आज से छठ व्रत का शुभारंभ हो गया है। दीवाली से पहले से चल रही साफ-सफाई की प्रक्रिया और गंगा स्नान की परंपरा पूरी होने के बाद आज कद्दू-भात का अवसर आ गया है। छठ व्रत का आरंभ नहाय-खाय से होता है और आज नहाय-खाय है।
छठ व्रती आज जलाशयों में स्नान करेंगी और शुद्ध-सात्विक भोजन बनेगा। परंपरा के अनुसार आज भोजन में कद्दू या लौकी की सब्जी को शामिल करना अनिवार्य हो गया है। इसी वजह से आज के दिन को कद्दू-भात के दिन से भी जाना जाता है।
नहाय-खाय के अगले दिन यानी 26 अक्टूबर, रविवार को खरना का पवित्र दिन आएगा। खरना पर छठ का महाप्रसाद बनता और उस दिन छठ व्रती सबसे पहले महाप्रसाद ग्रहण करती हैं। खरना का प्रसाद आसपास के लोगों को खिलाने का प्रचलन है। खरना के अगले दिन संध्या अर्घ्य की परंपरा है और उसके अगली सुबह के अर्घ्य के साथ छठ व्रत पूरा हो जाता है।
बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, प. बंगाल के कुछ हिस्सों समेत देश के कई अन्य इलाकों में भी छठ महापर्व मनाया जाता है। इन इलाकों के लोग चूंकि देश-दुनिया में फैले हुए हैं, इसलिए छठ व्रत का आयोजन हर जगह होता है।
छठ पर्व को महापर्व इसलिए कहा जाता है कि इसमें पवित्रता के नियमों का बहुत ध्यान से पालन किया जाता है। यह पर्व करने वाले छठ व्रती निर्जला उपवास करते हैं। वैसे तो ज्यादातर महिलाएं छठ व्रती होती हैं, लेकिन पुरुष भी छठ व्रत करते हैं।
छठ पर्व पर भगवान सूर्य की आराधना होती है। छठ व्रत के तीसरे दिन डूबते सूर्य को जबकि चौथे और अंतिम दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। पूरे विश्व में ऐसी प्रथा कहीं नहीं है जहां डूबते सूर्य की भी पूजा की जाती हो। लेकिन सनातन परंपरा में डूबते सूर्य के महत्व को भी स्वीकार किया गया है।
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