Iftar Ki Dua: रमजान में रोजा खोलने से पहले पढ़ें ये 3 दुआएं, होगी बरकत, पूरे होंगे रुके सारे काम

रमजान में रोजा खोलने से पहले इफ्तार की दुआ पढ़ी जाती है। इसमें अल्लाह के लिए रोजा रखने की नीयत, उन पर ईमान और दी हुई रोजी के लिए शुक्र अदा किया जाता है। यह छोटा सा पल इफ्तार को आध्यात्मिक बनाता है और रोजा की कबूलियत की दुआ करने का मौका देता है।

Manali Rastogi
अपडेटेड25 Feb 2026, 11:24 AM IST
Ramadan
Ramadan(Pexels)

रमजान अपने साथ एक अलग ही लय लेकर आता है। दिन का लंबा खिंचाव, रोजा रखने का शांत अनुशासन और फिर इफ्तार से ठीक पहले का वह खास पल। खाना सामने होता है, लेकिन इंसान इंतजार करता है। क्योंकि रोजा सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं है, यह नीयत और इबादत का हिस्सा है।

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इसी नीयत में इफ्तार से पहले पढ़ी जाने वाली दुआ भी शामिल है। इसे इफ्तार की दुआ कहा जाता है। यह दुआ अल्लाह का शुक्र अदा करने, उन पर भरोसा जताने और रोजा रखने के मकसद को याद करने का जरिया है। शब्द सरल हैं, लेकिन अर्थ गहरा है।

इफ्तार की दुआ क्या है?

इफ्तार की दुआ वह प्रार्थना है जिसे मुसलमान रमजान में रोजा खोलते समय पढ़ते हैं। यह दुआ सूरज ढलने के बाद, कुछ खाने या पीने से ठीक पहले पढ़ी जाती है।इस दुआ में तीन मुख्य बातें शामिल होती हैं:

• यह स्वीकार करना कि रोजा अल्लाह के लिए रखा गया

• उन पर ईमान और भरोसा जताना

• दी गई रोजी के लिए शुक्रिया अदा करना

अलग अलग रिवायतों में दुआ के शब्द थोड़े अलग हो सकते हैं, लेकिन भावना एक ही होती है।

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इफ्तार की दुआ 1: पूरी दुआ

“अल्लाहुम्मा इन्नी लका सुम्तु वा बिका आमन्तु वा अलैका तवक्कल्तु वा अला रिज्किका अफ्तरतु।”

अर्थ: ऐ अल्लाह, मैंने तेरे लिए रोजा रखा, तुझ पर ईमान लाया, तुझ पर भरोसा किया और तेरी दी हुई रोजी से रोजा खोल रहा हूँ।

यह सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली इफ्तार की दुआओं में से एक है। इसमें नीयत, ईमान और अल्लाह पर निर्भरता साफ दिखाई देती है।

इफ्तार की दुआ 2: छोटी दुआ

“अल्लाहुम्मा लका सुम्तु वा अला रिज्किका अफ्तरतु।”

अर्थ: ऐ अल्लाह, मैंने तेरे लिए रोजा रखा और तेरी दी हुई रोजी से रोजा खोल रहा हूं।

यह दुआ छोटी है और याद रखने में आसान है। इसलिए कई लोग इसे पढ़ते हैं।

इफ्तार की दुआ 3: शुक्र अदा करने की दुआ

“अल्हम्दुलिल्लाहिल्लजी आआननी फसुम्तु वा रजकनी फा अफ्तरतु।”

अर्थ: सब तारीफ अल्लाह के लिए है, जिसने मुझे रोजा रखने की ताकत दी और रोजा खोलने के लिए रोजी दी।

यह दुआ खास तौर पर शुक्र अदा करने पर जोर देती है। इसमें यह माना जाता है कि रोजा रखने की ताकत और रोजा खोलने की नेमत दोनों अल्लाह की तरफ से हैं।

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इफ्तार की दुआ पढ़ना क्यों जरूरी है?

सूरज ढलने के बाद रोजा खोलना जायज है, चाहे दुआ पढ़ी जाए या नहीं। लेकिन दुआ पढ़ने से यह पल और ज्यादा आध्यात्मिक बन जाता है। इसके कुछ अहम मकसद हैं:

• पूरे दिन सब्र के बाद शुक्र अदा करना

• रोजा रखने की नीयत को दोहराना

• अपने रोजा की कबूलियत की दुआ करना

• खाने से पहले अल्लाह की दी हुई नेमत को याद करना

इस तरह इफ्तार की दुआ एक साधारण काम को इबादत का खूबसूरत समापन बना देती है। असल मायने में यह दुआ लंबी या छोटी होने की बात नहीं है। यह उस ठहराव का नाम है, जब इंसान खाने से पहले एक पल के लिए अल्लाह को याद करता है और उनका शुक्र अदा करता है।

(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)

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