पटना: बिहार में गर्भवती महिलाओं के बीच एनीमिया यानी खून की कमी की समस्या लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। डॉक्टरों का कहना है कि अगर गर्भावस्था के दौरान समय पर जांच कर एनीमिया की पहचान कर ली जाए और सही इलाज शुरू किया जाए, तो इसके गंभीर असर से बचा जा सकता है। पटना में आयोजित एक कार्यशाला में विशेषज्ञों ने मातृ एनीमिया की जांच, इलाज और निगरानी से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें साझा कीं।
सिर्फ बीमारी की पहचान करना काफी नहीं
मेदान्ता हॉस्पिटल, पटना की निदेशक और प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की प्रमुख डॉ. मीना सामंत ने कहा कि गर्भवती महिला में एनीमिया का पता लगाना इलाज का पहला कदम है। इसके बाद भी महिला की सेहत पर लगातार नजर रखना जरूरी है। इलाज के दौरान उसकी स्थिति के अनुसार दवाओं या उपचार में बदलाव करने की जरूरत पड़ सकती है।
उन्होंने ग्लोबल हेल्थ स्ट्रेटजीज की ओर से गर्भवती महिलाओं में एनीमिया को लेकर आयोजित कार्यशाला में यह बात कही। डॉ. सामंत ने कहा कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की नियमित जांच और समय पर इलाज की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है। इससे एनीमिया के गंभीर स्तर तक पहुंचने से पहले ही जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं।
एक बार में आयरन देने में मदद करता है यह इंजेक्शन
डॉ. सामंत ने गर्भवती महिलाओं में इस्तेमाल होने वाले इंट्रावेनस फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज़ इंजेक्शन के बारे में भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस उपचार के जरिए जरूरत के मुताबिक आयरन की बड़ी मात्रा एक ही बार में दी जा सकती है। इससे कुछ मामलों में बार-बार अस्पताल जाने की परेशानी कम हो सकती है।
उन्होंने बताया कि यह तरीका शरीर में आयरन को धीरे-धीरे उपलब्ध कराने में मदद करता है और आयरन की कमी को अपेक्षाकृत जल्दी पूरा करने में उपयोगी हो सकता है। हालांकि, गर्भवती महिला के लिए किस तरह का उपचार सही रहेगा, इसका फैसला डॉक्टर उसकी स्थिति और जांच के आधार पर करते हैं।
बिहार में एनीमिया का बढ़ता आंकड़ा चिंता की वजह
राधा देवी जागेश्वरी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, मुजफ्फरपुर की प्राचार्य प्रो. (डॉ.) आभा रानी सिन्हा ने मातृ एनीमिया को एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बताया। उन्होंने गर्भवती महिलाओं की समय पर जांच कराने, एनीमिया की पहचान करने और जरूरत पड़ने पर तुरंत इलाज शुरू करने पर जोर दिया।
उन्होंने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण यानी NFHS-4 और NFHS-5 के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि बिहार में एनीमिया की समस्या बढ़ी है। NFHS-4 में बिहार की 58.3 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं एनीमिया से प्रभावित थीं, जबकि NFHS-5 में यह आंकड़ा बढ़कर 63.1 प्रतिशत हो गया। यानी इसमें 4.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
वहीं, प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं में भी एनीमिया का स्तर बढ़ा है। NFHS-4 में यह आंकड़ा 60.3 प्रतिशत था, जो NFHS-5 में बढ़कर 63.5 प्रतिशत हो गया। इस तरह इस वर्ग में 3.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
इन आंकड़ों से साफ है कि बिहार में गर्भवती महिलाओं और प्रजनन आयु की महिलाओं में एनीमिया अभी भी बड़ी समस्या है। विशेषज्ञों के मुताबिक, नियमित जांच, समय पर इलाज और गर्भावस्था के दौरान बेहतर स्वास्थ्य निगरानी के जरिए इस समस्या को नियंत्रित करने की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं।