
Naxal Free Bihar: बिहार के लिए 18 फरवरी, 2026 की तिथि बहुत महत्वपूर्ण है। दशकों तक माओवादी हिंसा से लाल होती रही बिहार की धरती अब नक्सल मुक्त घोषित हो गई है। विश्व को शांति और अहिंसा की शिक्षा देने वाले भगवान बुद्ध की धरती बिहार कम-से-कम 1990 के दशक से हिंसक वामपंथी वारदातों का गंभीर शिकार रहा। लेकिन करीब 35 वर्ष बाद बुधवार, 18 फरवरी, 2026 को कुख्यात नक्सली सुरेश कोड़ा के आत्मसमर्पण के साथ ही बिहार को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया गया।
न्यूज एजेंसी वार्ता की रिपोर्ट के मुताबिक, मुंगेर डिविजन के डीआईजी राकेश कुमार ने पूरे बिहार के नक्सल मुक्त होने की घोषणा की। उन्होंने बताया कि मुंगेर, लखीसराय और जमुई जिलों में दो दशकों तक सक्रिय नक्सली स्पेशल एरिया कमेटी के कमांडर और कुख्यात नक्सली सुरेश कोड़ा ने बुधवार को एक AK-47 रायफल, एक AK 56 रायफल, दो इंसास रायफल और 505 राउंड जिंदा कारतूस के आत्मसमर्पण कर दिया।
डीआईजी राकेश कुमार ने कहा कि 60 आपराधिक कांडों में फरार सुरेश कोड़ा ने समाज की मुख्य धारा से जुड़ने का संकल्प लिया है। उन्होंने कहा कि सभी कांड वर्ष 2008 से वर्ष 2025 तक के दौरान मुंगेर, लखीसराय और जमुई जिलों में दर्ज किए गए थे। उन्होंने बताया कि बिहार सरकार की आत्मसमर्पण नीति के तहत जिला प्रशासन की तरफ से आत्मसमर्पण करने वाले सभी व्यक्तियों को विशेष पैकेज दिया जाएगा।
भारत सरकार के दस्तावेज के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से शुरू हुआ वामपंथी उग्रवाद मुख्य रूप से 'रेड कॉरिडोर' में फैल गया, जिसने छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, केरल, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कुछ हिस्सों को प्रभावित किया।
बिहार में नक्सलियों ने सबसे पहले अपना पांव भोजपुर क्षेत्र में जमाया। कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) और उसके अन्य धड़ों का बिहार की राजनीति में दखल तो पहले से था, लेकिन बाद में सीपीआई(एमएल) लिबरेशन जैसे उग्र संगठनों ने भी जड़ें जमानी शुरू कर दीं। 1990 का दशक आते-आते बिहार के कई जिलों विशेषकर भोजपुर, आरा, जहानाबाद, गया आदि में हथियारबंद संगठनों का दबदबा हो गया और आए दिन हिंसा के तांडव होने लगे।
दरअसल, नक्सलबाड़ी आंदोलन से देशभर में फैला माओवाद 1990 के दशक में बिहार में नासूर बनकर उभरा। सामाजिक न्याय के नारे से सत्ता की कुर्सी तक पहुंचे लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री रहते हुए बिहार में नक्सलियों का वर्चस्व दिन दोगुनी रात चौगुनी के हिसाब से बढ़ा। माओवादी कम्यूनिस्ट सेंटर (एमसीसी), पीपल्स वॉर ग्रुप (पीडब्ल्यूजी), पार्टी यूनिटी जैसी वामपंथी उग्रवादी संगठन नरसंहार की नियमित घटनाओं से कोहराम मचाने लगे। फिर जातीय संघर्ष का दौर शुरू हुआ और इस रस्साकस्सी में न जाने कितने निर्दोषों ने जानें गंवाईं।
यह लेखक वो दिन कभी नहीं भूल सकता जब 14 अप्रैल, 2002 की सुबह इसकी नींद गोलियों की तड़तड़ाहट से खुली। गर्मी के दिन थे, इसलिए यह लेखक छत पर सोया था। गोलियां चलने लगीं तो वह समझ नहीं पाया कि हुआ क्या। चूंकि उन दिनों नक्सली वारदातें आम थीं, इसलिए लगा जैसे नक्सलियों ने गांव पर धावा बोल दिया है। हालांकि, बिहार के जमुई जिला स्थित उस गंगरा गांव को बिहार पुलिस के स्पेशल दस्ते ने घेरा था। स्पेशल फोर्स को एक कुख्यात अपराधी की तलाश थी जिसे मार गिराने में कामयाबी मिली।
