आज देवशयनी एकादशी, क्यों कहते हैं इसे मोक्ष का द्वार? पहले जानें वो कथा जिससे शुरू हुई देवशयनी एकादशी की महिमा

Devshayani Ekadashi 2025 Vrat Katha: देवशयनी एकादशी 6 जुलाई को है। इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं और चातुर्मास की शुरुआत होती है। राजा मांधाता और श्रीकृष्ण की दो कथाओं में इस व्रत की महिमा का वर्णन मिलता है। ये दिन मोक्ष और पुण्य का प्रतीक है।

Priya Shandilya
पब्लिश्ड6 Jul 2025, 11:35 AM IST
देवशयनी एकादशी व्रत कथा
देवशयनी एकादशी व्रत कथा(Pinterest)

Devshayani Ekadashi vrat katha in hindi: आज 6 जुलाई 2025 को आषाढ़ महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसे देवशयनी या हरिशयनी एकादशी कहते हैं। ये वही दिन है जब मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु चार महीने के लिए सोने चले जाते हैं। इस दिन से ‘चातुर्मास’ की शुरुआत होती है और पूरे चार महीने तक मांगलिक कामकाज जैसे शादी-विवाह आदि पर रोक मानी जाती है। इस खास मौके पर देवशयनी एकादशी से जुड़ी दो बेहद प्रचलित कथाएं भी हैं, जिन्हें जानना हर भक्त के लिए जरूरी माना जाता है।

देवशयनी एकादशी व्रत कथा: राजा मांधाता और सूखे की त्रासदी

बहुत पुराने समय की बात है। सतयुग में एक महान राजा थे राजा मांधाता। वे न सिर्फ धर्म के मार्ग पर चलने वाले, बल्कि हर रूप में एक आदर्श शासक माने जाते थे। प्रजा की भलाई ही उनके लिए सबसे बड़ी पूजा थी। उनके राज्य में किसी चीज की कमी नहीं थी, खेतों में फसल लहराती थी, नदियां बहती थीं, और हर चेहरे पर मुस्कान रहती थी।

लेकिन एक दिन समय ने करवट ली। लगातार तीन साल तक बारिश नहीं हुई। न खेतों में हरियाली रही, न तालाबों में पानी। धीरे-धीरे भयंकर अकाल फैलने लगा। लोग परेशान, प्यासे और भूखे हो गए। मंदिरों में पूजा-पाठ हुआ, यज्ञ हुए, पर आसमान से बूंद तक नहीं गिरी।

आखिरकार प्रजा राजा मांधाता के पास पहुंची। राजा ने खुद से पूछा, “जब सब कुछ धर्म के अनुसार किया, फिर ये विपत्ति क्यों?” जवाब पाने के लिए वे महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुंचे।

ऋषि ने बताया, “राजन, ये सतयुग है। यहां सबसे छोटे पाप का भी असर बड़ा होता है। लेकिन इसका उपाय है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी व्रत रखो, भगवान विष्णु की पूजा करो, और रात भर जागरण करो। इससे संकट दूर होगा।”

राजा ने वही किया। पूरी श्रद्धा से व्रत रखा, कथा सुनी, और भगवान की पूजा की।

फिर अगली सुबह चमत्कार हुआ, आकाश में बादल छाए, बिजली चमकी और जोरदार बारिश होने लगी। पूरा राज्य फिर से हरा-भरा हो गया।

देवशयनी एकादशी व्रत कथा: श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर का संवाद

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “मधुसूदन, आषाढ़ महीने की एकादशी का क्या महत्व है?” 

श्रीकृष्ण ने मुस्कराते हुए जवाब दिया, “इस एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। अगले चार महीने यानी कार्तिक शुक्ल एकादशी तक वे जागते नहीं। इसी अवधि को चातुर्मास कहा जाता है।”

भगवान ने कहा कि इस दिन कमल से भगवान विष्णु की पूजा, उपवास और रात्रि जागरण करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। यहां तक कि ब्रह्मा जी भी ऐसे पुण्य का हिसाब नहीं लगा सकते।

उन्होंने आगे बताया, “मेरे दो रूप होते हैं, एक राजा बलि के यहां रहता है और दूसरा क्षीरसागर में सोता है। इस व्रत को करने वाला व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है।”

चातुर्मास में सात्विक जीवन जीने, संयम रखने, ब्रह्मचर्य का पालन करने और भक्ति में लीन रहने को बहुत शुभ माना गया है।

देवशयनी एकादशी क्यों मानी जाती है खास?

इस दिन से चातुर्मास की शुरुआत होती है यानी 4 महीने के लिए भगवान विष्णु निद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान मांगलिक कार्य नहीं किए जाते जैसे विवाह, गृहप्रवेश आदि। इस दिन का व्रत पापों का नाश, मन की शांति और मोक्ष दिलाने वाला माना जाता है। यह दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा और जागरण के लिए बहुत पावन होता है।

 

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