
चैत्र नवरात्रि एक पवित्र त्योहार है, जो उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में बड़े श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह नौ दिनों का उत्सव मां दुर्गा और उनके नौ रूपों (नवदुर्गा) को समर्पित होता है। इन नौ रूपों में मां शैलपुत्री, मां ब्रह्मचारिणी, मां चंद्रघंटा, मां कूष्मांडा, मां स्कंदमाता, मां कात्यायनी, मां कालरात्रि, मां महागौरी और मां सिद्धिदात्री शामिल हैं।
इस दौरान भक्त मां दुर्गा और उनके सभी रूपों की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं, सात्विक भोजन करते हैं और देवी से आशीर्वाद मांगते हैं। आज हम मां दुर्गा के सातवें रूप, मां कालरात्रि के बारे में जानेंगे।
मां कालरात्रि, मां दुर्गा का सातवां रूप हैं। मान्यता है कि उनकी पूजा करने से भक्तों को बुरी शक्तियों और अकाल मृत्यु से रक्षा मिलती है। वे डर को दूर करके साहस और शक्ति देती हैं। उनका रूप भले ही भयानक लगता हो, लेकिन वे सुरक्षा, साहस और शक्ति का प्रतीक हैं।
उनके नाम में "काल" का मतलब समय या मृत्यु और "रात्रि" का मतलब रात होता है। मां कालरात्रि के चार हाथ होते हैं। जहां अन्य देवी शेर या बाघ पर सवारी करती हैं, वहीं मां कालरात्रि गधे पर सवार होती हैं।
इस दिन सुबह जल्दी उठें और घर को गंगाजल से साफ करें। सूर्योदय से पहले स्नान करें। मंदिर की जगह को साफ करके मां कालरात्रि के लिए आसन तैयार करें। आसन पर सादा ग्रे (धूसर) रंग का कपड़ा बिछाएं और उस पर देवी की मूर्ति स्थापित करें।
देवी को ग्रे रंग के वस्त्र और फूल अर्पित करें। पूजा की शुरुआत घी का दीपक जलाकर करें। इसके बाद पान, सुपारी, लौंग, शहद और इलायची जैसी पारंपरिक चीजें चढ़ाएं। फिर नारियल और अपने अनुसार उपलब्ध फल अर्पित करें।
इसके बाद भक्तों को दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए और अंत में मां कालरात्रि की आरती करनी चाहिए।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, शुंभ और निशुंभ नाम के राक्षसों ने चंड, मुंड और रक्तबीज की मदद से देवताओं को हरा दिया और तीनों लोकों पर कब्जा कर लिया। इससे परेशान होकर इंद्र और अन्य देवताओं ने मां दुर्गा से मदद मांगी।
तब मां दुर्गा ने अपना उग्र रूप, देवी चामुंडा, धारण किया और राक्षसों का नाश किया। मां काली ने चंड, मुंड और रक्तबीज का वध कर संसार में शांति स्थापित की। मां काली, मां दुर्गा का सबसे शक्तिशाली और उग्र रूप हैं। वे बुरी शक्तियों और नकारात्मक ऊर्जा को खत्म करती हैं और अपने भक्तों को सुरक्षा, साहस और शांति देती हैं।
जय जय अम्बे जय कालरात्रि.
कालरात्रि जय-जय-महाकाली .
काल के मुह से बचाने वाली ॥
दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा .
महाचंडी तेरा अवतार ॥
पृथ्वी और आकाश पे सारा .
महाकाली है तेरा पसारा ॥
खडग खप्पर रखने वाली .
दुष्टों का लहू चखने वाली ॥
कलकत्ता स्थान तुम्हारा .
सब जगह देखूं तेरा नजारा ॥
सभी देवता सब नर-नारी .
गावें स्तुति सभी तुम्हारी ॥
रक्तदंता और अन्नपूर्णा .
कृपा करे तो कोई भी दुःख ना ॥
ना कोई चिंता रहे बीमारी .
ना कोई गम ना संकट भारी ॥
उस पर कभी कष्ट ना आवें .
महाकाली मां जिसे बचाबे ॥
तू भी भक्त प्रेम से कह .
कालरात्रि मां तेरी जय ॥
जय जय अम्बे जय कालरात्रि.
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता.
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोह लताकण्टकभूषणा.
वर्धन मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता.
