
IUS Iran War Effect on Gulf Countires: ‘अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन उसका दोस्त होना घातक है।’ दशकों पहले अमेरिकी राजनयिक हेनरी किसिंजर ने जब ये शब्द कहे थे, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि 2026 में दुबई की गगनचुंबी इमारतों के ऊपर फटने वाली मिसाइलें इस जुमले को एक कड़वी हकीकत बना देंगी। जब यूएई के पाम जुमेराह से धुआं उठा और सऊदी अरब के तेल क्षेत्रों पर हमले का खतरा मंडरा रहा है, तो खाड़ी के सुल्तानों को किसिंजर के उस 'दोस्ती के जाल' का अहसास हो रहा होगा।
पिछले कई दशकों से संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब को मध्य पूर्व के एक ऐसे 'सुरक्षित ठिकाने' के रूप में देखा जाता था, जहां व्यापार, पर्यटन और विलासिता का संगम था। लेकिन 28, फरवरी 2026 की सुबह ने इस भ्रम को हमेशा के लिए तोड़ दिया। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या और सैन्य ठिकानों पर की गई बमबारी ने न केवल ईरान को झकझोरा, बल्कि उन पड़ोसी अरब देशों को भी युद्ध की आग में झोंक दिया जो शांति से अपना कारोबार कर रहे थे।
दुबई, जिसे दुनिया भर के रईसों और पर्यटकों के लिए स्वर्ग माना जाता था, अब मिसाइल इंटरसेप्टर की आवाजों से गूंज रहा है। ईरान द्वारा किए गए जवाबी हमलों में दुबई के प्रतिष्ठित 'पाम जुमेराह' (Palm Jumeirah) और 'बुर्ज अल अरब' (Burj Al Arab) जैसे इलाकों के ऊपर आसमान में धमाके देखे गए। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर होफित गोलान, जिनके लाखों फॉलोअर्स हैं, ने अपने बालकनी से धुएं का गुबार देखते हुए चीखते हुए कहा, 'हे भगावान... यह मेरे घर के सामने हो रहा है।' यह केवल एक व्यक्ति का डर नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का डर है जिसे दशकों से 'सेफ हेवन' बताकर बेचा गया था।
खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था, जो विविधीकरण के दौर से गुजर रही थी, उसे इस युद्ध ने गहरी चोट पहुंचाई है।
शेयर बाजार में गिरावट: दुबई फाइनेंशियल मार्केट (DFM) और अबू धाबी सिक्योरिटीज एक्सचेंज (ADX) को दो दिनों के लिए बंद करना पड़ा है।
विमानन क्षेत्र ठप: दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जो दुनिया के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में से एक है, वहां से सैकड़ों उड़ानें रद्द कर दी गईं। कतर और यूएई ने अपना हवाई क्षेत्र अस्थायी रूप से बंद कर दिया है।
सप्लाई चेन पर संकट: होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया का 20 से 25 प्रतिशत तेल गुजरता है, अब युद्ध क्षेत्र बन चुका है। कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने की आशंका है।
इस संकट ने खाड़ी देशों के सामने एक बड़ा कूटनीतिक संकट खड़ा कर दिया है। सऊदी अरब और यूएई ने अमेरिका को अपने सैन्य अड्डों का इस्तेमाल ईरान पर हमले के लिए करने से मना किया था, लेकिन ईरान के लिए यह फर्क बेमानी साबित हुआ। ईरान का तर्क सीधा है- यदि आप अमेरिका के सहयोगी हैं, तो आप निशाने पर हैं।
ब्रिटेन की पर्यटक रोबिन दुबई के फेयरमोंट होटल में ठहरी थीं। वह कहती हैं, 'यह एक रियलिटी चेक है। अब अहसास हो रहा है कि जो कुछ भी चमकता है, वह सब सोना नहीं होता।' दुबई की सड़कों पर पसरा सन्नाटा और सुपरमार्केट में सामान के लिए लगी लंबी कतारें बताती हैं कि आम जनता अब 'हम रहें शान में, बाकी सब भाड़ में' वाली मानसिकता में आ गई है।
ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल्बुसैदी के मुताबिक, परमाणु समझौता बस होने ही वाला था, लेकिन बमबारी ने कूटनीति के सारे दरवाजे बंद कर दिए। अब स्थिति यह है कि-
क्षेत्रीय सुरक्षा का अंत: दशकों से चली आ रही स्थिरता अब खत्म हो चुकी है।
अर्थव्यवस्था को झटका: सऊदी का 'विजन 2030' और यूएई के टेक हब बनने के सपने पर युद्ध के बादलों ने पानी फेर दिया है। निवेशक अब खाड़ी को 'जोखिम वाला क्षेत्र' मानने लगे हैं।
अनचाहा युद्ध: कुवैत, कतर और बहरीन जैसे देश, जो इस लड़ाई का हिस्सा नहीं थे, अब ईरान की मिसाइलों और ड्रोन हमलों का सामना कर रहे हैं।
खाड़ी देशों, सऊदी अरब, यूएई, कतर और बहरीन ने दशकों तक अमेरिका को अपना सबसे बड़ा रक्षक माना। उन्होंने अरबों डॉलर के अमेरिकी हथियार खरीदे, अपनी जमीन पर अमेरिकी सैन्य ठिकाने बनाने दिए और क्षेत्र में वाशिंगटन के हितों की रक्षा की। लेकिन युद्ध ने दिखा दिया कि अमेरिका की यह 'सुरक्षा' वास्तव में एक 'चुंबक' की तरह काम कर रही है, जो दुश्मन की मिसाइलों को अपनी ओर खींच रही है।
अमेरिका और इजरायल के इस आक्रामक कदम ने मध्य पूर्व को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है जहां से वापसी का रास्ता मुश्किल नजर आता है। दुबई और रियाद जैसे शहर, जो अपनी शांति और समृद्धि के लिए जाने जाते थे, अब वैश्विक शक्तियों के बीच चल रहे 'अहंकार के युद्ध' की कीमत चुका रहे हैं। गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) के देश अब अपनी सुरक्षा रणनीति पर फिर से विचार करने को मजबूर हैं। क्या वे अभी भी अमेरिका पर भरोसा कर सकते हैं, जिसने उन्हें बिना बताए इस युद्ध की आग में झोंक दिया?
आज का सच यही है कि अमेरिका के दुश्मन ईरान को तो नुकसान हुआ ही है, लेकिन यूएई, सऊदी जैसे उसके दोस्तों को जो 'घातक' चोट पहुंची है, उसकी भरपाई दशकों तक नहीं हो पाएगी। किसिंजर सही थे- अमेरिका की दोस्ती की कीमत अक्सर उसकी दुश्मनी से कहीं ज्यादा चुकानी पड़ती है।
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स और द इकॉनमिस्ट की रिपोर्ट्स से इनपुट के साथ।
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