह में गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। वो मूत्र संबंधी समस्याओं और कब्ज से जूझ रहे थे। इस कारण लंबे समय तक जनता को झरोखा दर्शन नहीं दे रहे थे। इससे अटकलें लगने लगीं कि कहीं बादशाह का इंतकाल तो नहीं हो गया। इन्हीं अटकलों के बीच शाहजहां के चार पुत्रों दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंगजेब और मुराद बख्श के बीच शाही सिंहासन पर वर्चस्व का बेहद भयावह संघर्ष छिड़ गया। यह संघर्ष आज ही के दिन 28 मई को दारा शिकोह और औरंगजेब के बीच युद्ध में तब्दील हुआ। आइए, 368 वर्ष पहले आज ही के दिन सामुगढ़ के मैदान में हुए युद्ध की कहानी जानते हैं।
शाहजहां ने अपने बड़े बेटे दारा शिकोह को अपना उत्तराधिकारी नामित किया था। शाहजहां की मृत्यु की अफवाहों के बीच औरगंजेब ने मुराद और कुछ हद तक शुजा के साथ गुप्त पत्राचार शुरू कर दिया। उसने मुराद के साथ गठबंधन करने में सफल रहा। औरंगजेब ने अपनी जीत पर मुराद को पंजाब, सिंध, काबुल और कश्मीर सहित मुगल क्षेत्रों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा देने का वादा किया। हालांकि, यह गठबंधन औरंगजेब की ओर से एक रणनीतिक छल था, क्योंकि उसने बाद में मुराद को धोखा देकर मार डाला। शाही परिवार में जब गुटबंदी का दौर चरम पर था, तब राजकुमारी जहांआरा बेगम ने बड़े पैमाने पर दारा का समर्थन किया तो उनकी बहन रोशनआरा बेगम ने औरंगजेब का खुलकर साथ दिया।
शाह शुजा सैन्य कार्रवाई शुरू करने वाले पहले भाइयों में से था, जिसने अपनी सेना को बंगाल से आगरा की ओर मार्च किया। जवाब में दारा शिकोह ने शुजा को रोकने के लिए एक पर्याप्त शाही सेना भेजी। बहादुरपुर की लड़ाई 24 फरवरी, 1658 को बनारस से लगभग 5 मील उत्तर-पूर्व में हुई । इस मुकाबले में शुजा की सेना निर्णायक रूप से पराजित हुई, और उसे बंगाल की ओर पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा।
उधर, औरंगजेब और मुराद ने आगरा की ओर उत्तर की ओर अपना संयुक्त मार्च शुरू किया। इसी क्रम में दोनों की सेनाएं गंभीर नदी पर धर्मत गांव में इकट्ठा हुईं। यहीं उनका सामना शाहजहां की भेजी गई शाही सेना से हुआ, जिसकी कमान महाराजा जसवंत सिंह राठौर ने संभाली थी। वो दारा शिकोह के सहयोगी थे। 15 अप्रैल, 1658 को नर्मदा नदी के तट पर लड़ी गई धर्मत की लड़ाई में औरंगजेब और मुराद ने निर्णायक जीत हासिल की।
औरंगजेब ने अटर में चंबल के पार एक नामालूम सी असुरक्षित फोर्ड की खोज की ताकि उसकी सेनाएं दारा की रक्षा को पूरी तरह से बायपास कर सकें। इसने दारा को अपनी अधिकांश भारी तोपखाने को छोड़ने और औरंगजेब को रोकने के लिए जल्दबाजी में पूर्व की ओर बढ़ने के लिए मजबूर किया, जिससे सामुगढ़ में निर्णायक टकराव का मंच तैयार हुआ। दारा ने सामुगढ़ की ओर 'शुजा को हराने वाली अपनी विजयी सेनाओं का इंतजार किए बिना' आगे बढ़ने की गंभीर गलती की।
सामुगढ़ की निर्णायक लड़ाई 28 मई, 1658 को लड़ी गई थी। यह युद्ध आगरा से लगभग 16 से 20 किमी पूर्व या दक्षिण-पूर्व में यमुना नदी के दक्षिण में स्थित सामुगढ़ गांव के पास एक विशाल, धूल भरे मैदान में लड़ा गया था। तब भीषण गर्मी और भट्ठी जैसी तपा देने वाली धूप थी। इस लड़ाई में दारा शिकोह ने एक बड़ी गलती की। वो हाथी से उतर गए। सैनिकों ने हाथी पर बने होदे को खाली देखा तो उन्हें लगा कि राजा मारे गए या युद्ध मैदान से भाग गए। उनमें घोर निराशा छा गई और एक जीतती हुई सेना हार गई।
