क्या समय के तीन आयामों से बना है ब्रह्मांड? वैज्ञानिक के नए दावे ने पतंजलि योग सूत्र और वेदों की याद दिलाई

Gunther Kleteschka: वैज्ञानिक गुंथर क्लेटेश्का का नया सिद्धांत समय को त्रि-आयामी मानकर ब्रह्मांड की उत्पत्ति की व्याख्या करता है। यह अद्भुत खोज प्राचीन भारतीय ग्रंथों और सांख्य दर्शन के सिद्धांतों से मेल खाती है।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड29 Dec 2025, 03:02 PM IST
समय के आयाम पर वेद-विज्ञान एकमत (AI Image)
समय के आयाम पर वेद-विज्ञान एकमत (AI Image)(Nano Banana)

Three Dimensional Time Theory: क्या समय सिर्फ एक सीधी रेखा है या इसके भी अंतरिक्ष की तरह तीन आयाम होते हैं? वैज्ञानिक गुंथर क्लेटेश्का के एक नए सिद्धांत ने भौतिक विज्ञान की दुनिया में हलचल मचा दी है। यह सिद्धांत न केवल आइंस्टीन की सोच को चुनौती देता है, बल्कि हजारों साल पुराने भारतीय दर्शन और पतंजलि योग सूत्र की बातों को वैज्ञानिक आधार देता दिख रहा है। आइए समझते हैं कि विज्ञान और अध्यात्म का यह मेल दुनिया को देखने का हमारा नजरिया कैसे बदल सकता है।

क्लेटेश्का का सिद्धांत- समय से पैदा हुआ अंतरिक्ष

वैज्ञानिक गुंथर क्लेटेश्का ने एक नया सिद्धांत पेश किया है। यह सिद्धांत क्वांटम भौतिकी और गुरुत्वाकर्षण को एक साथ जोड़ने की कोशिश करता है। क्लेटेश्का का कहना है कि समय त्रि-आयामी (3D) है। उनके अनुसार, समय की वक्रता से ही अंतरिक्ष, पदार्थ और ऊर्जा पैदा होते हैं। यह आइंस्टीन के पुराने सिद्धांत से अलग है। आइंस्टीन मानते थे कि समय और अंतरिक्ष मिलकर एक मैट्रिक्स बनाते हैं, जिसे भारी चीजें मोड़ देती हैं। लेकिन नया सिद्धांत कहता है कि समय ही सबसे प्रमुख है और अंतरिक्ष तो समय के तीन आयामों के मेल से पैदा हुआ एक प्रॉडक्ट है।

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समय के तीन आयाम पर वेद और विज्ञान का संगम (AI Generated Image)
(Notebook LM)

वेदों और प्राचीन दर्शन में समय की प्रधानता

यह आधुनिक वैज्ञानिक सोच प्राचीन भारतीय विचारों से काफी मिलती-जुलती है। अथर्ववेद में साफ तौर पर लिखा है कि यह ब्रह्मांड समय के कारण ही अस्तित्व में आया है। सांख्य दर्शन भी कुछ ऐसी ही बात करता है। इसके अनुसार, शुरुआत में प्रकृति और पुरुष के बीच तालमेल से दुनिया बनी। विद्वानों का मानना है कि यहां 'प्रकृति' का मतलब समय ही है। प्रकृति के तीन बल- सत्व, रजस और तमस जब असंतुलित हुए, तब सृष्टि का निर्माण हुआ। वैज्ञानिक अब मान रहे हैं कि ये तीन बल असल में समय के तीन आयाम हो सकते हैं।

गीता और ओपेनहाइमर का वह मशहूर किस्सा

श्रीमद्भगवद्गीता में भी समय की ताकत का वर्णन मिलता है। जब भगवान कृष्ण ने अर्जुन को विराट रूप दिखाया, तब उन्होंने खुद को 'शक्तिशाली समय' बताया था। उन्होंने कहा था कि वे ही दुनिया को बनाने वाले और मिटाने वाले समय हैं। दिलचस्प बात यह है कि 1945 में परमाणु बम के परीक्षण के बाद वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने इसी श्लोक का जिक्र किया था। हालांकि, उन्होंने 'समय' की जगह खुद को 'मृत्यु' कहा था, जो कि अनुवाद की एक छोटी सी गलती थी।

पतंजलि योग सूत्र और आइंस्टीन का कनेक्शन

महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र में ईश्वर को एक ऐसी सत्ता बताया है जिस पर समय का कोई असर नहीं होता। योग सूत्र के कुछ हिस्से तो सीधे आइंस्टीन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत की याद दिलाते हैं। आइंस्टीन ने कहा था कि घटनाओं के बीच का अंतराल ही स्पेस-टाइम बनाता है। वहीं पतंजलि कहते हैं कि अगर कोई योगी समय के क्षणों और उनके क्रम पर ध्यान लगाए, तो उसे पूरे ब्रह्मांड का ज्ञान मिल सकता है। वह समय और अंतरिक्ष की सीमाओं से आजाद हो सकता है।

मोक्ष और समय का रुक जाना

पतंजलि योग सूत्र के आखिरी हिस्से में 'कैवल्य' या मोक्ष की चर्चा है। इसके अनुसार, जब गुणों का बदलाव रुक जाता है, तो समय की निरंतर गति भी थम जाती है। यही वह स्थिति है जिसे परम ज्ञान या मुक्ति कहा गया है। विज्ञान और योग का यह मेल बताता है कि जिसे हम आज आधुनिक खोज मान रहे हैं, उसके सूत्र हमारे प्राचीन ग्रंथों में पहले से ही मौजूद थे।

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