
14 अप्रैल, 2026। नीतीश कुमार की बिहार की राजनीति से विदाई का दिन। आज पटना में एक असाधारण शाम उतर रही है। आज नीतीश कुमार ने राज्यपाल सैयद अता हसनैन से मिलकर अपना त्यागपत्र सौंप दिया है। जो हाथ दो दशकों से बिहार की बागडोर थामे रहे, वही हाथ आज एक कागज का टुकड़ा राज्यपाल की मेज पर रख देंगे और एक युग समाप्त हो जाएगा। पर क्या युग सच में समाप्त होते हैं? या वे केवल रूपांतरित होते हैं?
1 मार्च, 1951 को बख्तियारपुर में जन्मे नीतीश कुमार के पिता कविराज राम लखन सिंह आयुर्वेदिक चिकित्सक थे और मां परमेश्वरी देवी नेपाल से थीं। घर में जड़ी-बूटियों की गंध थी, राजनीति की चर्चा थी और स्वाधीनता-संग्राम की स्मृतियां थीं। पिता कविराज राम लखन सिंह स्वतंत्रता सेनानी भी थे और गांधीवादी सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध नेता अनुग्रह नारायण सिन्हा के साथ निकटता से जुड़े थे। उसी राजनीतिक वातावरण में पला-बढ़ा एक बालक, जिसका घर का नाम था- मुन्ना।
1972 में बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (अब एनआईटी पटना) से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर वे बिहार राज्य विद्युत बोर्ड में नौकरी पर लगे, पर मन वहां कभी नहीं लगा। तकनीक की तारें उन्हें नहीं बांध सकीं। उन्हें खींचती थी उस जमीन की आवाज, जहां गांव की औरत न्याय के लिए दर-दर भटकती थी, जहां किसान की पीठ पर कर्ज का बोझ था। और तब आया वह आंदोलन जिसने एक पीढ़ी की दशा और दिशा दोनों बदल दी।
नीतीश कुमार 1974 से 1977 के बीच जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में कूद पड़े। वह समय था जब सत्ता के विरुद्ध खड़े होना अपने भविष्य को दांव पर लगाने से कम नहीं था। 1974 में उन्हें 'मीसा' के अंतर्गत नजरबंद किया गया और 1975 के आपातकाल में पुनः गिरफ्तार हुए। जेल की सलाखों के पीछे भी उनका संकल्प नहीं टूटा। लोहिया की समाजवादी चेतना, कर्पूरी ठाकुर की दलित-वंचित प्रतिबद्धता और जेपी की नैतिक राजनीति, इन तीन धाराओं से उनका व्यक्तित्व बना।
22 फरवरी, 1973 को मंजू कुमारी सिन्हा से उनका विवाह हुआ, जब नीतीश कुमार अभी बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के छात्र ही थे। यह अंतरजातीय विवाह था। मंजू देवी पटना के कमला नेहरू सरकारी बालिका विद्यालय में शिक्षिका थीं। विनम्र, संयमित, परिवार को समर्पित। राजनीति की चमक-दमक से दूर, वे उस घर की रोशनी थीं जहां से एक नेता हर सुबह निकलता था। दंपति को एक पुत्र हुआ। नाम दिया- निशांत। फिर 14 मई, 2007 को नई दिल्ली में निमोनिया ने मंजू को छीन लिया।
वह वर्ष था जब नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पहली पारी के शिखर पर थे। जो आदमी बिहार को बदल रहा था, उसका घर एकाकी हो गया था। तब से हर वर्ष, उनकी जन्म और पुण्यतिथि पर नीतीश कुमार कंकड़बाग स्थित उनके स्मारक पर श्रद्धांजलि देने जाते हैं।
1977 में उन्होंने हरनौत से लोकसभा चुनाव लड़ा और हार गए। 1980 में फिर लड़े और फिर हारे। दो लगातार पराजयों के बाद उन्होंने राजनीति छोड़ने का मन बना लिया था। पर भाग्य को कुछ और मंजूर था। 1985 में हरनौत विधानसभा से जीत के साथ उनकी राजनीतिक यात्रा में पहला सुनहरा मोड़ आया। फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
1994 में उन्होंने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी की स्थापना की। वह वाजपेयी युग था। एनडीए की छत्रछाया में नीतीश केंद्र में रेल, कृषि और सतही परिवहन मंत्री बने। अगस्त 1999 में गैसल ट्रेन दुर्घटना के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए रेलमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। वह इस्तीफा एक नैतिक घोषणापत्र था।
2005 में बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी-जेडीयू नेतृत्व का राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की जीत के साथ नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। बिहार उस समय देश का सबसे बदनाम राज्य था। अपराध, जातीय हिंसा, पलायन और भ्रष्टाचार का पर्याय। उस जमीन पर नीतीश ने एक असंभव सी इमारत खड़ी की, सुशासन की। अपराधियों पर कठोर कार्रवाई हुई। सड़कें बनीं। एक लाख से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति हुई, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर पहुंचे, महिला अशिक्षा दर आधी हुई और आम आदमी की आय दोगुनी हुई। जनता ने नीतीश कुमार को 'सुशासन बाबू' का उपनाम दे दिया।
नीतीश कुमार की राजनीति को समझना किसी जटिल संस्कृत काव्य की व्याख्या करने जैसा है जिसमें एक ही श्लोक के अर्थ युग-युग में बदलते रहते हैं, और टीकाकार हर बार असमंजस में पड़ जाता है। वर्ष 2013 में उन्होंने भाजपा से पहला विराम लिया। कारण था नरेंद्र मोदी को एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रक्षेपित किया जाना, जिसे वे अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि के अनुकूल नहीं मानते थे।
2015 में उन्होंने आरजेडी और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाया और बिहार की जनता ने 243 में से 178 सीटें देकर इस प्रयोग को ऐतिहासिक स्वीकृति दी। यह नीतीश के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी विजय थी। पर प्रयोगशालाएं हमेशा अनुकूल परिणाम नहीं देतीं।
2017 में उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के विरुद्ध IRCTC घोटाले में प्राथमिकी दर्ज हुई। नीतीश ने इस्तीफा मांगा, आरजेडी ने इनकार किया। तब नीतीश ने 26 जुलाई, 2017 को स्वयं मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और 24 घंटे के भीतर एनडीए के साथ पुनः सत्तारूढ़ हो गए। राजनीतिक इतिहास में यह बदलाव इतनी तीव्र गति से हुआ कि विश्लेषकों की कलम स्याही सूखने से पहले ही अप्रासंगिक हो गई।
अगस्त 2022 में फिर वही दृश्य। एनडीए से नाता तोड़ा, महागठबंधन में वापसी हुई और वे INDIA गठबंधन के उन संस्थापक सदस्यों में शामिल हो गए जो भाजपा के विरुद्ध देशव्यापी मोर्चे का स्वप्न देख रहे थे। पर यह स्वप्न भी ज्यादा टिका नहीं। 28 जनवरी, 2024 को उन्होंने महागठबंधन से हाथ खींच लिया और नौवीं बार मुख्यमंत्री की शपथ एनडीए की छत्रछाया में ली। इन पांच करवटों ने विपक्ष को एक धारदार हथियार दे दिया- 'पलटूराम'।
समर्थक इसे 'परिस्थितिजन्य व्यावहारिकता' कहते हैं और आलोचक 'सिद्धांतहीन अवसरवाद'। सच्चाई शायद इन दोनों के ठीक मध्य में, किसी तीसरे आयाम में बसती है। एक ऐसे नेता का अदम्य जीवट, जिसने हर पराजय को पुनर्जन्म में बदला, हर विदाई को वापसी का प्रस्थान-बिंदु माना। महाभारत में भी तो युधिष्ठिर ने जुए में सब कुछ हारकर भी धर्म का दामन नहीं छोड़ा था। नीतीश का तर्क भी कुछ ऐसा ही रहा- गठबंधन बदले, पर 'सुशासन' का दावा अटल रहा। इतिहास इस दावे की परीक्षा अभी ले रहा है।
2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में, जब अनेक विश्लेषकों को लगा था कि उनका राजनीतिक प्रभाव क्षीण हो चुका है, उन्होंने एक और विजय दर्ज की, विशेषतः महिला मतदाताओं के समर्थन से, जो उनके कल्याणकारी कार्यक्रमों की ऋणी थीं। 20 नवंबर, 2025 को उन्होंने दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और एक रिकॉर्ड जो शायद टूटना मुश्किल हो।
5 मार्च, 2026 को 75 वर्षीय नीतीश कुमार ने अपनी अंतिम इच्छा एक भावपूर्ण X पोस्ट में व्यक्त की। नीतीश ने कहा कि उन्होंने बिहार विधानसभा और विधानपरिषद, दोनों सदनों के साथ-साथ लोकसभा और राज्यसभा यानी संसद के दोनों सदनों का सदस्य रहने की चाहत सदा मन में रखी थी। 16 मार्च, 2026 को वे राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित हुए। 9 अप्रैल, 2026 को नई दिल्ली में उन्होंने राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ली। और आज 14 अप्रैल, 2026 को सुबह डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि, फिर अंतिम कैबिनेट बैठक और अपराह्न राजभवन में औपचारिक त्यागपत्र।
75 वर्षीय नीतीश कुमार बिहार के सर्वाधिक समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता के रूप में विदा हो चुके हैं। दस बार शपथ लेने का रिकॉर्ड उनके नाम है। उनकी विरासत केवल सड़कों और पुलों में नहीं है। वह उन लाखों स्कूली लड़कियों के में भी है जो 2005 से पहले घर पर बैठी थीं। उस बीमार औरत की आंखों में भी है जो पहली बार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर से मिल सकी। उन अपराधियों के मन में बैठे भय में भी है, जो 2005 से पहले सड़कों पर बेरोकटोक घूमते थे।
जेडीयू नेता जमा खान कहते हैं कि नीतीश कुमार ज्यादातर समय बिहार में ही बिताएंगे, दिल्ली केवल संसद सत्र के दौरान जाएंगे। नई सरकार उनकी सहमति से बनेगी और उनके मार्गदर्शन में काम करेगी। पर सत्ता का स्वाद जानने वाले जानते हैं कि परामर्श और निर्णय में एक पतली, पर गहरी रेखा होती है। आउटलुक को दिए साक्षात्कार में एक विश्लेषक ने उनकी तुलना जॉर्ज फर्नांडिस और अटल बिहारी वाजपेयी से करते हुए कहा कि अब नीतीश संभवतः नई राजनीतिक लड़ाइयां नहीं लड़ेंगे। और पुत्र निशांत, जो वर्षों तक राजनीति से दूर रहे, जिन्होंने कभी कहा था कि उन्हें राजनीति में कोई रुचि नहीं। वे अब जेडीयू में शामिल हो चुके हैं। वंशवाद-विरोध का वह दर्पण थोड़ा धुंधला हुआ है।
आज नीतीश कुमार राजभवन से बाहर निकले, तो केवल मुख्यमंत्री का पद छोड़कर नहीं, वे उस अनुभव को भी पीछे छोड़ गए जो बिहार की मिट्टी ने उन्हें दिया और जो उन्होंने इस मिट्टी को वापस किया। बखतियारपुर का 'मुन्ना', जेपी आंदोलन का सिपाही, इंजीनियरिंग छोड़कर राजनीति में आया नौजवान, मंजू की याद को सीने में दबाए एकाकी पिता, दस बार शपथ लेने वाला मुख्यमंत्री, ये सब एक ही मनुष्य के अनेक चेहरे हैं। इतिहास उनका मूल्यांकन करेगा, गठबंधनों की तराजू पर भी, और सुशासन की कसौटी पर भी। पर आज, इस शाम पटना की हवा में एक अजीब-सी उदासी है। जैसे किसी पुराने बरगद के नीचे से छांव हट जाने पर होती है।
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