रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा की तेलुगु शादी में पहनी गई ज्वेलरी किसी सेलिब्रिटी स्टाइलिंग जैसी नहीं लगी। यह बहुत सोच-समझकर चुनी गई, पारंपरिक और विरासत जैसी महसूस हुई। यहां बड़े हीरे या फैशन के लिए किए गए प्रयोग नहीं थे। इस जोड़े ने पारंपरिक मंदिरों में पहनी जाने वाली सोने की ज्वेलरी को चुना। ऐसी ज्वेलरी जो पीढ़ियों से संभालकर रखी जाती है और दक्षिण भारतीय घरों में तुरंत पहचानी जाती है। हर गहना दिखावे के लिए नहीं, बल्कि परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए चुना गया था।
कासू माला की परतें और संतुलन
रश्मिका की ज्वेलरी की शुरुआत कासू माला से हुई। इन्हें सिर्फ ज्यादा दिखाने के लिए नहीं पहना गया था, बल्कि अलग-अलग लंबाई में सलीके से सजाया गया था। हर सिक्के वाली माला साफ नजर आ रही थी और साड़ी की प्लीट्स के साथ सुंदर तालमेल बना रही थी।
अक्सर गलत तरीके से पहनने पर ये मालाएं एक साथ चिपककर भारी दिखती हैं। लेकिन यहां हर परत अलग दिखाई दे रही थी और उसमें हल्की मूवमेंट भी थी। पारंपरिक कसु डिजाइनों पर समृद्धि के प्रतीक उकेरे जाते हैं। इनका एंटीक फिनिश खास था। सोना ज्यादा चमकदार नहीं था, बल्कि हल्का मद्धम था, जिससे नक्काशी की गहराई साफ दिख रही थी। फोटो में भी यह नया नहीं बल्कि विरासत जैसा लगा।
टेम्पल ज्वेलरी का चोकर
चोकर गले के ऊपरी हिस्से पर सलीके से बैठा था, जैसा कि मंदिर ज्वेलरी में होता है। बीच में लक्ष्मी जी की आकृति थी। डिजाइन बहुत परफेक्ट और मशीन से बना हुआ नहीं लग रहा था, बल्कि हाथ की बारीक कारीगरी का एहसास दे रहा था। छोटे-छोटे दानों जैसी कारीगरी किनारों पर की गई थी, जिससे हल्की रोशनी पड़ने पर सुंदर चमक आती थी। यह चमक तेज नहीं थी, इसलिए साड़ी की जरी भी बराबर उभरकर दिख रही थी।
वड्डानम जिसने पूरे लुक को संभाला
तेलुगु दुल्हनों में वड्डानम यानी कमरबंद बहुत महत्वपूर्ण होता है। रश्मिका का वड्डानम पारंपरिक और मजबूत बनावट वाला था। यह सिर्फ सजावट नहीं था, बल्कि साड़ी की प्लीट्स को ठीक से संभालने का काम भी कर रहा था, खासकर जब शादी की रस्मों के दौरान ज्यादा मूवमेंट होती है। इस पर उभरी हुई नक्काशी थी, जिससे बिना ज्यादा रत्नों के भी इसमें गहराई दिख रही थी। यह सिर्फ गहना नहीं, बल्कि पूरे लुक की संरचना जैसा लग रहा था।
चूड़ियां, उनकी ध्वनि और रस्मों का तालमेल
रश्मिका की चूड़ियां भी पारंपरिक तरीके से पहनी गई थीं। मोटे कड़े के साथ पतली बनावट वाली चूड़ियां पहनी गई थीं, जिससे एक समान चमक के बजाय अलग-अलग टेक्सचर दिख रहे थे। शादी की रस्मों के दौरान चूड़ियों की हल्की खनक भी माहौल का हिस्सा बनती है। तेलुगु शादियों में गहनों को सिर्फ देखा ही नहीं जाता, उन्हें सुना भी जाता है।
विजय देवरकोंडा की सादगी भरी ज्वेलरी
विजय देवरकोंडा ने ज्वेलरी बहुत सादगी से पहनी। उन्होंने सिर्फ एक मंदिर शैली का हार पहना, जो उनकी आइवरी सिल्क धोती के साथ संतुलित लग रहा था। बाजूबंद पर दक्षिण भारतीय मंदिरों और मूर्तियों में दिखने वाली पारंपरिक आकृतियों की झलक थी। उन्होंने ज्यादा परतें नहीं पहनीं, जिससे सोने की बनावट साफ नजर आई। इससे यह बात उभरकर आई कि दूल्हे के लिए कम ज्वेलरी भी आत्मविश्वास को दर्शा सकती है।
यह ज्वेलरी अलग क्यों लगी?
आजकल कई सेलिब्रिटी शादियों में कुछ नया और अलग दिखाने की कोशिश होती है। लेकिन इस शादी में परिचित और भरोसेमंद परंपरा को चुना गया। एंटीक फिनिश, पारंपरिक आकृतियां और विरासत जैसा आकार यह दिखाता है कि ये गहने सिर्फ एक दिन के लिए नहीं थे। यह स्टाइल कुछ नया बनाने की कोशिश नहीं कर रहा था। यह अपनी परंपरा में ही खास था। और कभी-कभी यही सादगी और आत्मविश्वास सोने को सबसे यादगार बना देता है।