Charanamrit rules: क्या है चरणामृत पीने का सही तरीका? जानिए कथावाचक पुंडरीक गोस्वामी से

मंदिर या पूजा में दिया जाने वाला चरणामृत पवित्र माना जाता है, जो दूध, दही, घी, शहद और चीनी से बनता है। इसे दाएं हाथ से थोड़ी मात्रा में श्रद्धा से ग्रहण करना चाहिए। इसका उद्देश्य भक्ति, विनम्रता और भगवान के आशीर्वाद को स्वीकार करना है, न कि अधिक मात्रा में पीना।

Manali Rastogi
पब्लिश्ड7 Apr 2026, 02:25 PM IST
क्या है चरणामृत पीने का सही तरीका?
क्या है चरणामृत पीने का सही तरीका? (Instagram/ indowestkitchen)

जब भी हम मंदिर जाते हैं या घर में कोई विशेष पूजा होती है, अंत में चरणामृत दिया जाता है। माना जाता है कि इसे पीने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और आत्मा शुद्ध होती है। साथ ही अकाल मृत्यु का भय भी नहीं रहता।

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लेकिन इसका सही लाभ तभी मिलता है जब इसे सही तरीके से ग्रहण किया जाए। अक्सर लोग चरणामृत पीते समय गलतियां कर देते हैं। प्रसिद्ध भागवत कथा वाचक और आध्यात्मिक गुरु श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज ने इसे ग्रहण करने का सही तरीका बताया है।

चरणामृत क्या होता है?

चरणामृत आमतौर पर दूध, दही, घी, शहद और चीनी का मिश्रण होता है। इसे पूजा के दौरान भगवान को अर्पित किया जाता है और बाद में प्रसाद के रूप में भक्तों में बांटा जाता है। चरणामृत को आशीर्वाद, पवित्रता और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। यह शरीर, मन और आत्मा को शुद्ध करने वाला माना जाता है।

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चरणामृत लेने का सही तरीका

  • यह एक साधारण क्रिया लग सकती है, लेकिन इसे पूरी श्रद्धा और ध्यान के साथ करना चाहिए।
  • चरणामृत को हमेशा दाएं हाथ में लेकर आदरपूर्वक ग्रहण करना चाहिए।
  • इसे जल्दी-जल्दी या सामान्य खाने-पीने की चीज की तरह नहीं लेना चाहिए, बल्कि इसे पवित्र मानकर लेना चाहिए।
  • अधिकतर परंपराओं में इसे बहुत कम मात्रा में लेने पर जोर दिया जाता है, जो विनम्रता और सम्मान को दर्शाता है।

मात्रा क्यों महत्वपूर्ण है?

भले ही प्रसाद की मात्रा ज्यादा हो, लेकिन चरणामृत हमेशा थोड़ी मात्रा में ही लिया जाता है। इसका उद्देश्य पेट भरना नहीं, बल्कि श्रद्धा प्रकट करना है। ज्यादा मात्रा में लेना इस भावना को कम कर देता है।

लोग क्या गलती करते हैं?

आजकल की व्यस्त जिंदगी में पूजा-पाठ कई बार सिर्फ एक औपचारिकता बन जाता है। लेकिन धार्मिक गुरुओं के अनुसार, चरणामृत लेते समय मन शांत और कृतज्ञ होना चाहिए। इसे गिराना या बर्बाद करना भी गलत माना जाता है, क्योंकि यह पवित्र होता है।

इस परंपरा का गहरा अर्थ

असल में चरणामृत सिर्फ एक नियम नहीं है। यह समर्पण, विनम्रता और भगवान से जुड़ाव का प्रतीक है। इसे ग्रहण करना ईश्वर के आशीर्वाद को स्वीकार करने जैसा है। भले ही यह पूजा का छोटा हिस्सा लगे, लेकिन इसका महत्व बहुत बड़ा है। इसलिए इसे सही तरीके और भावना के साथ लेना जरूरी है, क्योंकि आध्यात्मिक कार्यों में छोटी-सी बात भी मायने रखती है।

(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)

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