बॉम्बे हाई कोर्ट ने आज मुंबई की बिगड़ती एयर क्वालिटी को लेकर सख्त रुख अपनाया। अदालत ने बीएमसी कमिश्नर भूषण गगरानी और महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) के कमिश्नर को कड़ी फटकार लगाई। दोनों अधिकारी व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश हुए। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रदूषण नियंत्रण को लेकर जारी गाइडलाइंस और उनके पालन में बरती जा रही लापरवाही पर कई तीखे सवाल किए। एमिकस क्यूरी डेरियस खंबाटा ने अदालत को बताया कि शहर में वायु प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह कॉन्स्ट्रक्शन कार्यों से उड़ने वाली धूल है।
गाइडलाइंस कानून हैं, कागज नहीं- हाई कोर्ट
हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी गाइडलाइंस सिर्फ सलाह नहीं, बल्कि कानून की तरह लागू करने योग्य हैं। अदालत ने नाराजगी जताई कि जनवरी और जून की तय समय सीमा गुजर जाने के बावजूद कई कॉन्स्ट्रक्शन साइट्स पर सेंसर आधारित एयर मॉनिटर नहीं लगाए गए। कोर्ट ने इसे प्रशासन की गंभीर निष्क्रियता बताया और कहा कि विकास के नाम पर नागरिकों की सेहत से समझौता नहीं किया जा सकता।
नियम मौजूद, लेकिन हो रही अनदेखी
एमिकस क्यूरी ने कोर्ट को बताया कि नियमों के तहत कॉन्स्ट्रक्शन साइट्स पर वाटर फॉगिंग, मलबे को ढकना, सीसीटीवी और सेंसर आधारित एयर क्वालिटी मीटर अनिवार्य हैं। बीएमसी के पास इन्हें लागू कराने के लिए विशेष दस्ते भी हैं, इसके बावजूद जमीनी स्तर पर नियमों की खुलेआम अनदेखी हो रही है। अदालत ने कहा कि योजनाएं कागजों पर बेहतरीन दिखती हैं, लेकिन उनका सही तरीके से लागू न होना प्रशासन की बड़ी विफलता है।
धीमी कार्रवाई और बिल्डरों की लापरवाही
कोर्ट ने सवाल उठाया कि जनवरी में दी गई एक महीने की समय सीमा का पालन क्यों नहीं हुआ और जून बीतने के बाद भी अब आईआईटी कानपुर से सलाह क्यों ली जा रही है। आंकड़ों के मुताबिक, सिर्फ एक-तिहाई कॉन्स्ट्रक्शन साइट्स ही एयर क्वालिटी डेटा साझा कर रही हैं। जजों ने कहा कि 20–25 साइट्स में से शायद ही किसी पर 35 फीट ऊंची मेटल शीट या ग्रीन तिरपाल नजर आता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विकास रोका नहीं जाएगा, लेकिन बिल्डरों की लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी।