
भारतीय फिल्म उद्योग ने आज एक असली और अनोखे कलाकार को खो दिया और वो हैं धर्मेंद्र। वो ऐसे हीरो थे जिन्होंने मांसपेशियों, मशीनों और बॉक्स ऑफिस नंबरों से पहले ही असली हीरोइज़्म का मतलब तय कर दिया था। ऐसे समय में लोग उनके पुराने इंटरव्यू देखने लगते हैं ताकि उस व्यक्ति को याद किया जा सके जो पर्दे के पीछे था।
आप की अदालत में राजत शर्मा के साथ उनकी बातचीत उन पलों में से एक है जो उनके दिल को सबसे साफ तरीके से दिखाती है। इसी इंटरव्यू में धर्मेंद्र ने बताया था कि लोग शुरुआत में उन्हें काम देने के लिए तैयार नहीं थे।
जब राजत शर्मा ने उनसे सख्त घर में पले-बढ़े होने के बारे में पूछा, तो धर्मेंद्र मुस्कुरा कर एक याद सुनाने लगे, जो उनके बचपन की झलक दिखाती है।
उन्होंने कहा,“मेरे पिताजी स्कूल के टीचर थे, सोचिए कितने अनुशासन में रखते होंगे। एक बार मैं बहुत छोटा था और उनके पास सोना चाहता था। मां से पूछा तो उन्होंने कहा, ‘जाओ, सो जाओ।’
लेकिन जैसे ही पिताजी ने मुझे लिटाया, बोले,‘पहाड़े सुना मुझे।’ मतलब गुणा-भाग सुनाने लगे। मैंने सोचा सोने आया था, मरने नहीं!” हंसी के पीछे भी उनकी मुश्किल भरी जिंदगी से निकली मजबूती साफ दिखती है।
पहली बार जब उन्होंने थिएटर में फिल्म देखी, तो सब बदल गया। स्कूल बंक करना उनकी नजर में आज़ादी था, मगर उसके बाद जो महसूस हुआ, वह उससे भी बड़ा था। उन्होंने बताया, “मैंने पहली फिल्म ‘शहीद’ देखी। थिएटर से बाहर निकला तो सोचा—ये लोग कहाँ रहते हैं? मैं वहीं जाना चाहता हूं। शायद दिल की सच्चाई देखकर भगवान पिघल गए।”
यही ख्वाहिश उन्हें पंजाब के एक मध्यमवर्गीय घर से मुंबई ले आई बिना किसी योजना, बस एक सपना लेकर। राजत शर्मा ने याद दिलाया कि कई निर्माताओं ने शुरू में उन्हें ठुकरा दिया था। कुछ ने तो कहा कि फिल्मों की जगह वह कुश्ती करें। धर्मेंद्र ने बिना किसी शिकायत के उन दिनों को याद किया।
उन्होंने कहा, “मुझे ‘बंदिनी’ के लिए साइन किया था, लेकिन विमल दा और गुरु दत्त साहब फिल्म बनाने में समय लेते थे। मुंबई जैसे शहर में मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले के लिए जीना मुश्किल होता है। बाद में मुझे ‘लव इन शिमला’ के स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलाया गया। मुझे देखकर बोल दिए ‘हमें हीरो चाहिए, हॉकी खिलाड़ी नहीं।’”
ये बातें किसी को भी तोड़ सकती थीं। लेकिन उन्होंने वही बात कही जिसने उनकी यात्रा को परिभाषित किया, “मैंने अपनी इज्जत संभालकर रखी। काम पूजा है। मैं सिर्फ काम के बारे में सोचता रहा।”
आखिरकार 1960 में किस्मत ने उनके लिए दरवाज़े खोले। धर्मेंद्र ने दिल भी तेरा, हम भी तेरे से डेब्यू किया, जिसे अर्जुन हिंगोरानी ने निर्देशित किया वही व्यक्ति जो बाद में उनके करियर में बहुत महत्वपूर्ण बने।
यह कोई भव्य लॉन्च नहीं था, न ही रातोंरात स्टारडम मिली। लेकिन इसी फिल्म ने एक ऐसे सितारे का जन्म करवाया, जिसे भारत जल्द ही दिल से प्यार करने लगा। छोटे से शुरुआत के बाद उन्होंने कड़ी मेहनत, अनुशासन और सच्चाई से अपना मुकाम बनाया।
जिस व्यक्ति को कभी कहा गया कि वह “बहुत ताकतवर दिखता है,” वही आगे चलकर अपने दौर का सबसे पसंदीदा रोमांटिक और एक्शन हीरो बना। धर्मेंद्र इस बात का जीता-जागता उदाहरण हैं कि सपने दिए नहीं जाते कमाए जाते हैं।
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