Chhath Vrat Katha in Hindi: छठ पूजा सिर्फ सूर्य देव की उपासना नहीं है, बल्कि यह लोक आस्था, पौराणिक मान्यताओं और विश्वास का संगम है। इस व्रत की शुरुआत को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं, जिनमें द्रौपदी, सुकन्या और नागकन्याओं की कथाएं शामिल हैं। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में छठी मैया की पूजा लोकगीतों और रीति-रिवाजों के साथ की जाती है।
द्रौपदी और सूर्य व्रत की कथा
भविष्योत्तर-पुराण के अनुसार, जब पांडव वनवास में थे और युधिष्ठिर भोजन की व्यवस्था को लेकर चिंतित थे, तब 80 हजार मुनि उनके आश्रम में आए। द्रौपदी ने अपने पुरोहित धौम्य ऋषि से समाधान पूछा। उन्होंने सूर्य देव का व्रत करने की सलाह दी, जिसे रवि षष्ठी कहा गया। यही व्रत आगे चलकर छठ पूजा के रूप में लोक परंपरा में शामिल हो गया।
कर्ण की श्रद्धा
वहीं, दानवीर कर्ण को सूर्य उपासना का प्रथम साधक माना जाता है। वह रोज सुबह नदी में स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देते थे। उनकी दिनचर्या से ही सूर्य पूजा की परंपरा शुरू हुई।
राजा प्रियव्रत और छठी मैया की कृपा
एक कथा के अनुसार, राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी संतान सुख से वंचित थे। उन्होंने महर्षि कश्यप के मार्गदर्शन में यज्ञ किया। यज्ञ के बाद रानी गर्भवती हुईं लेकिन मृत पुत्र को जन्म दिया। दुखी राजा ने जीवन त्यागने का निर्णय लिया, तभी एक दिव्य देवी प्रकट हुईं और कहा, “मैं ब्रह्मा की पुत्री और सृष्टि की छठी शक्ति हूं। मुझे षष्ठी देवी या छठी मैया कहा जाता है।” देवी ने राजा से पूजा का आग्रह किया। राजा ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को विधिवत पूजा की और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। कहा जाता है कि तभी से छठी मैया की पूजा की परंपरा शुरू हुई।
श्रीराम और सीता की सूर्य पूजा
त्रेता युग में लंकापति रावण का वध करने के बाद भगवान श्रीराम को ब्रह्महत्या का पाप लगा। ऋषि मुग्दल ने उन्हें कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य देव की पूजा करने का उपाय बताया। श्रीराम और माता सीता ने छह दिन तक ऋषि के आश्रम में रहकर विधिवत सूर्य पूजा की। मान्यताओं के अनुसार यही परंपरा आगे चलकर छठ पर्व के रूप में लोक आस्था में शामिल हो गई।
सुकन्या और नागकन्याओं की कथा
इसके अलावा एक और कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या ने नागकन्याओं के उपदेश पर सूर्य व्रत किया था। यह कथा बताती है कि छठ व्रत सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव भी है, जो शक्ति और श्रद्धा को दर्शाता है।
छह माताओं और कार्तिकेय की कथा
एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान शिव की शक्ति से उत्पन्न कार्तिकेय को छह कृतिकाओं ने दूध पिलाकर पाला था। इसलिए उन्हें षाण्मार्तु कहा जाता है। उन्होंने एक साथ दूध पीने के लिए छह मुख बनाए, जिससे उन्हें षडानन और षण्मुख भी कहा गया। कृतिका नक्षत्र भी छह तारों का समूह है और स्कन्द षष्ठी व्रत का उल्लेख भी मिलता है।