वीर सावरकर पुरस्कार को स्वीकार करने से शशि थरूर के इनकार के बाद हाई रेंज रूरल डेवलपमेंट सोसाइटी (HRDS) इंडिया राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गई है। जब संस्था ने शशि थरूर के नाम की घोषणा पुरस्कार पाने वालों में की, तब तक यह एक अपेक्षाकृत कम-चर्चित सामाजिक संगठन था। लेकिन कांग्रेस सांसद के किनारा करने और आयोजकों से मतभेद के बाद अब यही सवाल उठ रहा है कि आखिर HRDS इंडिया क्या करती है और किस आधार पर इस तरह के पुरस्कार प्रदान करती है।
एक गैर-सरकारी संगठन है HRDS इंडिया
HRDS इंडिया खुद को एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) के रूप में प्रस्तुत करती है, जो मुख्य रूप से ग्रामीण, आदिवासी और वंचित समुदायों के कल्याण के लिए काम करने का दावा करती है। संस्था के अनुसार, उसके कार्यक्रमों में गरीब परिवारों के लिए आवास, ग्रामीण युवाओं के लिए कौशल विकास, महिलाओं के लिए स्वरोजगार और माइक्रो-फाइनेंस, स्वास्थ्य सेवाएं और प्राकृतिक खेती जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को आत्मनिर्भर बनाना लक्ष्य
HRDS के मुताबिक उसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को आत्मनिर्भर बनाना और ग्रामीण जीवन स्तर में सुधार लाना है। हाल के समय में HRDS इंडिया ने सामाजिक कार्यों के साथ-साथ सम्मान और पुरस्कारों के जरिए भी अपनी पहचान बनाने की कोशिश की है। वीर सावरकर इंटरनेशनल इम्पैक्ट अवॉर्ड इसी पहल का हिस्सा बताया जा रहा है। मगर शशि थरूर द्वारा पुरस्कार लेने से इनकार, आयोजकों के दावों और प्रतिक्रियाओं के टकराव ने संस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।