इस जीत के बाद, औरंगजेब ने तेजी से अपने प्रतिद्वंद्वियों मुराद बख्श और शाह शुजा को समाप्त कर दिया और अपने पिता शाहजहां को आगरा किले में कैद कर लिया। 21 जुलाई, 1658 को दिल्ली में 'आलमगीर' की उपाधि के साथ उनका राज्याभिषेक हुआ, जिसने मुगल सिंहासन पर उनके प्रभुत्व को मजबूत किया।
उधर, दारा शिकोह सामुगढ़ की लड़ाई में अपनी विनाशकारी हार के बाद युद्धक्षेत्र से भाग गए। वो आगरा से दिल्ली, फिर लाहौर, मुल्तान और अंततः सिंध में थट्टा तक गए। फिर कच्छ के कठिन रण से होकर काठियावाड़ तक पहुंच। वहां उन्हें गुजरात के गवर्नर शाह नवाज खान से अस्थायी राहत और सहायता मिली, जिन्होंने दारा को एक नई सेना भर्ती करने में मदद करने के लिए खजाना खोल दिया। दारा इस सेना के साथ आगरा की तरफ बढ़े। औरंगजेब की सेना के साथ उनका सामना अजमेर के पास देओराई में हुई। वहां, 12 से 14 अप्रैल, 1659 के बीच दोनों के बीच लड़ाई हुई। इस लड़ाई में भी दारा की हार हुई और वो कंधार की तरफ भाग गए।
अंत में उन्हें उनके ही एक जनरल ने धोखा दिया। उसने दारा को गिरफ्तार कर औरंगजेब की सेनाओं को सौंप दिया। दारा शिकोह को दिल्ली लाया गया, जहां औरंगजेब के आदेश पर उन्हें जंजीरों में बांधखर एक गंदे हाथी पर बैठाया गया और राजधानी की सड़कों पर उनकी परेड कराई गई। औरंगजेब ने दारा को इस्लाम से खारिज करने की घोषणा की।
औरंगजेब के आदेश पर दारा शिकोह को 30 अगस्त, 1659 मार डाला गया। आततायी औरंगजेब ने दारा शिकोह का सिर मंगवाया और उसे विकृत करवाया, फिर जेल में बंद रखे गए पिता शाहजहां को इसकी सूचना भिजवाई। दारा के अवशेषों को दिल्ली में हुमायूं के मकबरे के भीतर एक अज्ञात कब्र में दफनाया गया है।
दारा अपने उदार और अपरंपरागत इस्लामी विचारों के लिए जाने जाते थे जो दर्शन और रहस्यवाद की ओर गहरे झुकाव रखते थे। वो कला के एक महत्वपूर्ण संरक्षक थे और उन्होंने 'मजमा-उल-बहरीन (दो समुद्रों का संगम)' नामक कृति लिखी, जो इस्लाम में सूफी दर्शन और हिंदू धर्म में वेदांत दर्शन के बीच सामंजस्य की वकालत करती थी। उन्होंने 50 उपनिषदों और भगवद गीता का संस्कृत से फारसी में अनुवाद करने का महत्वपूर्ण कार्य भी किया। यही वजह रही की रूढ़ीवादी उलेमा उसे दूर हो गए थे।
दारा के उदार धार्मिक विचार कई कट्टर मुस्लिम उलेमाओं और शक्तिशाली रईसों को बिल्कुल रास नहीं आया था। शातिर औरंगजेब ने दारा को कमजोर करने के लिए इन्हीं कट्टरपंथी उलेमाओं और रईसों का साथ लिया था। औरंगजेब ने धार्मिक कट्टरपंथ की शक्ति को समझा और इसका उपयोग रूढ़िवादी गुटों और धार्मिक अभिजात वर्ग के एक महत्वपूर्ण वर्ग से समर्थन को मजबूत करने के लिए किया जो अधिक रूढ़िवादी इस्लामी राज्य के पक्ष में थे।
औरंगजेब के शासनकाल में इन्हीं उलेमाओं की छत्रछाया में इस्लामिक कट्टरपंथ ने आसमान छू लिया। औरंगजेब के आदेश पर न जाने कितने मंदिर तोड़े गए, कितने हिंदुओं का नरसंहार हुआ। आज भी औरंगजेब के नाम पर भारतीय समाज दो धड़ों में बंट जाता है। एक वर्ग औरंगजेब की क्रूरताभरी व्यापक नीतियों पर उदारता के इक्के-दुक्के रणनीतिक कार्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की कोशिश करता है। इसमें हर समुदाय, हर वर्ग और हर पेशे के लोग शामिल हैं। काश! 368 वर्ष पहले हुई सामुगढ़ की लड़ाई का परिणाम उलटा आया होता।
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