
Tattoo Effect on Immune System: टैटू अब केवल कला या विद्रोह का प्रतीक नहीं रहे, बल्कि ये व्यक्तिगत पहचान और जीवन के अनुभवों का एक स्थायी दस्तावेज बन चुके हैं। चाहे वह किसी प्रियजन का नाम हो, कोई प्रेरक संदेश, या फिर किसी खास जगह की निशानी, लोग अपने शरीर पर अपनी कहानियां उकेरना पसंद करते हैं। विशेष रूप से युवा पीढ़ी Gen Z और मिलेनियल्स के लिए टैटू खुद को व्यक्त करने का एक शक्तिशाली माध्यम बन गया है। यह रुझान पश्चिमी देशों से निकलकर अब तेजी से भारत समेत पूरी दुनिया में फैल रहा है।
पुराने जमाने में लोग यात्रा से चुंबक, हस्तशिल्प या टी-शर्ट जैसे यादगार वस्तुएं लाते थे, लेकिन अब कई यात्री एक नया और ज्यादा व्यक्तिगत विकल्प चुन रहे हैं- यात्रा के दौरान टैटू बनवाना। इस ट्रेंड को 'टैटूरिज्म' (Tattourism) नाम दिया गया है। ये परमानेंट निशान यात्रियों को उस जगह और अनुभव से गहराई से जुड़ने का मौका देते हैं, जो कभी खत्म नहीं होता।
Hostelworld की एक स्टडी में पाया गया है कि 18 से 35 वर्ष के 40% से अधिक यात्रियों ने यात्रा के दौरान टैटू बनवाया है। इनमें से आधे से अधिक तो अपनी यात्रा की योजना ही खास तौर पर टैटू बनवाने के लिए बनाते हैं। ResearchGate की एक स्टडी के मुताबिक, इस तरह के टैटू व्यक्तिगत अनुभव, सामाजिक जुड़ाव, भावना और यादों का एक जटिल मेल होते हैं, जो व्यक्ति के आत्म-बोध को आकार देते हैं। ये ऐसे यादगार हैं जो न जगह घेरते हैं और न ही वजन बढ़ाते हैं।
स्विट्जरलैंड के लुगानो विश्वविद्यालय के सैंटियागो गोंजालेज के अनुसार, 'जब आप टैटू बनवाते हैं, तो आप वास्तव में अपने शरीर में स्याही डालते हैं। यह केवल एक कॉस्मेटिक प्रभाव नहीं है, बल्कि प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) पर भी इसके प्रभाव पड़ते हैं।' यह एक ऐसा सच है जिस पर शायद ही कोई ध्यान देता है।
चूहों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि टैटू की स्याही तुरंत लसीका वाहिकाओं (lymphatic vessels) के माध्यम से पास के लिम्फ नोड्स (Lymph Nodes) तक पहुंच जाती है। लिम्फ नोड्स हमारे इम्यून सिस्टम के चौकीदार होते हैं। अध्ययन में टैटू वाले जानवरों के लिम्फ नोड्स में पुरानी सूजन (Chronic Inflammation) पाई गई, और ये नोड्स स्याही से रंगीन हो गए थे। टैटू वाले मनुष्यों के लिम्फ नोड बायोप्सी में भी इसी तरह की सूजन और रंगाई देखी गई है।
वैज्ञानिकों ने टैटू की स्याही के शरीर के अंदरूनी सफर का बारीकी से अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि मैक्रोफेज (Macrophages) ने स्याही को पकड़ लिया, जिससे नोड्स में तीव्र सूजन पैदा हो गई। लेकिन यह चक्र यहीं नहीं रुका। लगभग 24 घंटों के भीतर, वे मैक्रोफेज मर गए और स्याही को छोड़ दिया। फिर अन्य मैक्रोफेज ने उस स्याही को पकड़ा, और वे भी मर गए।
यह चक्र लगातार चलता रहता है, जिससे पुरानी सूजन का एक ऐसा चक्र बन जाता है जो टैटू वाली जगह के ठीक होने के बाद भी लंबे समय तक बना रहता है। प्रयोग के अंत में, टैटू बनवाने के दो महीने बाद भी, चूहों के लिम्फ नोड्स में सूजन के निशान सामान्य से पांच गुना अधिक थे। मैक्रोफ्रेज हमारी प्रतिरक्षा कोशिकाएं हैं जो मलबे, रोगजनकों और मृत कोशिकाओं को साफ करती हैं।
क्या यह सूजन हमारे इम्यून सिस्टम के कार्य को प्रभावित करती है? वैज्ञानिकों ने इसी बात का परीक्षण करने के लिए टैटू वाली त्वचा में टीके लगाए और परिणाम चौंकाने वाले थे। टैटू वाले चूहों की कोविड-19 mRNA वैक्सीन के प्रति एंटीबॉडी प्रतिक्रिया सामान्य चूहों की तुलना में काफी कमजोर थी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मैक्रोफेज स्याही से इतने भरे हुए थे कि वे कोविड-19 वैक्सीन को कम पकड़ पाए।
वहीं, प्रोटीन-आधारित इन्फ्लुएंजा वैक्सीन के लिए इसी सूजन ने एंटीबॉडी रिएक्शन को मजबूत कर दिया, संभवतः इसलिए क्योंकि टैटू वाली जगह पर अधिक प्रतिरक्षा कोशिकाएं भर्ती की गई थीं। इसका अर्थ है कि टैटू हमारे शरीर की प्रतिक्रिया को बदल देता है, लेकिन यह परिवर्तन कैसा होगा, यह टीके के प्रकार पर निर्भर करता है।
मानव स्वास्थ्य के लिए इस खोज की प्रासंगिकता बहुत महत्वपूर्ण है। जिन लोगों को लिम्फ नोड्स के पास के क्षेत्रों में टैटू बनवाए गए थे, उनके लिम्फ नोड बायोप्सी में टैटू बनवाने के दो साल बाद भी साफ-साफ दिखने वाला पिग्मेंट पाया गया, ठीक उसी तरह जैसे माउस अध्ययन में देखा गया था।
इसलिए, अगली बार जब आप अपनी यात्रा की कहानी को एक स्थायी निशान देना चाहें, तो याद रखें कि यह स्याही केवल आपकी त्वचा पर ही नहीं, बल्कि आपके शरीर की सबसे महत्वपूर्ण रक्षा प्रणाली पर भी एक छाप छोड़ रही है। यह चुनाव व्यक्तिगत है, लेकिन आपको इसके परिणाम की जानकारी होनी चाहिए।
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