Delhi Electricity Bill Hike: दिल्ली में रहने वाले लाखों लोगों को बड़ा झटका लगने वाला है। दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग (DERC) ने बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) को एक स्पेशल सरचार्ज बढ़ाने की मंजूरी दे दी है। यह फैसला बिजली कंपनियों की तरफ से बिजली खरीदने में आने वाली लागत में बढ़ोतरी की भरपाई करने के लिए लिया गया है। इस फैसले का सबसे ज्यादा असर पूर्वी और मध्य दिल्ली के उन इलाकों पर पड़ेगा, जहां बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड (BYPL) बिजली की सप्लाई करती है।
इस वजह से महंगी हो रही बिजली
दरअसल, बिजली बिलों में होने जा रही यह बढ़ोतरी फ्यूल एंड पावर परचेज एडजस्टमेंट सरचार्ज (FPPAS) के कारण हो रही है। यह परिवर्तनीय शुल्क बिजली कंपनियों को तब राहत देता है, जब अचानक बिजली खरीदने की लागत बढ़ जाती है। नियामक संस्था DERC ने अप्रैल 2026 के लिए इस सरचार्ज की अपर लिमिट को बढ़ाने की मंजूरी दी है। अधिकारियों का कहना है कि ग्लोबल मार्केट में अनिश्चितता और ईंधन की कीमतों में आए भारी उछाल के कारण बिजली कंपनियों के लिए बिजली खरीदना काफी महंगा हो गया था। इस बढ़े हुए खर्च का बोझ अब उपभोक्ताओं के मंथली बिल पर एक मामूली बढ़ोतरी के रूप में दिखाई देगा।
किस इलाके में कितना बढ़ेगा बिजली बिल?
इस नए आदेश के बाद अलग-अलग इलाकों के उपभोक्ताओं पर अलग-अलग वित्तीय बोझ पड़ने वाला है।
BYPL क्षेत्र (पूर्वी और मध्य दिल्ली): अगर आपके घर का स्वीकृत लोड 2 किलोवाट (kW) है और आप महीने में 600 यूनिट बिजली खर्च करते हैं, तो आपका मंथली बिल लगभग 170 रुपये बढ़ सकता है।
BRPL क्षेत्र (दक्षिण और पश्चिम दिल्ली): बीएसईएस राजधानी के समान श्रेणी वाले उपभोक्ताओं के बिल में करीब 102 रुपये की वृद्धि होने का अनुमान है।
TPDDL क्षेत्र (उत्तरी दिल्ली): टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड के दायरे में आने वाले उत्तरी दिल्ली के उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात यह है कि यहां सरचार्ज में बेहद मामूली बढ़ोतरी की गई है, जिससे उनके बिल पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा।
इन लोगों को बड़ी राहत
बता दें कि बिजली बिल बढ़ोतरी के बीच उन लोगों को बड़ी राहत है, जो दिल्ली सरकार की बिजली सब्सिडी स्कीम का फायदा उठा रहे हैं। अधिकारियों ने कहा कि जिन उपभोक्ताओं को बिजली पर सब्सिडी मिलती है, उन पर इस बढ़ोतरी का कोई असर नहीं होगा। इसके पीछे की वजह यह है कि सरकार की तरफ से दी जाने वाली सब्सिडी कुल बिल की रकम पर न होकर, उपभोक्ता की ओर से खर्च की गई बिजली की यूनिट पर आधारित होती है।
आमतौर पर DERC की ओर से तय की जाने वाली बिजली की दरें अनुमानित लागत पर आधारित होती हैं। लेकिन कोयले के दाम, परिवहन खर्च और आयातित ईंधन की कीमतों में बदलाव के कारण वास्तविक लागत घटती-बढ़ती रहती है। डिस्कॉम कंपनियां टैरिफ संशोधन का इंतजार करने के बजाय इसी FPPAS व्यवस्था के तहत इस अतिरिक्त रकम की वसूली करती हैं।