Iran Crisis: पावर प्लांट्स पर ह्यूमन चेन बनाएगा ईरान, ट्रंप की डेडलाइन से पहले चल दी बड़ी चाल

Iran War : ईरान ने अमेरिका और इजराइल के हमलों से बचने के लिए पावर प्लांट्स के चारों ओर युवाओं की ह्यूमन चेन बनाने का फैसला किया है। ट्रंप की डेडलाइन खत्म होने से पहले तनाव चरम पर है।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड7 Apr 2026, 07:46 AM IST
ईरान युद्ध के गहाने की आशंका (सांकेतिक तस्वीर)
ईरान युद्ध के गहाने की आशंका (सांकेतिक तस्वीर)(AFP)

US-Israel and Iran War : ईरान और अमेरिका के बीच तनाव अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से दी गई डेडलाइन खत्म होने से ठीक 13 घंटे पहले ईरान अपने ऊर्जा केंद्रों को बचाने के लिए हजारों नागरिकों को ढाल के रूप में इस्तेमाल करने जा रहा है। पावर प्लांट्स जैसे सार्वजनिक बुनियादी ढांचे पर हमला सीधे आम जनता के जीवन को प्रभावित करता है। इस रिपोर्ट में हम जमीनी स्तर पर होने वाले इस बड़े नागरिक जमावड़े और इसके अंतरराष्ट्रीय कानूनों पर पड़ने वाले असर का विश्लेषण करेंगे।

पावर प्लांट्स की सुरक्षा के लिए 'ह्यूमन चेन'

ईरान के खेल और युवा मंत्रालय ने देशव्यापी अभियान की घोषणा की है। इस अभियान का नाम 'उज्ज्वल भविष्य के लिए ईरानी युवाओं की ह्यूमन चेन' रखा गया है। कल दोपहर 2 बजे (तेहरान के समयनुसार) पूरे ईरान में युवा, एथलीट और कलाकार हर पावर प्लांट के बाहर एक मानव श्रृंखला बनाएंगे। मंत्रालय के मुताबिक, कम से कम 2,000 एनजीओ (NGO) सदस्य इसमें शामिल होंगे।

पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हमला युद्ध अपराध है: ईरानी मंत्री

ईरानी युवा मामलों के उप मंत्री अली रजा रहीमी ने कहा, 'दुश्मन हमारे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और संवेदनशील सुविधाओं पर हमले तेज कर रहा है। इसके जवाब में मंगलवार को देश भर के पावर प्लांट्स के चारों ओर मानवीय घेरा बनाया जाएगा।'

दुश्मन हमारे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और संवेदनशील सुविधाओं पर हमले तेज कर रहा है। इसके जवाब में मंगलवार को देश भर के पावर प्लांट्स के चारों ओर मानवीय घेरा बनाया जाएगा।- अली रजा रहीमी, युवा मामलों के उप मंत्री, ईरान

उन्होंने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक संपत्ति को निशाना बनाना एक युद्ध अपराध है।

ट्रंप की डेडलाइन से बढ़ते खतरे का संकेत

यह ह्यूमन चेन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा दी गई डेडलाइन से ठीक 13 घंटे पहले बनाई जा रही है। एक ईरानी जनरल ने जनता को अलर्ट रहने के लिए कहा है। उन्होंने संदेश दिया, 'उच्चतम स्तर की तैयारी रखें, क्योंकि अमेरिका और इजराइल आने वाले कुछ ही घंटों में ईरान पर जमीनी हमला कर सकते हैं।' ऐसा लग रहा है कि शांति समझौते के लिए चल रही बातचीत सफल नहीं हो पाई है।

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ईरान का '10-पॉइंट' जवाब और हॉर्मुज शुल्क

ईरान ने अमेरिका के शांति प्रस्ताव के जवाब में अपना 10 सूत्रीय एजेंडा रखा है। इसमें मांग की गई है कि ईरान पर हमले बंद हों, प्रतिबंध हटाए जाएं और युद्ध को स्थायी रूप से खत्म किया जाए। बदले में ईरान ने 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' को खोलने का प्रस्ताव दिया है, लेकिन प्रति जहाज 20 लाख डॉलर का 'हॉर्मुज फीस' वसूलने की शर्त रखी है। ईरान इस पैसे का इस्तेमाल देश के पुनर्निर्माण में करना चाहता है।

