
भारत और अमेरिका के बीच सोमवार को जिस ट्रेड डील का ऐलान हुआ, उसने दोनों देशों के रिश्तों में जमी बर्फ को काफी हद तक पिघला दिया है। इस समझौते के तहत भारत पर लगने वाला अमेरिकी टैरिफ 50 पर्सेंट से घटकर 18 पर्सेंट रह जाएगा। हालांकि, अमेरिका की ओर से यह भी दावा किया गया है कि भारत ने कई बड़े वादे किए हैं जैसे रूसी तेल की खरीद बंद करना, अमेरिकी उत्पादों पर शून्य टैरिफ की दिशा में बढ़ना, नॉन-टैरिफ बैरियर्स हटाना और 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदना। इन दावों पर भारत सरकार की ओर से अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। आइए जानते हैं पूरी खबर को विस्तार से।
अगर सीधे-सीधे असर की बात करें, तो 18 पर्सेंट टैरिफ भारत को दूसरे एशियाई निर्यातक देशों के बराबर खड़ा करता है। अगस्त के आखिर में जब 50 पर्सेंट टैरिफ लागू हुआ था, तब जेम्स एंड ज्वेलरी, टेक्सटाइल और मरीन प्रोडक्ट्स जैसे सेक्टर्स को जोर का झटका लगा था। इसके बावजूद भारत ने वैकल्पिक बाजारों में अपनी पकड़ बनाए रखी। अब टैरिफ घटने से इन सेक्टर्स को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है और अमेरिका जैसे बड़े बाजार में दोबारा मजबूती से एंट्री का रास्ता खुलेगा।
यह डील करीब एक साल से चले आ रहे तनाव के बाद सामने आई है। अप्रैल 2025 में भारत समेत कई देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाए गए थे, लेकिन बातचीत तब अटक गई जब भारत ने अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलने में हिचक दिखाई। इसके बाद हालात और बिगड़े, जब भारत सरकार ने भारत-पाकिस्तान तनाव को खत्म कराने में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका को लेकर उनके दावों को सिरे से खारिज कर दिया।
अगस्त में हालात चरम पर पहुंच गए, जब अतिरिक्त 25 पर्सेंट टैरिफ लगा दिया गया और भारत, ब्राजील के साथ, अमेरिकी टैरिफ का सबसे ज्यादा शिकार बना। इस पृष्ठभूमि में यह ट्रेड डील भारत के सबसे बड़े निर्यात बाजार को हाथ से फिसलने से बचाने के लिए बेहद अहम थी। रूसी तेल का मुद्दा भी इस तनाव का बड़ा कारण रहा। यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने सस्ते दामों पर रूसी तेल खरीदा, जिससे रूस भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया
हालांकि, बीते एक साल में डिस्काउंट घटने के साथ भारत ने रूसी तेल की खरीद कम की है। FY26 में रूस की हिस्सेदारी घटकर 32 पर्सेंट रह गई है, जबकि अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़कर 8 पर्सेंट से ज्यादा हो गई है। अगस्त 2025 के पेनल्टी टैरिफ सीधे तौर पर इसी मुद्दे से जुड़े थे। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह डील भारत को एशियाई साथियों के बराबर लाकर खड़ा करती है और निर्यात व रुपये पर पड़े अनावश्यक दबाव को हटाती है। यानी कोई अतिरिक्त फायदा नहीं, लेकिन खेल अब बराबरी का हो गया है।
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