Challan for black film on car glass: क्या आप अपनी कार में काले शीशे या टिंटेड ग्लास का इस्तेमाल करते हैं? अगर हां, तो सावधान हो जाइए। भारत में मोटर वाहन अधिनियम के तहत इसके लिए सख्त नियम बनाए गए हैं। इन नियमों की अनदेखी न सिर्फ आपकी जेब ढीली कर सकती है, बल्कि बीमा क्लेम के वक्त भी आपको भारी मुसीबत में डाल सकती है।
विजिबिलिटी को लेकर क्या हैं नियम?
भारत में कारों के टिंटेड ग्लास को लेकर मोटर व्हीकल एक्ट 1988 और सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स 1989 के तहत गाइडलाइंस तय की गई हैं। इन नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिस (RTO) की होती है। नियम कहते हैं कि कार की सामने और पीछे की विंडशील्ड में कम से कम 70% विजिबिलिटी होनी चाहिए। यानी 70% रोशनी आर-पार होनी चाहिए। वहीं, साइड वाली खिड़कियों के लिए यह सीमा 50% तय की गई है।
ब्लैक फिल्म पर पूरी तरह मनाही
कार की विंडस्क्रीन या खिड़कियों पर ब्लैक फिल्म या किसी भी ऐसी चीज का इस्तेमाल मना है जिसके आर-पार न देखा जा सके। ऐसा इसलिए है ताकि सड़क पर ड्राइवर की विजिबिलिटी बनी रहे और एक्सीडेंट का खतरा कम हो। आप ऐसी कोई भी फिल्म या रिफ्लेक्टिव मटीरियल (शीशे की तरह चमकने वाली) नहीं लगा सकते जो ड्राइवर के देखने में बाधा बने, चाहे वह गाड़ी के अंदर से हो या बाहर से।
कितना लग सकता है जुर्माना?
अगर आप इन नियमों का उल्लंघन करते हैं, तो आपको जुर्माना भरना पड़ सकता है। अगर आपकी कार का टिंट तय सीमा से ज्यादा गहरा है, तो पहली बार में 500 रुपये का चालान कट सकता है। अगर आप दोबारा यही गलती करते हैं, तो 1500 रुपये का जुर्माना देना होगा। ध्यान रखें कि यह जुर्माना अलग-अलग राज्यों में कम या ज्यादा हो सकता है।
आखिर क्यों लगाई गई है रोक?
टिंटेड विंडो पर रोक के पीछे सुरक्षा एक बड़ा कारण है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं...
कम दिखाई देना: बहुत ज्यादा डार्क शीशे होने से रात में या खराब मौसम में देखने में दिक्कत होती है, जिससे एक्सीडेंट की संभावना बढ़ जाती है।
पुलिस जांच में दिक्कत: पुलिस या सुरक्षाबलों के लिए गाड़ी के अंदर देखना मुश्किल हो जाता है, खासकर नाकेबंदी या इमरजेंसी के दौरान।
सुरक्षा का खतरा: गहरे रंग के शीशों की आड़ में तस्करी या मानव तस्करी जैसी अवैध गतिविधियां हो सकती हैं।
पहचानने में मुश्किल: कई बार सुरक्षा कारणों से यह पहचानना जरूरी होता है कि गाड़ी के अंदर कौन बैठा है, लेकिन डार्क ग्लास की वजह से यह संभव नहीं हो पाता।
इंश्योरेंस क्लेम पर पड़ता है असर
अगर आपकी कार में RTO के नियमों से ज्यादा डार्क फिल्म लगी है, तो आपको मोटर इंश्योरेंस क्लेम लेने में पसीने छूट सकते हैं। हालांकि, टिंटेड विंडो होने से पॉलिसी खरीदने में कोई दिक्कत नहीं आती। लेकिन, एक्सीडेंट के समय अगर जांच में यह पाया गया कि गाड़ी के शीशे नियमों के खिलाफ थे, तो बीमा कंपनी आपका क्लेम रिजेक्ट कर सकती है।
क्या हैं इसके सुरक्षित विकल्प?
ब्लैक फिल्म पर बैन के बाद अब कई कंपनियों ने इसके सुरक्षित विकल्प निकाले हैं...
डिटैचेबल सन शेड्स: ये जालीदार शेड्स होते हैं जो सक्शन कप की मदद से शीशे पर चिपक जाते हैं। ये धूप, गर्मी और यूवी किरणों को रोकने में कारगर हैं।
रिट्रैक्टेबल ड्रॉप शेड्स: ये डिटैचेबल शेड्स की तरह ही होते हैं, लेकिन इन्हें कपड़े से बनाया जाता है। इन्हें जरूरत के हिसाब से ऊपर या नीचे रोल किया जा सकता है।
क्लियर फिल्म्स: 3M की CR-70 जैसी विंडो फिल्म एक अच्छा विकल्प हैं। ये विजिबिलिटी को कम किए बिना गर्मी को कम करती हैं और कानूनी रूप से मान्य भी हैं।
डार्क ग्रीन यूवी कट ग्लास: यह ग्लास गाड़ी के अंदर की गर्मी को कम करता है और 82% हानिकारक रेडिएशन को हटाता है। सबसे अच्छी बात यह है कि यह RTO के नियमों का पूरा पालन करता है।