विषयअमेरिका का 15-सूत्रीय 'पीस प्लान'ईरान का 10-सूत्रीय जवाब
युद्ध का अंत45-दिन का अस्थायी युद्धविराम (सीजफायर)।युद्ध का स्थायी अंत (केवल सीजफायर मंजूर नहीं)।
परमाणु कार्यक्रमपरमाणु क्षमताओं को पूरी तरह खत्म करना और IAEA को पूर्ण एक्सेस।भविष्य में दोबारा हमला न होने की लिखित गारंटी।
क्षेत्रीय संघर्षईरान हिज्बुल्लाह जैसे अपने प्रॉक्सी संगठनों को फंडिंग और हथियार देना बंद करे।लेबनान में हिजबुल्लाह पर इजराइली हमले तुरंत रुकें।
प्रतिबंध (Sanctions)समझौते के पालन के बाद ही प्रतिबंध हटाए जाएंगे।सभी अमेरिकी प्रतिबंधों को तत्काल और स्थायी रूप से हटाया जाए।
हॉर्मुज जलडमरूमध्यइसे 'फ्री मैरीटाइम जोन' घोषित किया जाए; कोई इसे ब्लॉक नहीं करेगा।ईरान इसे खोलेगा, लेकिन हर गुजरने वाले जहाज से $20 लाख की 'हॉर्मुज फीस' लेगा।
राजस्व साझाकरण(प्रस्ताव में स्पष्ट नहीं)हॉर्मुज फीस का हिस्सा ओमान के साथ साझा किया जाएगा।
पुनर्निर्माणबुशहर में नागरिक परमाणु प्रोजेक्ट में मदद का वादा।हॉर्मुज फीस का उपयोग हमलों में नष्ट हुए बुनियादी ढांचे को बनाने में होगा।

मानवीय ढाल और अंतरराष्ट्रीय कानून

अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत नागरिकों को सैन्य उद्देश्यों या बुनियादी ढांचे की सुरक्षा के लिए 'मानवीय ढाल' के रूप में इस्तेमाल करना एक प्रतिबंधित युद्ध अपराध है। 1949 के जिनेवा कन्वेंशन और रोम कानून के तहत स्वेच्छा से या मजबूरी में नागरिकों को ढाल बनाना नियमों का उल्लंघन माना जाता है। जिनेवा कन्वेंशन अंतरराष्ट्रीय कानूनों का एक समूह है, जो युद्ध के दौरान मानवीय व्यवहार के मानक तय करता है। इसका मुख्य उद्देश्य उन लोगों की रक्षा करना है जो युद्ध का हिस्सा नहीं हैं या अब लड़ने की स्थिति में नहीं हैं।

1. जिनेवा कन्वेंशन का इतिहास

इसकी शुरुआत 19वीं सदी में हुई थी, लेकिन आधुनिक रूप में 1949 में चार प्रमुख कन्वेंशन अपनाए गए। चौथा जिनेवा कन्वेंशन विशेष रूप से युद्ध के समय नागरिकों की सुरक्षा पर केंद्रित है। 1977 और 2005 में इसमें अतिरिक्त प्रोटोकॉल जोड़े गए ताकि बदलती युद्ध तकनीकों के बीच सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

2. युद्ध के दौरान नागरिक सुरक्षा के मुख्य नियम

अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (IHL) के तहत कुछ बुनियादी नियम अनिवार्य हैं।

अंतर करने का सिद्धांत : हमलावर सेना को हमेशा सैन्य ठिकानों और नागरिक संपत्तियों (जैसे घर, स्कूल, अस्पताल, और पावर प्लांट) के बीच फर्क करना चाहिए। नागरिकों पर सीधा हमला एक 'युद्ध अपराध' है।

मानवीय ढाल पर रोक : किसी भी पक्ष को नागरिकों का उपयोग सैन्य ठिकानों को बचाने के लिए नहीं करना चाहिए। चाहे नागरिक स्वेच्छा से आगे आएं या उन्हें मजबूर किया जाए, उन्हें 'ढाल' बनाना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है।

अनावश्यक पीड़ा से बचाव: युद्ध में ऐसे हथियारों या तरीकों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता जो नागरिकों को अनावश्यक शारीरिक या मानसिक कष्ट दें।

