Madhav Gadgil passes away: भारत के पर्यावरण आंदोलन की सोच और दिशा तय करने वाले दिग्गज वैज्ञानिक माधव गाडगिल का पुणे में निधन हो गया। उनकी मौत ने देश को एक ऐसे शख्स से वंचित कर दिया है, जिसने दशकों तक पर्यावरण और समाज के बीच पुल बनाने का काम किया।
कौन थे माधव गाडगिल?
माधव धनंजय गाडगिल एक जाने-माने पारिस्थितिकी वैज्ञानिक, लेखक और सार्वजनिक बुद्धिजीवी थे। उनका मानना था कि जंगल, नदियां और जमीन की सुरक्षा सिर्फ कानूनों से नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ही संभव है।
IISc में पर्यावरण अध्ययन की मजबूत नींव
गाडगिल ने भारतीय विज्ञान संस्थान में सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज की स्थापना की, जो देश में पर्यावरणीय शोध का बड़ा केंद्र बना। यहां से निकले कई शोधकर्ताओं ने भारत की पर्यावरण नीति और संरक्षण आंदोलनों को आकार दिया।
वेस्टर्न घाट रिपोर्ट
साल 2010 में गाडगिल ने वेस्टर्न घाट्स इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनल की अध्यक्षता की। इस रिपोर्ट ने पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील इलाकों की सुरक्षा के लिए सख्त कदम सुझाए। इसे "गाडगिल कमेटी रिपोर्ट" कहा गया। जहां वैज्ञानिकों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इसकी सराहना की, वहीं कुछ राज्यों और उद्योग जगत ने इसे विकास विरोधी बताया।
पुरस्कार और सम्मान
माधव गाडगिल प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के सदस्य भी रहे। उन्हें पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले, जिनमें पद्म श्री, पद्म भूषण, वोल्वो एनवायरनमेंट प्राइज और टायलर प्राइज शामिल हैं। 2024 में उन्हें “चैंपियंस ऑफ द अर्थ” अवॉर्ड से भी नवाजा गया।
एक विचार जो आगे भी जिंदा रहेगा
माधव गाडगिल का जाना भारतीय पर्यावरण आंदोलन के लिए बड़ी क्षति है। लेकिन उनकी सोच, रिपोर्ट और काम आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे। उन्होंने दिखाया कि विज्ञान और समाज मिलकर ही प्रकृति की रक्षा कर सकते हैं।