
एक दृश्य जो देखते नहीं बनता। कुलगाम जिले के बोगुंड क्षेत्र का गांव दानेव। एक बुजुर्ग कश्मीरी पंडित महिला छत्तीस वर्षों के बाद अपनी जन्मभूमि की देहलीज़ पर खड़ी है। वह चलती है, आंगन तक पहुंचती है, और वहां एक पुराना अखरोट का पेड़ खड़ा है। जो पेड़ उसके बचपन का साक्षी था, जिसकी छांव में उसने खेला था, जिसकी शाखें उसकी स्मृतियों की पाण्डुलिपि हैं। वह उस पेड़ को थपथपाती है। लिपटती है। फिर फूट-फूटकर रोते हुए कांपती आवाज में पूछती है, 'चे चेया ब'ये याद?' क्या तुम्हें मैं याद हूं?
यह प्रश्न केवल एक पेड़ से नहीं पूछा गया। यह प्रश्न एक घर से पूछा गया, एक भूमि से पूछा गया, एक खोई हुई सभ्यता से पूछा गया। इस प्रश्न का उत्तर देने कe सामर्थ्य न तो उस पेड़ में है, न उस आंगन में, न किसी सरकार में, न किसी न्यायालय में। क्योंकि कुछ घाव ऐसे होते हैं जिन्हें भरने का दावा करना ही उनका अपमान है।
19 जनवरी 1990 की वह काली रात कश्मीर के इतिहास में एक ऐसी विभाजन-रेखा है जिसके एक ओर एक जीवन था और दूसरी ओर निर्वासन। मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से धमकियां गूंज रही थीं, दरवाजों पर दस्तक हो रही थी, और 'रलिव, सलिव, या गलिव' यानी 'मुसलमान बनो, पलायन करो, या मारे जाओ'। इन्हीं तीन शब्दों का विकल्प एक पूरी सभ्यता के सामने रखा गया था। जनवरी 1990 में कश्मीरी पंडित परिवारों का घाटी से पलायन का सिलसिला शुरू हुआ तो लाखों पंडितों को रातोंरात अपना घर-बार सब छोड़ना पड़ गया।
वे गए तो एक रात में, पर उनके साथ गया वह सब कुछ जिसे 'घर' कहते हैं। घर केवल दीवारें और छत नहीं होता। घर होती है वह मिट्टी जो बचपन में पांव के तलवों में चिपकी थी, वह आंगन जहां पितरों के श्राद्ध हुए थे, वह अखरोट का पेड़ जिस पर नाम खुदे थे। वे सब छूट गए। 2011 तक केवल अनुमानतः 2,700 से 3,400 कश्मीरी पंडित ही घाटी में शेष बचे थे। शेष लाखों जम्मू के तंबुओं में, दिल्ली की शरणार्थी बस्तियों में, और स्मृतियों के असह्य बोझ तले जी रहे थे।
स्मृति की प्रकृति अद्भुत है। वह समय को नहीं मानती। छत्तीस वर्ष बीत जाएं, तो भी वह बुजुर्ग महिला के भीतर वह बच्ची जीवित थी जो उस अखरोट के पेड़ के नीचे खेली थी। उपनिषदों ने कहा है, 'अयमात्मा ब्रह्म।' यह आत्मा ब्रह्म है, अनश्वर है। पर निर्वासन जो करता है वह आत्मा को नहीं तोड़ता, वह उसकी जड़ों को काट देता है। और जड़ों के बिना वृक्ष जीवित तो रहता है, पर उसका जीवन एक दीर्घ प्रतीक्षा बन जाता है। उस महिला का पूरा जीवन उस पेड़ तक लौटने की प्रतीक्षा थी।
यह घटना केवल एक व्यक्ति की नहीं, एक सामूहिक चेतना का प्रतीक है। संस्कृत में एक शब्द है- 'स्वदेश।' अपनी भूमि, अपनी मिट्टी। यह भूमि केवल भौगोलिक नहीं होती, यह अस्मिता का आधार होती है। जब कोई मनुष्य अपनी स्वदेश-भूमि से उखाड़ा जाता है, तो वह केवल एक स्थान नहीं खोता, वह अपने अस्तित्व का एक अनिवार्य आयाम खो देता है। इसीलिए वह महिला मिट्टी को छूती है, झुककर उसे माथे से लगाती है। यह पूजा नहीं, पुनर्मिलन है।
विश्व के इतिहास में ऐसे निर्वासनों की दीर्घ परंपरा है। द्वितीय महायुद्ध के बाद यूरोप में लाखों की जड़ों का उजड़ना, भारत-विभाजन में पंजाब और सिंध के हिंदुओं-सिखों का पलायन। पर कश्मीरी पंडितों का निर्वासन इस अर्थ में विशेष है कि यह किसी युद्ध में नहीं हुआ, यह उनके अपने देश में, अपने ही प्रदेश में, शांतिकाल में हुआ। और दशकों तक इस पर वह ध्यान नहीं दिया गया जो मिलना चाहिए था।
वरिष्ठ पत्रकार आदित्य राज कौल स्वयं कश्मीरी पंडित हैं। उन्होंने जब यह वीडियो साझा किया तो उन्होंने लिखा कि यह दृश्य देखकर मन स्थिर नहीं रह सकता। और सच में, इस दृश्य में जो पीड़ा है, वह किसी भी राजनीतिक विमर्श से परे है। यहां कोई नारेबाजी नहीं, कोई मांग नहीं, कोई आरोप नहीं। बस एक वृद्धा और उसका पेड़। बस एक प्रश्न, 'क्या तुम्हें मैं याद हूं?'
