
दिल्ली-एनसीआर के हजारों होमबायर्स के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने ग्रेटर नोएडा के नामी बिल्डर जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड (Jaypee Infratech Ltd.) के मैनेजिंग डायरेक्टर मनोज गौड़ को गिरफ्तार कर लिया है। यह कार्रवाई उस 12,000 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग और फ्रॉड केस से जुड़ी है जिसमें हजारों खरीदारों ने अपने घरों की डिलीवरी न मिलने की शिकायत की थी।
ईडी ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) 2002 के तहत इस केस की जांच शुरू की थी। मई में एजेंसी ने दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और मुंबई समेत करीब 15 ठिकानों पर छापेमारी की थी। इस दौरान 1.7 करोड़ रुपये नकद, कई वित्तीय दस्तावेज, डिजिटल डेटा और प्रॉपर्टी से जुड़े कागजात जब्त किए थे। बताया जा रहा है कि ये सभी दस्तावेज प्रमोटरों और उनके परिवार के नाम पर मिली संपत्तियों से जुड़े हैं।
ईडी ने गौरसन्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, गुलशन होम्ज प्राइवेट लिमिटेड और महागुन रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड जैसी बड़ी रियल एस्टेट कंपनियों के दफ्तरों में भी तलाशी ली।
यह पूरा मामला दिल्ली और यूपी पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) द्वारा दर्ज की गई एफआईआर के बाद तेज हुआ। इन एफआईआर में जेपी इंफ्राटेक, जयप्रकाश एसोसिएट्स और उनके डायरेक्टर्स व प्रमोटर्स पर धोखाधड़ी, फर्जीवाड़े और साजिश के आरोप लगे हैं। आरोप यह भी है कि बिल्डरों ने लोगों को फ्लैट और प्लॉट देने का झांसा देकर हजारों करोड़ रुपये निवेश करवाए, लेकिन बाद में प्रोजेक्ट पूरे नहीं किए।
ईडी की जांच का केंद्र जेपी विश टाउन (Jaypee Wish Town) और जेपी ग्रीन्स (Jaypee Greens) जैसे प्रोजेक्ट हैं, जहां 2010-11 में फ्लैट बेचे गए लेकिन डिलीवरी नहीं मिली। 2017 में जब खरीदारों का सब्र टूटा तो उन्होंने पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई। इसके बाद ईडी ने PMLA कानून 2002 के तहत जांच शुरू की।
जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (Jaiprakash Associates Ltd.), जो जेपी ग्रुप की मुख्य कंपनी है, पहले से ही भारी कर्ज और कानूनी मुसीबतों में फंसी है। यह कंपनी सीमेंट, कंस्ट्रक्शन, पावर, रियल एस्टेट और हॉस्पिटैलिटी जैसे क्षेत्रों में सक्रिय है। जेपी इंफ्राटेक को हाल ही में मुंबई स्थित सुरक्षा ग्रुप (Suraksha Group) ने अधिग्रहित किया है।
ईडी की इस कार्रवाई से साफ है कि सरकार अब रियल एस्टेट सेक्टर में घोटाले और फंड डायवर्जन के मामलों पर सख्त रुख अपनाए हुए है। माना जा रहा है कि इससे निवेशकों और खरीदारों के हितों की सुरक्षा होगी और उद्योग में पारदर्शिता बढ़ेगी।
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