खैर, दो वर्ष पहले जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आई थी तब 15 नवंबर, 2000 को बिहार से अलग होकर झारखंड प्रदेश बन गया था। लातेहार, गुमला, पलामू और गढ़वा जैसे अति नक्सल प्रभावित क्षेत्र झारखंड में चले गए। फिर भी बिहार के कई क्षेत्रों में नक्सलियों का दबदबा कायम रहा, इनमें ज्यादातर झारखंड से सटे इलाके थे। केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 2008 में बिहार के 21 जिले नक्सल प्रभावित थे जो 2010 में बढ़कर 28 हो गए लेकिन 2015 में इनकी संख्या सिमटकर पांच रह गई। 26 मई, 2014 को केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार ने शपथ ले ली थी। अगले वर्ष 2015 में उसने माओवादी हिंसा के समूल नाश की राष्ट्रीय योजना बनाई।
मोदी सरकार ने वामपंथी उग्रवाद को देशभर से उखाड़ फेंकने के लिए 'राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना' तैयार की। इसके तहत सुरक्षा संबंधी पहलों, पिछड़े इलाकों में विकास कार्यों, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में गरीबी और असमानता दूर करने की दिशा में उठाए गए कदमों पर बल दिया गया। इन्हीं पहलों के तहत नक्सलियों से निपटने के लिए समाधान (SAMADHAN) रणनीति तैयार की गई।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने 10 दिसंबर, 2024 को लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में बताया था कि देश के नौ राज्यों के 38 जिलों में नक्सलियों की मौजूदगी है। तब उन्होंने बिहार के किसी भी जिले का नाम इस सूची में नहीं रखा था। वहीं, बिहार के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजीपी) अमृत राज ने 23 दिसंबर, 2024 को कहा था कि बिहार 2025 में पूरी तरह नक्सल मुक्त हो जाएगा। तब उन्होंने कहा था कि अब गया, औरंगाबाद, कैमूर, जमुई, मुंगेर, रोहतास, नवादा और लखीसराय के आठ जिलों में नक्सल गतिविधियां सीमित हो गई हैं।
एडीजीपी ने कहा था कि बीते पांच वर्षों में यानी 2019 से 2024 के बीच बिहार में माओवादी घटनाओं में 72 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। हाल के दिनों में बिहार में नक्सलियों के दो इलाके ही बच गए थे- गया-औरंगाबाद क्षेत्र और जमुई-लखीसराय-मुंगेर का इलाका। अब इन दोनों क्षेत्रों से भी नक्सलियों का सफाया हो चुका है।
भारत सरकार का दस्तावेज बताता है कि नक्सलवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस पॉलिसी के तहत मार्च, 2025 तक 90 नक्सली मारे गए, 104 गिरफ्तार हुए और 164 ने आत्मसमर्पण किया। 2024 में 290 नक्सलियों को बेअसर किया गया, 1,090 को गिरफ्तार किया गया और 881 ने आत्मसमर्पण किया। फिर गृह मंत्री अमित शाह ने भारत से नक्सलियों के अंतिम खात्मे का तिथि तय कर दी- 31 मार्च, 2026। शाह ने 8 फरवरी को छत्तीसगढ़ के रायपुर में नक्सल उन्मूलन अभियान का जायजा लिया। वहां उन्होंने कहा, 'मोदी सरकार में नक्सलवाद अपने खात्मे की ओर पहुंच गया है और 31 मार्च, 2026 तक देश नक्सल मुक्त हो जाएगा।'
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