
Indian Railways: भारतीय रेलवे को देश की लाइफलाइन कहा जाता है। यह एशिया की सबसे बड़ी और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी रेल नेटवर् है। इंडियन रेलवे की ओर से रोजाना औसतन 20,000 से ज्यादा ट्रेनें चलाई जाती हैं। 2.30 करोड़ से ज्यादा यात्रियों को ट्रेनें गंतव्य तक पहुंचा रही हैं। यह संख्या ऑस्ट्रेलिया जैसे पूरे देश की जनसंख्या के बराबर है। भारतीय रेलवे न केवल यात्रियों के लिए बल्कि माल ढुलाई (Freight) के लिए भी देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब ट्रेन के इंजन, कोच या मालगाड़ी के डिब्बे पूरी तरह से अनुपयोगी या खराब हो जाते हैं तो भारतीय रेलवे उनका क्या करती है?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब ट्रेन, इंजन या कोच रिटायर हो जाते हैं तो रेलवे इन्हें कबाड़ के भाव में बेच देता है। इससे रेलवे कीअच्छी कमाई हो जाती है। वैसे भी रेलवे के लोहे की डिमांड हर जगह होती है। ऐसे में रेलवे की यह पुरानी ट्रेनें, इंजन, कोच, मालगाड़ी के डिब्बे जैसी तमाम चीजें 'सोना' उगलने लगती हैं।
भारतीय रेलवे ऐसे किसी काम के न रहे ट्रेन डिब्बों, इंजनों और वैगनों को कबाड़ (स्क्रैप) के रूप में बेच देता है। यह स्क्रैप रेलवे के लिए राजस्व (Revenue) का एक बड़ा स्रोत है। साल 2020 से 2024 तक के चार वित्त वर्षों में रेलवे ने इससे 19,000 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की है। इस तरह, जो वस्तुएं उपयोग लायक नहीं बचतीं, वे भी रेलवे के खजाने को भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। मिशन जीरो स्क्रैप के तहत रेलवे यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी पुराना इंजन या कोच बेकार पड़ा न रहे। इससे यार्ड खाली रहते हैं और रेलवे की आमदनी लगातार बढ़ती रहती है।
रेलवे ने अपने मिशन जीरो स्क्रैप (Mission Zero Scrap) प्रोजेक्ट के तहत पुराने डिजल लोकोमोटिव को हटाना शुरू किया है, ताकि रेलवे नेटवर्क पूरी तरह से इलेक्ट्रिफिकेशन की दिशा में आगे बढ़ सके। साल 2020 से 2024 के बीच, 1,000 से ज़्यादा पुराने इंजन scrap कर दिए गए हैं। जुलाई 2020 में, रेलवे बोर्ड ने डीजल इंजनों की सर्विस लाइफ 36 साल से घटाकर 30 साल कर दी है। इससे पुराने इंजनों को जल्दी रिटायर कर दिया जाता है।
ऐसे ही हर कोच की एक निश्चित उम्र होती है। जैसे इंटीगरल कोच फैक्ट्री कोच (ICF Coach) की उम्र 25 से 30 साल, लिंके हॉफमन बुश कोच (LHB Coach) की वर्किंग एज 35 साल और फ्रेट वैगन की उम्र 30 साल तक की होती है। जब कोच, वेगन या इंजन अपनी लाइफ पूरी कर लेते हैं, रेलवे उन्हें स्क्रैप के रूप में बदलकर बेच देती है। स्क्रैप की नीलामी के लिए रेलवे ऑक्शन करवाती है। फिर इसमें ऊंची बोली लगाने को बेचती है, जिससे यह स्क्रैप रेलवे के लिए एक बड़ी रेवन्यू सोर्स साबित हुआ है।
रेलवे केवल ट्रेन डिब्बों, इंजनों और वैगनों को ही कबाड़ में नहीं देता है, बल्कि इसके साथ लोहे की दूसरी चीजें भी स्क्रैप की जाती है। इनमें ट्रेनों की सीट्स एसी, लाइट होल्डर्स अन्य चीजें आती हैं। पिछले 4 साल में रेलवे ने 62 लाख मीट्रिक टन धातु स्क्रैप बेचकर रिकॉर्ड राजस्व हासिल किया है। कुछ पुराने कोचों को काटने से पहले रेस्टोरेंट, कैफे या हेरिटेज डिस्प्ले में बदला जाता है। बाकी बचे लोहे और धातु को पिघलाकर नई चीजें बनाई जाती हैं जैसे निर्माण सामग्री या औद्योगिक उपकरण। इस तरह रेलवे वेस्ट से वेल्थ की मिसाल पेश करता है, जहां हर पुरानी ट्रेन किसी नई कहानी की शुरुआत बन जाती है।
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