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
जय काली, कलिमलहरण, महिमा अगम अपार.
महिष मर्दिनी कालिका, देहु अभय अपार॥
अरि मद मान मिटावन हारी, मुण्डमाल गल सोहत प्यारी॥
अष्टभुजी सुखदायक माता, दुष्टदलन जग में विख्याता॥ 1॥
भाल विशाल मुकुट छवि छाजै, कर में शीश शत्रु का साजै॥
दूजे हाथ लिए मधु प्याला, हाथ तीसरे सोहत भाला॥ 2॥
चौथे खप्पर खड्ग कर पांचे, छठे त्रिशूल शत्रु बल जांचे॥
सप्तम करदमकत असि प्यारी, शोभा अद्भुत मात तुम्हारी॥ 3॥
अष्टम कर भक्तन वर दाता, जग मनहरण रूप ये माता॥
भक्तन में अनुरक्त भवानी, निशदिन रटें ऋषि-मुनि ज्ञानी॥ 4॥
महाशक्ति अति प्रबल पुनीता, तू ही काली तू ही सीता॥
पतित तारिणी हे जग पालक, कल्याणी पापी कुल घालक॥ 5॥
शेष सुरेश न पावत पारा, गौरी रूप धर्यो इक बारा॥
तुम समान दाता नहिं दूजा, विधिवत करें भक्तजन पूजा॥ 6॥
रूप भयंकर जब तुम धारा, दुष्टदलन कीन्हेहु संहारा॥
नाम अनेकन मात तुम्हारे, भक्तजनों के संकट टारे॥ 7॥
कलि के कष्ट कलेशन हरनी, भव भय मोचन मंगल करनी॥
महिमा अगम वेद यश गावैं, नारद शारद पार न पावैं॥ 8॥
भू पर भार बढ़्यो जब भारी, तब तब तुम प्रकटीं महतारी॥
आदि अनादि अभय वरदाता, विश्वविदित भव संकट त्राता॥ 9॥
कुसमय नाम तुम्हारौ लीन्हा, उसको सदा अभय वर दीन्हा॥
ध्यान धरें श्रुति शेष सुरेशा, काल रूप लखि तुमरो भेषा॥ 10॥
कलुआ भैंरों संग तुम्हारे, अरि हित रूप भयानक धारे॥
सेवक लांगुर रहत अगारी, चौसठ जोगन आज्ञाकारी॥ 11॥
त्रेता में रघुवर हित आई, दशकंधर की सैन नसाई॥
खेला रण का खेल निराला, भरा मांस-मज्जा से प्याला॥ 12॥
रौद्र रूप लखि दानव भागे, कियौ गवन भवन निज त्यागे॥
तब ऐसौ तामस चढ़ आयो, स्वजन विजन को भेद भुलायो॥ 13॥
ये बालक लखि शंकर आए, राह रोक चरनन में धाए॥
तब मुख जीभ निकर जो आई, यही रूप प्रचलित है माई॥ 14॥
बाढ़्यो महिषासुर मद भारी, पीड़ित किए सकल नर-नारी॥
करूण पुकार सुनी भक्तन की, पीर मिटावन हित जन-जन की॥ 15॥
तब प्रगटी निज सैन समेता, नाम पड़ा मां महिष विजेता॥
शुंभ निशुंभ हने छन माहीं, तुम सम जग दूसर कोउ नाहीं॥ 16॥
मान मथनहारी खल दल के, सदा सहायक भक्त विकल के॥
दीन विहीन करैं नित सेवा, पावैं मनवांछित फल मेवा॥ 17॥
संकट में जो सुमिरन करहीं, उनके कष्ट मातु तुम हरहीं॥
प्रेम सहित जो कीरति गावैं, भव बंधन सों मुक्ती पावैं॥ 18॥
काली चालीसा जो पढ़हीं, स्वर्गलोक बिनु बंधन चढ़हीं॥
दया दृष्टि हेरौ जगदम्बा, केहि कारण मां कियौ विलम्बा॥ 19॥
करहु मातु भक्तन रखवाली, जयति जयति काली कंकाली॥
सेवक दीन अनाथ अनारी, भक्तिभाव युति शरण तुम्हारी॥ 20॥
प्रेम सहित जो करे, काली चालीसा पाठ.
तिनकी पूरन कामना, होय सकल जग ठाठ॥
(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)
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