बंगाल में 'कमल' का कमाल: रैलियां नहीं, फुटबॉल और नुक्कड़ सभाओं ने कैसे बदल दिया दीदी के गढ़ का गणित?

West Bengal BJP Victory: पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाजपा की जीत केवल चुनावी संयोग नहीं, बल्कि सुनील बंसल और भूपेंद्र यादव की 'कैम्पेन इंजीनियरिंग' का नतीजा है। आइए जानते हैं कि किन स्ट्रैटजी ने बंगाल में कमल खिलाया। 

Shivam Shukla
अपडेटेड4 May 2026, 05:37 PM IST
बड़ी जनसभा नहीं, घर-घर दस्तक से भाजपा ने बदली बंगाल की तस्वीर
बड़ी जनसभा नहीं, घर-घर दस्तक से भाजपा ने बदली बंगाल की तस्वीर

West Bengal BJP Victory Reasons: पश्चिम बंगाल की राजनीति में आया बदलाव केवल एक चुनावी संयोग नहीं, बल्कि बेहद सुनियोजित और टेक्निकली कैम्पेन इंजीनियरिंग का नतीजा है। लंबे समय तक जिस जमीन को किसी भी विपक्षी दल के लिए अभेद्य माना जाता था, वहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने बहुमत का रास्ता साफ कर लिया है। यह रास्ता इतना आसान नहीं था। इसे बड़ी जनसभाओं से नहीं, बल्कि बंगाल की तंग गलियों और घरों के भीतर होने वाली छोटी बैठकों से तैयार किया। इस पूरे चुनावी चक्रव्यूह के पीछे संगठन के चाणक्य कहे जाने वाले सुनील बंसल और चुनाव प्रभारी भूपेंद्र यादव की जोड़ी खड़ी थी, जिन्हें सह-प्रभारी बिप्लब कुमार देब का जमीनी सहयोग मिला।

कमल मेला का मास्टरस्ट्रोक

बंगाल के मिजाज को समझने के लिए भारतीय जनता पार्टी को वहां की संस्कृति में घुलना जरूरी था। भाजपा ने इसके लिए 'कमल मेला' जैसा अनूठा प्रयोग किया। चुनाव प्रचार को केवल भाषणों तक सीमित न रखकर उसे एक सामाजिक उत्सव का रूप दिया गया। हर विधानसभा क्षेत्र में आयोजित इन मेलों में स्थानीय संगीत, कला और विमर्श का ऐसा संगम हुआ कि राजनीति मंच से उतरकर सीधे आम आदमी के आंगन तक पहुंच गई। इसने मतदाताओं के मन में पार्टी की एक नई और स्वीकार्य छवि गढ़ने में मदद की।

फुटबॉल के सहारे लोगों के दिलों में उतरी भाजपा

बंगाल में फुटबॉल को काफी पसंद किया जाता है। इसी के बहाने जनता को साधते हुए भाजपा ने राज्यभर में फुटबॉल मैच आयोजित किए गए, जिसने उन इलाकों में भी भाजपा की पहुंच बना दी जहां पारंपरिक राजनीति के लिए जगह कम थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी तस्वीरें सामने आईं, जिसमें वो गंगटोक में बच्चों के साथ फुटबॉल के मैदान में गोल करते नजर आए।

घर-घर जाकर बैठक करने का है ‘बंगाल परिणाम’

फरवरी के महीने में जब परीक्षाओं की वजह से लाउडस्पीकर पर पाबंदी लगी, तब पार्टी ने इसे अवसर में बदलते हुए महज एक महीने में 1.65 लाख से ज्यादा घर-घर बैठकें कीं। इन छोटी टोलियों को व्हाट्सएप ग्रुप से जोड़कर संवाद का एक ऐसा डिजिटल जाल बिछाया गया, जिसने चुनाव को मैक्रो से हटाकर माइक्रो लेवल पर शिफ्ट कर दिया।

12 हाजर नुक्कड़ सभा

इसके साथ ही करीब 12 हजार नुक्कड़ सभाओं ने बड़े मंचों की दूरी को खत्म कर दिया। नेताओं और जनता के बीच सीधा संवाद हुआ और स्थानीय मुद्दों पर चर्चा हुई। वहीं, सरकार के खिलाफ लाए गए चार्जशीट अभियान ने विपक्ष को बैकफुट पर धकेल दिया और जनता के बीच मुद्दों की स्पष्टता पैदा की।

स्थानीय चेहरों से बढ़ा भरोसा

इस बार भाजपा की स्टैटजी में सबसे बड़ा बदलाव कैंडिडेट सेलेक्शन में दिखा। बाहरी होने के आरोपों को धोने के लिए पार्टी ने स्थानीय डॉक्टर, वकील, खिलाड़ी और कलाकारों को मैदान में उतारा। स्थानीय चेहरों पर दांव लगाने से जनता में अपनापन बढ़ा। महिलाओं और युवाओं के लिए विशेष तौर पर जारी किए गए 'मातृशक्ति' और 'युवाशक्ति' भरोसा कार्ड गेमचेंजर साबित हुआ।

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