
लोहड़ी उत्तर भारत का एक लोकप्रिय त्योहार है, जिसे खास तौर पर पंजाब और हरियाणा में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व फसल कटाई के बाद जनवरी–फरवरी के महीनों में प्रकृति में नए जीवन के आगमन का प्रतीक माना जाता है।
लोहड़ी की शुरुआत पवित्र अग्नि जलाने से होती है। इस दौरान तिल, गुड़, गजक और रेवड़ी अग्नि में अर्पित की जाती है, जो इस त्योहार का प्रमुख प्रतीक है। लोहड़ी यह भी दर्शाती है कि कठोर सर्दियों का समय समाप्त हो रहा है और उजले, सुखद दिनों की शुरुआत हो रही है। वर्ष 2026 में लोहड़ी का पर्व 13 जनवरी, मंगलवार को मनाया जा रहा है।
लोहड़ी का पर्व पंजाब क्षेत्र में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्योहार गन्ना और सरसों जैसी रबी की फसलों की कटाई की खुशी में मनाया जाता है। लोहड़ी लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने का अवसर भी देती है। इस दिन लोग भांगड़ा और गिद्धा नृत्य करते हैं और खुशी मनाते हैं।
लोहड़ी की रात खुले स्थान पर अलाव जलाया जाता है, जिसे शुभ माना जाता है। लोग अलाव के चारों ओर इकट्ठा होकर तिल, रेवड़ी और मक्का के दाने अग्नि को अर्पित करते हैं। इस अवसर पर नाचना, गाना और मिल-जुलकर समय बिताना बहुत महत्वपूर्ण होता है। पुरुष ढोल की थाप पर भांगड़ा करते हैं, जबकि महिलाएं गिद्धा नृत्य करती हैं।
इस दिन सरसों का साग, मक्के की रोटी और तिल के लड्डू जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। जिन घरों में हाल ही में विवाह हुआ हो या बच्चे का जन्म हुआ हो, वहां लोहड़ी विशेष रूप से धूमधाम से मनाई जाती है और मेहमानों को उपहार दिए जाते हैं।
लोहड़ी की कथा भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी हुई मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पर्व की शुरुआत वैदिक काल से मानी जाती है। कथा के अनुसार, माता सती के अग्नि में समर्पण के बाद लोहड़ी पर्व मनाने की परंपरा शुरू हुई।
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा प्रजापति दक्ष भगवान शिव और उनकी पुत्री सती के विवाह से प्रसन्न नहीं थे। एक समय दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने जानबूझकर भगवान शिव और माता सती को आमंत्रित नहीं किया। जब माता सती को इस यज्ञ के बारे में पता चला, तो उन्होंने अपने पति भगवान शिव से वहां जाने की इच्छा व्यक्त की।
भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि बिना निमंत्रण के किसी समारोह में जाना उचित नहीं होता और इससे अपमान का सामना करना पड़ सकता है। इसके बावजूद माता सती ने अपने पिता के घर जाने का निर्णय लिया।
जब माता सती यज्ञ स्थल पर पहुंचीं, तो उन्होंने वहां भगवान शिव के प्रति अपमानजनक बातें सुनीं। अपने पति का अपमान सहन न कर पाने के कारण वे अत्यंत दुखी हो गईं। इसी पीड़ा और क्रोध में माता सती ने यज्ञ की अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया।
मान्यता है कि तभी से हर वर्ष माता सती की स्मृति में लोहड़ी पर्व मनाया जाने लगा। यह पर्व त्याग, आत्मसम्मान और आस्था का प्रतीक माना जाता है।
(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)
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