
How to complain against blood bank: अस्पतालों में अक्सर देखा जाता है कि जब किसी मरीज को खून की जरूरत होती है, तो ब्लड बैंक या अस्पताल प्रबंधन परिजनों से 'रिप्लेसमेंट' यानी बदले में खून देने की शर्त रखते हैं। ऐसे में मरीज के परिजनों की चिंता कई गुना बढ़ जाती है। वो खून जुटाने के लिए परेशान होते हैं और कई बार असफल होने पर उन्हें हॉस्पिटल या ब्लड बैंक से काफी फजीहत झेलनी पड़ती है।
खून को 'ड्रग' यानी दवा की श्रेणी में रखा गया है। 'औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940' की धारा 3(b) के तहत इसे रेगुलेट किया जाता है। इसका मतलब है कि ब्लड बैंक को भी उसी तरह के कड़े नियमों और लाइसेंसिंग का पालन करना होता है, जैसे किसी दवा बनाने वाली कंपनी को।
अदालतों ने समय-समय पर इस व्यवस्था को सुधारने के लिए कड़े निर्देश दिए हैं। 'कॉमन कॉज बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पैसे लेकर खून देने वाले प्रफेशनल डोनर्स पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। कोर्ट का लक्ष्य था कि धीरे-धीरे रिप्लेसमेंट डोनेशन को खत्म कर इसे पूरी तरह 'स्वैच्छिक' बनाया जाए।
झारखंड हाई कोर्ट ने 18 दिसंबर, 2025 को एक जनहित याचिका पर बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अस्पताल मरीजों के परिजनों को खून लाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। खून की व्यवस्था करना पूरी तरह अस्पताल और ब्लड बैंक की जिम्मेदारी है। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का स्पष्ट आदेश दिया है कि मरीजों को रिप्लेसमेंट डोनर की आवश्यकता के बिना रक्त उपलब्ध कराया जाए।
ऐसे में, अगर कोई अस्पताल या ब्लड बैंक जबरन रिप्लेसमेंट ब्लड की मांग करता है, तो उसे कई कानूनी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
कन्ज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट (उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम) के तहत, अगर कोई अस्पताल खून देने के बदले शर्त रखता है, तो इसे 'सेवा में कमी' माना जाता है। चूंकि खून एक जीवन रक्षक दवा है, इसलिए इसे किसी मनमानी शर्त पर रोकना मरीज के अधिकारों का उल्लंघन है। ऐसे में मरीज का परिवार मुआवजे की मांग कर सकता है।
कानून के तहत ब्लड डोनर्स तीन तरह के होते हैं...
1. स्वैच्छिक गैर-पारिश्रमिक रक्त दाता (VNRBD): राष्ट्रीय रक्त नीति के अनुसार, यह दाताओं की सबसे सुरक्षित और सबसे प्रोत्साहित श्रेणी है। ये व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से, बिना किसी नकद या वस्तु के रूप में भुगतान के, रक्त दान करते हैं।
2. प्रतिस्थापन रक्त दाता (Replacement Donor): ये किसी मरीज के दोस्त या रिश्तेदार होते हैं जो अस्पताल के भंडार को फिर से भरने के लिए रक्त दान करते हैं।
3. पेशेवर/भुगतान प्राप्त दाता (Professional/Paid Donor): यह श्रेणी सख्ती से अवैध है। 1996 में कॉमन कॉज बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले और औषधि और प्रसाधन सामग्री नियमों के नियम 122P ने पैसे लेकर खून देने वालों से रक्त एकत्र करने की प्रथा पर स्पष्ट रूप से प्रतिबंध लगा दिया है।
झारखंड हाई कोर्ट ने भी अपने ताजा आदेश में भी खून का पर्याप्त भंडार बनाए रखने के लिए अस्पतालों और ब्लड बैंकों को अपनी रक्त की मांग को पूरा करने के लिए स्वयं रक्तदान शिविर आयोजित करने का आदेश दिया है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी सांसद परसोत्तम भाई रूपाला ने 12 दिसंबर, 2025 को लोकसभा में जबकि डॉ. अजीत माधवराव गोपचडे ने राज्यसभा में एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया। नेशनल ब्लड ट्रांसफ्यूजन बिल 2025 का मुख्य उद्देश्य पूरे देश में खून की कमी को दूर करना और रिप्लेसमेंट डोनेशन को जड़ से खत्म करना है।
इसके तहत एक नेशनल अथॉरिटी बनाने का प्रस्ताव है जो यह सुनिश्चित करेगी कि हर अस्पताल में पर्याप्त खून उपलब्ध हो और किसी भी परिवार को परेशान न होना पड़े। हालांकि, इस विधेयक को संसद की मंजूरी नहीं मिली।
मरीज के रिश्तेदारों को रिप्लेसमेंट डोनेशन के लिए मजबूर करना पूरी तरह अवैध है। संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत सुरक्षित खून पाना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। अस्पतालों का यह कर्तव्य है कि वे खुद रक्तदान शिविर लगाएं और ब्लड का स्टॉक मेंटेन करें, ना कि मरीज को परिजनों से जबरन खून की मांग करें।
अगर कोई अस्पताल या ब्लड बैंक आपको खून देने के लिए मजबूर करता है या रिप्लेसमेंट डोनर के बिना खून देने से इनकार करता है, तो आप इन माध्यमों से अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
अस्पताल का शिकायत निवारण तंत्र: झारखंड हाईकोर्ट के 2025 के आदेश के अनुसार, हर अस्पताल और ब्लड बैंक के लिए एक समर्पित शिकायत प्रणाली होना अनिवार्य है। आप उनके आधिकारिक मोबाइल ऐप, वेबसाइट या टोल-फ्री नंबर पर तुरंत शिकायत कर सकते हैं।
ड्रग कंट्रोलर: चूंकि खून 'ड्रग' की श्रेणी में आता है, इसलिए आप राज्य के ड्रग कंट्रोल विभाग में लिखित शिकायत कर सकते हैं। नियमों का उल्लंघन होने पर वे ब्लड बैंक का लाइसेंस रद्द कर सकते हैं।
कंज्यूमर फोरम: खून देने से इनकार करना 'सेवा में कमी' है। आप राष्ट्रीय उपभोक्ता सहायता केंद्र की वेबसाइट पर शिकायत कर सकते हैं या संबंधित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में मुआवजे के लिए केस फाइल कर सकते हैं।
नेशनल ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल (NBTC): एनबीटीसी देश भर में ब्लड ट्रांसफ्यूजन की व्यवस्था को मॉनिटर करता है। इसने हॉटलाइन लगा रखी है। आप +965 186 7777 पर फोन या admin@nbtcgroup.com करके अपनी शिकायत सीधे इस केंद्रीय निकाय को भेज सकते हैं।
शिकायत को मजबूत बनाने के लिए आपको डॉक्टर द्वारा ब्लड की जरूरत के लिए लिखा गया पर्चा यानी प्रिसक्रिप्शन को संभालकर रखना होगा। यदि संभव हो, तो अस्पताल के कर्मचारी या ब्लड बैंक अधिकारी द्वारा रिप्लेसमेंट की मांग करते हुए वीडियो/ऑडियो रिकॉर्डिंग या कोई लिखित दस्तावेज तैयार रखें। किस समय आपसे खून की मांग की गई और उस वक्त मरीज की स्थिति क्या थी, इसका ब्योरा भी दें।
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