यह प्रश्न सुनकर मन में एक और प्रश्न उठता है कि क्या हम उन्हें याद रखते हैं? क्या भारतीय राज्य ने, भारतीय नागरिक समाज ने, वैश्विक मानवाधिकार संस्थाओं ने इस त्रासदी को वह स्थान दिया जिसकी वह पात्र थी? उत्तर असुविधाजनक है। दशकों तक इस निर्वासन को एक क्षेत्रीय घटना मानकर भुला दिया गया। शरणार्थी शिविरों में रहने वाले पंडित परिवारों की पीड़ा न्यूज चैनलों की प्राथमिकता नहीं बनी। उनके मकान, उनकी जमीनें, उनके मंदिर, सब या तो नष्ट हुए या दूसरों के कब्जे में चले गए।
लौटना संभव है, पर सरल नहीं। वह महिला लौट सकी, यह एक शुभ संकेत है। धारा 370 के निरसन के बाद से कश्मीर में स्थितियां बदली हैं। पर लौटना केवल भूगोल की वापसी नहीं होती, वह विश्वास की वापसी होती है। कश्मीरी मुसलमान भी आज पंडितों की वापसी के प्रश्न पर कहते हैं कि हां, उन्हें लौटना चाहिए। लेकिन प्रश्न है कि क्या यह उनके दिलों से निकला जवाब है? नहीं, बिल्कुल नहीं। वरना अमेरिका-इजरायल के साथ युद्ध में ईरान की मदद करने को जिस तरह कश्मीरी मुसलमानों ने संपत्तियां जमा कीं, उस तरह का कोई प्रयास, कोई बेताबी कश्मीरी पंडितों की सहायता में आज तक क्यों नहीं दिखी?
उलटे कश्मीर के मुसलमान कश्मीरी पंडितों के लिए सुरक्षित शिविर बनाने का खुलेआम विरोध करते हैं। आखिर उन्हीं मुसलमानों और उनकी पीढ़ियों के भरोसे कश्मीरी पंडितों को लाकर कैसे वापस बसाया जाए जिन्होंने उनसे कहा था, 'मर्दों घाटी से चले जाओ और अपनी बहनों-बेटियों, बीवियों को हमारे पास छोड़ो।' क्या आज उनका हृदय परिवर्तन हो गया है? बिल्कुल नहीं। यह कहने में कोई संकोच नहीं कि इसके कोई ठोस संकेत अभी तक नहीं मिल रहे।
यह भी ध्यान रहे कि जो भूमि छोड़ी गई थी, उसे केवल राज्य नहीं लौटा सकता। उसे लौटाने की प्रक्रिया सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक भी है। कश्मीरी पंडितों के मंदिरों का जीर्णोद्धार, उनके इतिहास का पाठ्यक्रम में समावेश, और उनकी भाषा-संस्कृति का संरक्षण, ये सब उतने ही आवश्यक हैं जितना एक छत।
वह अखरोट का पेड़ अब भी खड़ा है। उसने छत्तीस वर्ष की अनुपस्थिति देखी, पर वह झुका नहीं। और उस महिला की आत्मा भी नहीं झुकी। वह लौटी। उसने उस पेड़ को आलिंगन दिया जैसे एक खोया हुआ परिजन मिला हो। उस क्षण में जो घटित हुआ, वह केवल एक पुनर्मिलन नहीं था, वह एक जीवन का पूर्ण वृत्त था।
ऋग्वेद कहता है, 'माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।' भूमि माता है और मैं उसका पुत्र हूं। जिस दिन कोई मनुष्य अपनी माता-भूमि से पुनः मिलकर उसकी मिट्टी को माथे से लगाता है, उस दिन इस श्लोक का अर्थ केवल काव्य नहीं रहता, एक जीवित सत्य बन जाता है। पर यह दृश्य केवल एक महिला का नहीं। यह उन हजारों-लाखों कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधित्व करता है जो अभी भी उस दिन की प्रतीक्षा में हैं जब वे अपने-अपने पेड़ों से पूछ सकें, 'चे चेया ब'ये याद?' और शायद उस पेड़ की पत्तियों की सरसराहट में उत्तर मिले, 'हां, तुम मुझे याद हो।' अब यह प्रश्न हम सबसे है, 'क्या हम उन्हें याद रखेंगे?'
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