
ईरान और इजरायल के बीच 12 दिन तक चली भयंकर जंग अब थम गई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया कि दोनों देशों के बीच युद्धविराम (सीजफायर) हो गया है। इस जंग में दोनों ओर काफी जानें गईं और बर्बादी भी हुई। लेकिन इन तमाम खतरों और अंतरराष्ट्रीय तनावों के बीच एक देश सबसे ज्यादा चर्चा में रहा ईरान। और इसकी वजह सिर्फ उसका मुस्लिम देश होना नहीं, बल्कि ये भी है कि वहां इस्लामिक शासन को लेकर अंदर से भी असहमति और विद्रोह उठने लगे हैं। कई ईरानियों ने खुलकर सोशल मीडिया पर पुराने ईरान की तस्वीरें, वीडियो शेयर करते हुए बताया कि उनका मुल्क कभी कितना आजाद ख्याल और खुश था।
पर क्या आप जानते हैं, ईरान हमेशा से मुस्लिम देश नहीं था? वहां पहले जरथुस्त्र (पारसी) धर्म का बोलबाला था। और वो भी ऐसा कि पूरी दुनिया की निगाहें उस पर थीं। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि वहां से पारसी धर्म लुप्त हो गया और आज वे भारत में बसे हैं?
ईरान सिर्फ न्यूक्लियर प्रोग्राम या इजरायल से दुश्मनी के लिए नहीं जाना जाना चाहिए। इसका इतिहास बहुत गहरा है। इतिहासकार ईरान के इतिहास को तीन बड़े हिस्सों में बांटते हैं इस्लाम से पहले का स्वर्णकाल (559 ईसा पूर्व – 651 ईस्वी), इस्लामी काल (651–1800 ईस्वी) और आधुनिक काल (1800 के बाद)।
ईरान में सभ्यता की नींव एलामाइट संस्कृति ने रखी थी, जो आज के इराक के कुछ हिस्सों में फैली थी। फिर ईरानी जनजातियां (मेडियन और पारसी) आकर यहां बसीं। 559 ईसा पूर्व में साइरस द्वितीय सत्ता में आए और पहली बार ईरान को एक वैश्विक शक्ति का दर्जा मिला। उनका शासन न्यायप्रिय, धार्मिक सहिष्णु और सुव्यवस्थित था।
अकेमेनिड साम्राज्य की छाया भारत से लेकर यूनान तक थी। इस समय पारसी धर्म का उदय हुआ, जो "सच्चे विचार, सच्चे शब्द, सच्चे कर्म" पर आधारित था। बाद में सिकंदर महान ने ईरान को जीत लिया, लेकिन उसके बाद पार्थियन और फिर सासानी वंश ने ईरान को फिर से मजबूत किया। सासानी काल में पारसी धर्म को राजकीय धर्म बना दिया गया।
7वीं सदी में इस्लाम ने जब अरब से बाहर विस्तार करना शुरू किया, तब उसने पहले बायजेंटाइन साम्राज्य को हराया और फिर उसकी निगाहें सासानी ईरान पर पड़ीं। जल्दी ही मुस्लिम सेनाओं ने ईरान को जीत लिया और उसे इस्लामी खिलाफत का हिस्सा बना दिया। पर ईरान कोई आम देश नहीं था, जिसे पूरी तरह एक जैसे रंग में रंगा जा सके। इसके उलट, ईरानी संस्कृति, विचारधारा और प्रशासन की शैली ने खुद इस्लामी शासन को प्रभावित किया।
इस्लामी शासन के दौर में भी कई प्रभावशाली लोग ईरानी पृष्ठभूमि से आए जैसे इब्न सीना (Avicenna), जो महान वैज्ञानिक और दार्शनिक थे। इसी तरह बरमकीद जैसे मंत्री भी। ईरान ने इस्लाम को एक सोच और सभ्यता दी सिर्फ धर्म नहीं, पूरा विजन।
लेकिन इस्लाम के आगमन के साथ ही जो लोग इसे अपनाने से इंकार करते थे उन्हें या तो मारा गया या उन्हें भागना पड़ा। पारसी समुदाय, जो ईरान की रूह था, उसे अपनी जिंदगी और धर्म को बचाने के लिए देश छोड़ना पड़ा। कुछ पारसी पहले मध्य एशिया के खुरासान में बस गए, फिर उरमुज द्वीप पहुंचे। जब वहां भी खतरा बढ़ा, तो समंदर पार करते हुए वे अपनी पवित्र अग्नि और धार्मिक ग्रंथों के साथ भारत के दीव पहुंचे, जो उस वक्त पुर्तगालियों के कब्जे में था।
दीव से वे लोग गुजरात के 'संजान' पहुंचे जहां राजा जाड़ी राणा ने उन्हें न सिर्फ शरण दी बल्कि अग्नि मंदिर की स्थापना के लिए जमीन भी दी। यहीं 721 ईस्वी में भारत का पहला पारसी अग्नि मंदिर बना। धीरे-धीरे खुरासानी और कोहिस्तानी पारसी समूह भी यहां पहुंचे। 15वीं सदी में जब संजान पर भी मुस्लिम हमला हुआ, तो पारसी वहां से पवित्र अग्नि के साथ नवसारी चले गए। वहां उन्होंने खुद को फिर से जमाया।
जब 16वीं सदी में सूरत में अंग्रेज फैक्ट्रियां लेकर आए, तो पारसी समुदाय ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अंग्रेजों के भरोसेमंद बिचौलिये बने और बाद में मुंबई की तरफ बढ़े, जहां वे आज भी बड़ी संख्या में बसे हैं।
आज भारत में लगभग 1 लाख पारसी हैं, जिनमें से 70% मुंबई में रहते हैं। इनका योगदान सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं टाटा, होमी भाभा, सैम मानेकशॉ जैसे नाम इन्हीं की देन हैं। और हां, ये सब भले पारसी हों, दिल से हमेशा हिंदुस्तानी रहे हैं।
आज जब ईरान एक बार फिर जंग, राजनीति और धर्म के झंझावात में है तो यह जरूरी है कि उसकी गहराई, उसकी विरासत और उसकी असल पहचान को भी समझा जाए। और यह भी समझा जाए कि जो पारसी भारत आए, वे सिर्फ शरणार्थी नहीं, बल्कि संस्कृति के वाहक थे।
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