Govardhan Puja ki Katha: इस कथा के बिना अधूरी मानी जाती है गोवर्धन पूजा, इसे पढ़ने से पूरी होगी हर मनोकामना

भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर ग्रामीणों की रक्षा की। इंद्र की बारिश से परेशान होकर कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से रक्षा की। अंततः इंद्र ने अपनी गलती स्वीकार कर गोवर्धन पूजा की परंपरा शुरू की।

Manali Rastogi
अपडेटेड22 Oct 2025, 05:04 PM IST
Govardhan Puja ki Katha: इस कथा के बिना अधूरी मानी जाती है गोवर्धन पूजा, इसे पढ़ने से पूरी होगी हर मनोकामना
Govardhan Puja ki Katha: इस कथा के बिना अधूरी मानी जाती है गोवर्धन पूजा, इसे पढ़ने से पूरी होगी हर मनोकामना

गोवर्धन पूजा हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है। इस वर्ष गोवर्धन पूजा आज, 22 अक्टूबर को मनाई जा रही है। इस दिन ब्रह्मांड के रक्षक भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति भाव से पूजा की जाती है।

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सनातन धर्म के ग्रंथों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन देवताओं के राजा इंद्र को पराजित किया था। उस समय इंद्र ने गोकुल में भारी वर्षा कर दी थी, जिससे सभी लोग डर गए। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों की रक्षा के लिए अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया था।

इसी कारण हर साल इस दिन गोवर्धन पूजा मनाई जाती है। इस वर्ष भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के लिए दो शुभ मुहूर्त माने गए हैं।

गोवर्धन पूजा व्रत कथा (Govardhan Puja Vrat Katha In Hindi)

गोवर्धन पूजा एक अत्यंत पवित्र और अर्थपूर्ण हिंदू पर्व है, जो भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य कार्यों की याद दिलाता है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि प्रकृति, गायों और गोवर्धन पर्वत के प्रति आभार व्यक्त करना कितना आवश्यक है।

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कथा के अनुसार, प्राचीन समय में ब्रजभूमि के लोग देवराज इंद्र की पूजा करते थे, क्योंकि वे मानते थे कि वर्षा से ही उनकी फसलें उगती हैं। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण, जो उस समय ब्रज में बालक रूप में रहते थे, ने देखा कि इंद्र अपने बल और पूजा पर अभिमान करने लगे हैं।

एक दिन जब सभी लोग इंद्र की पूजा की तैयारी कर रहे थे, तब नन्हे कृष्ण ने माता यशोदा से पूछा, “मां, यह पूजा किसके लिए हो रही है?”

माता यशोदा ने स्नेहपूर्वक कहा, “लल्ला, हम देवराज इंद्र की पूजा कर रहे हैं, क्योंकि वे वर्षा करते हैं जिससे हमारी खेती होती है।”

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तब कृष्ण ने कहा, “मां, हमें इंद्र की नहीं, बल्कि गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, जहां हमारी गायें चरती हैं और जो हमें जीवन देता है।”

कृष्ण की बात सुनकर सभी ग्रामीणों ने इंद्र की बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा की। इससे इंद्र बहुत क्रोधित हो गए और उन्होंने गोकुल में भयंकर वर्षा शुरू कर दी। चारों ओर जलभराव हो गया और लोग डर के मारे भगवान कृष्ण के पास पहुंचे।

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तब श्रीकृष्ण ने सबको गोवर्धन पर्वत के पास बुलाया और अपनी छोटी उंगली पर पूरा पर्वत उठा लिया। उन्होंने सभी ग्रामीणों और गायों को उसके नीचे शरण दी। इंद्र ने जब देखा कि उसकी वर्षा से कृष्ण को कोई हानि नहीं हो रही, तो उसने वर्षा और तेज कर दी। तब श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र को पर्वत के ऊपर मंडराने का आदेश दिया और शेषनाग को कहा कि वे पर्वत के चारों ओर घेरा बनाकर बाढ़ के पानी को रोक दें।

आखिरकार, इंद्र को एहसास हुआ कि कृष्ण कोई साधारण बालक नहीं हैं। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की और भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी। तभी से गोवर्धन पूजा का यह पर्व मनाया जाने लगा, जिसमें लोग अन्नकूट का भोग लगाकर भगवान को धन्यवाद देते हैं।

(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)

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