दशा माता की कहानी: दशा माता का व्रत आज, माता रानी प्रसन्न करने के लिए पढ़ें ये व्रत कथा

दशा माता व्रत हिंदू धर्म में सुख-समृद्धि और अच्छी किस्मत के लिए किया जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा से व्रत और पूजा करने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं और घर में धन-धान्य बढ़ता है। कथा के अनुसार देवी का अपमान करने से दरिद्रता आती है, जबकि पूजा करने से लक्ष्मी का वास होता है।

Manali Rastogi
अपडेटेड13 Mar 2026, 08:48 AM IST
दशा माता की कहानी
दशा माता की कहानी

हिंदू धर्म में कई ऐसे व्रत और परंपराएं हैं जिन्हें परिवार की खुशहाली और समृद्धि के लिए किया जाता है। इन्हीं में से एक प्रमुख व्रत दशा माता व्रत है। यह व्रत खासतौर पर महिलाएं करती हैं। मान्यता है कि इस व्रत से जीवन की परेशानियां कम होती हैं, घर की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

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धार्मिक विश्वास के अनुसार, जो महिलाएं श्रद्धा और नियम से दशा माता का व्रत करती हैं, उनके जीवन में आने वाली बाधाएं धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं और घर में खुशहाली बढ़ती है। मान्यताओं के अनुसार दशा माता को देवी लक्ष्मी और देवी पार्वती का रूप माना जाता है। इन्हें सौभाग्य, समृद्धि और अच्छी किस्मत देने वाली देवी माना जाता है। कहा जाता है कि जो लोग श्रद्धा से इनकी पूजा करते हैं, उनकी खराब किस्मत सुधरने लगती है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।

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दशा माता को दयालु और कल्याण करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। उनकी सवारी ऊंट बताई जाती है। उनके हाथों में त्रिशूल और तलवार जैसे अस्त्र होते हैं। कई स्थानों पर दशा माता की पूजा पीपल के पेड़ के पास की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि पीपल के वृक्ष में भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी का वास होता है। इसलिए इस दिन पीपल की पूजा करना भी शुभ माना जाता है।

दशा माता व्रत क्यों किया जाता है?

यह व्रत मुख्य रूप से जीवन की खराब परिस्थितियों को सुधारने के लिए किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि अगर किसी व्यक्ति के जीवन में लगातार समस्याएं आ रही हों या काम बार-बार बिगड़ रहे हों, तो दशा माता का व्रत करने से स्थिति बेहतर हो सकती है।

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कुछ लोग यह भी मानते हैं कि इस व्रत से ग्रहों की प्रतिकूल स्थिति का प्रभाव कम होता है। इसी कारण परिवार की सुख-शांति और उन्नति के लिए कई महिलाएं इस व्रत को श्रद्धा से करती हैं। पंचांग के अनुसार यह व्रत होली के बाद चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को रखा जाता है। वर्ष 2026 में यह व्रत 13 मार्च को मनाया जाएगा।

दशा माता की कहानी (Dasha Mata Ki Kahani)

प्राचीन समय में एक राजा थे जिनका नाम नल था और उनकी पत्नी का नाम दमयंती था। दोनों अपने राज्य में सुख-शांति से जीवन बिता रहे थे। एक दिन एक ब्राह्मणी रानी के पास आई। उसके गले में पीले धागे का एक डोरा बंधा हुआ था। रानी ने उससे उस डोरे के बारे में पूछा। ब्राह्मणी ने बताया कि यह दशा माता का डोरा है, जिसे पहनने से घर में धन-धान्य और सुख-समृद्धि बनी रहती है। उसने रानी को भी ऐसा ही एक डोरा दे दिया।

जब राजा नल ने रानी के गले में डोरा देखा तो उन्होंने इसके बारे में पूछा। रानी ने पूरी बात बता दी। राजा को यह बात पसंद नहीं आई और उन्होंने कहा कि जब हमारे पास सब कुछ है तो इस डोरे की क्या जरूरत है। उन्होंने डोरा तोड़कर फेंक दिया। रानी ने इसे देवी का अपमान बताया, लेकिन राजा ने उनकी बात नहीं मानी।

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उसके बाद राजा को कई दिनों तक एक ही सपना आने लगा। सपने में दो स्त्रियां दिखाई देती थीं। एक कहती थी कि वह इस घर से जा रही है, जबकि दूसरी कहती थी कि वह यहां रहने आ रही है। जब राजा ने उनसे उनके नाम पूछे तो जाने वाली स्त्री ने अपना नाम लक्ष्मी बताया और आने वाली स्त्री ने खुद को दरिद्रता कहा। यह सुनकर राजा घबरा गया।

कुछ ही समय में राज्य की समृद्धि समाप्त हो गई। सोना-चांदी मिट्टी के समान हो गया। राजा और रानी को अपना महल छोड़ना पड़ा और वे अपने छोटे बेटे के साथ जंगल में रहने लगे। भूख-प्यास से परेशान होकर वे जगह-जगह मदद मांगते रहे, लेकिन कहीं उन्हें सहारा नहीं मिला। कई कठिन घटनाएं उनके साथ हुईं—कभी भोजन नहीं मिला, कभी कपड़े खो गए, और कभी उन पर चोरी का आरोप भी लगा।

आखिरकार वे एक बगीचे में मजदूरी करने लगे। उसी बगीचे की मालकिन एक दिन देवी की कथा सुनकर डोरा बांध रही थी। यह देखकर रानी ने भी कथा सुनी और फिर से दशा माता का डोरा धारण किया।

उस रात राजा को फिर सपना आया। इस बार एक स्त्री कह रही थी कि वह जा रही है और दूसरी कह रही थी कि वह लौटकर आ रही है। जब राजा ने नाम पूछा तो आने वाली ने अपना नाम लक्ष्मी बताया और जाने वाली ने खुद को दरिद्रता कहा। लक्ष्मी ने कहा कि यदि रानी श्रद्धा से देवी का व्रत और कथा करती रहेंगी तो वह हमेशा उनके घर में रहेंगी।

इसके बाद धीरे-धीरे राजा और रानी के अच्छे दिन लौटने लगे। जिन-जिन स्थानों पर वे पहले गए थे, वहां से उनकी खोई हुई चीजें वापस मिल गईं। उनका बेटा भी जीवित मिल गया और अंत में वे अपने राज्य वापस पहुंच गए। महल में फिर से समृद्धि लौट आई और सब कुछ पहले जैसा हो गया। कथा के अंत में यह संदेश दिया जाता है कि श्रद्धा और विश्वास के साथ दशा माता की पूजा करने से जीवन की कठिनाइयां दूर हो सकती हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है।

(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)

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