क्या आप रोजाना यूज करती हैं टॉयलेट पेपर? डॉक्टर से जानें इससे कैसे बढ़ रहा UTI का खतरा

यूरिनरी स्वास्थ्य पर टॉयलेट पेपर का भी असर पड़ता है। घटिया, खुशबूदार या रंगीन पेपर जलन, बैक्टीरिया और UTI का खतरा बढ़ा सकते हैं। नरम, बिना खुशबू वाला पेपर चुनें, सही तरीके से पोंछें और पर्याप्त पानी पिएं।

Manali Rastogi
पब्लिश्ड15 Jan 2026, 04:49 PM IST
क्या आप रोजाना यूज करती हैं टॉयलेट पेपर? डॉक्टर से जानें इससे कैसे बढ़ रहा UTI का खतरा
क्या आप रोजाना यूज करती हैं टॉयलेट पेपर? डॉक्टर से जानें इससे कैसे बढ़ रहा UTI का खतरा

यूरिनरी स्वास्थ्य बनाए रखना सिर्फ ज़्यादा पानी पीने या समय पर वॉशरूम जाने तक सीमित नहीं है। हमारी रोजमर्रा की साफ-सफाई की आदतें भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं। यहां तक कि हम कौन-सा टॉयलेट पेपर इस्तेमाल करते हैं, यह भी जलन और UTI (यूरिन इंफेक्शन) के खतरे को बढ़ा सकता है।

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HT लाइफस्टाइल से बातचीत करते हुए मुंबई के पवई स्थित डॉ. एल. एच. हिरानंदानी अस्पताल के एसोसिएट डायरेक्टर (यूरोलॉजी) डॉ. प्रकाश चंद्र शेट्टी ने बताया कि कुछ तरह के टॉयलेट पेपर कैसे संवेदनशील हिस्सों में जलन पैदा कर सकते हैं और UTI का जोखिम बढ़ा सकते हैं, साथ ही सुरक्षित विकल्प भी सुझाते हैं।

क्या टॉयलेट पेपर का प्रकार वाकई यूरिनरी स्वास्थ्य को प्रभावित करता है?

डॉ. शेट्टी कहते हैं, “क्लिनिकल प्रैक्टिस में देखा गया है कि टॉयलेट पेपर की गुणवत्ता महिलाओं के यूरोजेनिटल (मूत्र-जनन) स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। घटिया या खुशबूदार टॉयलेट पेपर अक्सर रिसाइकल्ड मटीरियल से बनते हैं, जिनमें ब्लीचिंग जैसे केमिकल हो सकते हैं। ये यूरिन की नली (यूरेथ्रा) के मुहाने में जलन पैदा करते हैं, जिससे ई. कोलाई जैसे बैक्टीरिया को मूत्र मार्ग में प्रवेश करना आसान हो जाता है।”

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वे बताते हैं कि टॉयलेट पेपर की बनावट भी मायने रखती है। “खुरदुरा, बहुत पतला या जल्दी टूटने वाला पेपर छोटे-छोटे टुकड़े छोड़ सकता है। ये टुकड़े नमी और बैक्टीरिया को फंसा लेते हैं, जिससे इंफेक्शन का खतरा बढ़ता है। संवेदनशील त्वचा, डायबिटीज, मेनोपॉज़ से जुड़े हार्मोनल बदलाव या कमज़ोर इम्युनिटी वाले लोगों में यह जोखिम और ज़्यादा होता है।”

पोंछने का तरीका भी अहम है। डॉ. शेट्टी चेतावनी देते हैं, “गलत तरीके से पोंछना या ज़्यादा रगड़ पैदा करने वाला टॉयलेट पेपर सूक्ष्म घाव (माइक्रो-एब्रेशन) बना सकता है। रंगीन या खुशबूदार पेपर योनि का pH बिगाड़ सकते हैं, जिससे UTI की संभावना बढ़ जाती है।”

UTI के खतरे को कैसे कम करें?

तो आम लोग क्या करें? डॉ. शेट्टी कहते हैं, “नरम, बिना खुशबू और बिना रंग वाला टॉयलेट पेपर चुनें, जो वर्जिन पल्प या अच्छी गुणवत्ता वाले बांस (बैंबू) से बना हो। इससे त्वचा सुरक्षित रहती है और पेपर के टुकड़े चिपकने की समस्या कम होती है। हमेशा आगे से पीछे की ओर पोंछें, ज़्यादा ज़ोर न लगाएं और पर्याप्त पानी पीते रहें।”

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वे जोर देकर कहते हैं कि अगर बार-बार UTI हो रहा है, तो रोज़मर्रा की पर्सनल हाइजीन से जुड़ी चीज़ों पर भी ध्यान देना चाहिए। “छोटी-छोटी बातें, जैसे टॉयलेट पेपर का चुनाव, भी मूत्र स्वास्थ्य पर बड़ा असर डाल सकती हैं। UTI को कंट्रोल करना सिर्फ दवाओं से नहीं होता, बल्कि अच्छी सफ़ाई, सही प्रोडक्ट का चुनाव और रोज की आदतों के प्रति जागरूकता भी जरूरी है।”

(डिस्क्लेमर: ये सलाह सामान्य जानकारी के लिए दी गई है। कोई फैसला लेने से पहले विशेषज्ञ से बात करें। मिंट हिंदी किसी भी परिणाम के लिए जिम्मेदार नहीं है।)

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