Dev Uthani Ekadashi Vrat Katha Hindi:देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की यह कथा जरूर सुनें, मिलेगा पुण्य

Dev Uthani Ekadashi Vrat Katha: देवउठनी एकादशी व्रत 1 और 2 नवंबर को है। गृहस्थ लोग 1 नवंबर को और वैष्णव लोग 2 नवंबर को व्रत रखेंगे। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्‍णु की विधि विधान से पूजा करके उनको जगाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु से जुड़ी व्रत कथा जरूर सुनें। इससे पुण्य मिलेगा।

एडिटेड बाय Jitendra Singh
पब्लिश्ड31 Oct 2025, 09:55 PM IST
Dev Uthani Ekadashi Vrat Katha:  व्रत कथा का पाठ करने से दोगुना फल प्राप्‍त होता है।
Dev Uthani Ekadashi Vrat Katha: व्रत कथा का पाठ करने से दोगुना फल प्राप्‍त होता है।(HT)

Dev Uthani Ekadashi Vrat Katha: हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवउठनी का पर्व मनाया जाता है। इस बार यह पर्व कल यानी 1 नवंबर को मनाया जाएगा। इसे प्रबोधिनी एकादशी, हरि प्रबोधिनी एकादशी या देवोत्थान एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्‍णु के साथ सभी देवता गण चार महीने की निद्रा के बाद जागृत होते हैं और सृष्टि का कार्यभार संभालते हैं। इस दिन भगवान विष्‍णु की विधि-विधान से पूजा की जाती है और उनकी प्रिय वस्‍तुओं का भोग लगाया जाता है। इसके साथ ही पूजा में देवउठनी एकादशी की व्रत कथा का पाठ किया जाता है। इसका पाठ करने से आपको भगवान विष्‍णु का आशीर्वाद मिलने के साथ ही आपको व्रत का दोगुना फल प्राप्‍त होता है।

देवउठनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास का समापन होता है और सभी शुभ, मांगलिक और धार्मिक कार्यों की शुरुआत फिर से होती है। देवउठनी एकादशी का व्रत 1 और 2 नवंबर को है। इस बार गृहस्थ लोग देवउठनी एकादशी का व्रत 1 नवंबर को करेंगे, जबकि वैष्णव लोग देवउठनी एकादशी का व्रत 2 नवंबर को रहेंगे। इसी दिन तुलसी विवाह भी कराया जाता है। पूरे विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। भगवान विष्णु की पूजा के समय देवउठनी एकादशी की व्रत कथा सुननी चाहिए।

देवउठनी एकादशी व्रत कथा

बहुत समय पहले की बात है। एक राज्य में एक धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय राजा राज करते थे। उनके शासन में हर व्यक्ति चाहे मंत्री हो या प्रजा सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे। उस दिन कोई अन्न ग्रहण नहीं करता था। सभी भगवान विष्णु की पूजा और भक्ति में लीन रहते थे। एक दिन दूसरे राज्य से एक व्यक्ति नौकरी की तलाश में उस राजा के दरबार में पहुंचा। राजा ने कहा, 'तुम्हें नौकरी मिल सकती है, लेकिन हमारे राज्य का एक नियम है कि एकादशी के दिन कोई अन्न नहीं खाता। सिर्फ फलाहार करता है। उस व्यक्ति ने यह नियम मानते हुए, उस राज्य में नौकरी करना शुरू कर दिया।

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इसके बाद जब एकादशी आई, तब सभी लोग फलाहार ग्रहण कर रहे थे। उस व्यक्ति को भी दूध और फल दिए गए, लेकिन फलाहार करके उसकी भूख नहीं मिटी और न मन शांत हुआ। तब वह राजा के पास पहुंचा और बोला महाराज मैं बिना अन्न ग्रहण किए नहीं रह सकता, कृपया मुझे अन्न ग्रहण करने की अनुमति दे दीजिए। राजा ने उस व्यक्ति को बहुत समझाया कि आज एकादशी है और राज्य के नियमानुसार आज के दिन अन्न का सेवन करना मना है। लेकिन वह व्यक्ति नहीं माना। अंततः राजा ने कहा, "ठीक है, जो तुम्हें उचित लगे, वही करो।" वह व्यक्ति नदी किनारे गया, स्नान किया और वहीं अन्न पकाने लगा। जब भोजन तैयार हो गया, तो उसने बड़े भाव से भगवान विष्णु को पुकारा "हे प्रभु! आइए, भोजन तैयार है।"

भगवान विष्णु ने किया भोजन

प्रेम पूर्वक उसकी मनुहार सुन कर पीतांबर धारण किए, चार भुजाओं वाले दिव्य रूप में भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हो गए। वे उसके साथ बैठकर प्रेम पूर्वक भोजन करने लगे। भोजन समाप्त होने पर भगवान अदृश्य हो गए। कुछ दिन बाद फिर एकादशी आई। उस व्यक्ति ने राजा से कहा कि महाराज, इस बार मुझे दुगना अन्न चाहिए। राजा ने आश्चर्य से पूछा, "दुगना क्यों?"

वह बोला, "राजन, पिछली बार मेरे साथ भगवान विष्णु भी भोजन करने आए थे, इसलिए आपने जो दिया था वह अन्न कुछ कम पड़ गया।" राजा यह सुनकर चकित रह गया। उसने सोचा, "मैं तो वर्षों से व्रत और पूजा करता हूं, फिर भी मुझे भगवान के दर्शन नहीं हुए"। राजा ने निश्चय किया कि अगली एकादशी पर वह भी उसके साथ जाएगा।

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अगली एकादशी को राजा उसके साथ नदी किनारे गया और पेड़ के पीछे छिप गया। वह व्यक्ति फिर स्नान करके भोजन बनाने लगा और भगवान को पुकारने लगा "हे विष्णु! आइए, भोजन तैयार है।" लेकिन इस बार भगवान नहीं आए। दिन बीत गया, पर जब प्रभु नहीं आए तो वह व्यक्ति दुखी होकर बोला, "हे प्रभु, यदि आप नहीं आए तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगा।"

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इतना कहते ही वह नदी की ओर बढ़ा। उसके सच्चे भाव और प्रेम को देखकर भगवान विष्णु तुरंत प्रकट हो गए और बोले "रुको भक्त! मैं आ गया हूं।" भगवान ने उसके साथ फिर से भोजन किया और कहा "अब तुम मेरे धाम चलो।" फिर उन्होंने अपने दिव्य विमान में बैठाकर उस भक्त को वैकुंठ ले गए।

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यह सब देखकर राजा स्तब्ध रह गया। उसे एहसास हुआ कि वह तो सालों से व्रत रखता रहा, लेकिन उसका मन केवल नियमों में बंधा था, भक्ति में नहीं। जबकि, उस व्यक्ति ने नियम तो तोड़ा, पर उसका भाव सच्चा था और भगवान ने उसी सच्ची भक्ति को स्वीकार किया। उस दिन से राजा का जीवन बदल गया। उसने समझ लिया कि भगवान की प्राप्ति उपवास से नहीं, बल्कि सच्चे मन, श्रद्धा और प्रेम से होती है। उसने भी पूरे भाव से पूजा शुरू कर दी और जीवन के अंत में स्वर्ग प्राप्त किया।

(डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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