बुनियादी जरूरतों की सुरक्षा: पेयजल, भोजन और बिजली जैसे नागरिक अस्तित्व के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को नष्ट करना प्रतिबंधित है।

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3. मौजूदा स्थिति में महत्व

वर्तमान ईरान-अमेरिका तनाव में, ईरान द्वारा पावर प्लांट्स पर 'ह्यूमन चेन' बनाना और अमेरिका द्वारा बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की धमकी देना, दोनों ही जिनेवा कन्वेंशन की व्याख्याओं के घेरे में आते हैं। जहां ईरान इसे 'सिविल डिफेंस' कह रहा है, वहीं अंतरराष्ट्रीय कानून इसे नागरिकों को खतरे में डालने वाली कार्रवाई के रूप में देख सकते हैं।

बढ़ते तनाव का आर्थिक प्रभाव

इस तनावपूर्ण स्थिति का आर्थिक प्रभाव केवल ईरान या अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला रहा है। चूंकि ईरान दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' पर नियंत्रण रखता है, यहां की एक छोटी सी हलचल भी वैश्विक बाजारों में हड़कंप मचा देती है। यहां इसके मुख्य आर्थिक पहलुओं का विस्तार से विवरण दिया गया है।

1. कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल

दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल और LNG (तरल प्राकृतिक गैस) स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से होकर गुजरता है। इस कारण, फरवरी में संघर्ष शुरू होने के बाद से ब्रेंट क्रूड की कीमतें 60% तक बढ़ चुकी हैं। वर्तमान में यह $110-$120 प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। यदि यह तनाव पूर्ण युद्ध में बदलता है और हॉर्मुज का रास्ता लंबे समय तक बंद रहता है, तो विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की कीमतें $150 से $200 प्रति बैरल तक जा सकती हैं।

2. वैश्विक मुद्रास्फीति का खतरा

ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर माल ढुलाई और परिवहन पर पड़ता है। यूरोप के देश, जो प्राकृतिक गैस के लिए आयात पर निर्भर हैं, पहले ही कीमतों में 60% की वृद्धि देख रहे हैं। वहीं, ईंधन महंगा होने से उर्वरक का उत्पादन महंगा हो जाता है, जिससे वैश्विक स्तर पर खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।

3. हॉर्मुज शुल्क का वित्तीय गणित

ईरान ने शांति प्रस्ताव में हर जहाज से $20 लाख (करीब 16.7 करोड़ रुपये) का शुल्क वसूलने की बात कही है। ईरान इस भारी-भरकम राशि का उपयोग युद्ध में नष्ट हुए अपने बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए करना चाहता है। यह शुल्क शिपिंग कंपनियों के लिए बहुत बड़ा वित्तीय बोझ होगा, जिससे अंततः अंतरराष्ट्रीय व्यापार और महंगा हो जाएगा।

4. शेयर बाजारों में अस्थिरता

अमेरिकी और एशियाई शेयर बाजारों में अनिश्चितता का माहौल है। निवेशकों को डर है कि लंबे समय तक चलने वाला युद्ध 'स्टैगफ्लेशन' की स्थिति पैदा कर सकता है, जहां आर्थिक विकास रुक जाता है लेकिन महंगाई बढ़ती रहती है। अनिश्चितता के कारण निवेशक सुरक्षित विकल्प के तौर पर सोने में निवेश बढ़ा रहे हैं, जिससे सोने की कीमतें भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही हैं।

5. विमानन और रसद

ईरानी हवाई क्षेत्र बंद होने या असुरक्षित होने से यूरोप और एशिया के बीच की उड़ानों को लंबे रूट लेने पड़ रहे हैं। जेट फ्यूल महंगा होने और लंबे रूट की वजह से एयरलाइंस ने टिकट की कीमतों में भारी बढ़ोतरी की है या कई उड़ानें रद्द कर दी हैं।

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बड़े खतरे की ओर बढ़ती दुनिया

अगर मंगलवार रात 8 बजे (भारतीय समयानुसार बुधवार सुबह 5:30 बजे) की डेडलाइन के बाद हमला होता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था एक गहरे संकट में जा सकती है। भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि इससे विदेशी मुद्रा भंडार और घरेलू बजट दोनों पर दबाव बढ़ेगा। क्या आप समझना चाहेंगे कि इस संकट का भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर क्या असर पड़ सकता है?

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