माघ मेला, जो हर साल प्रयागराज में लगता है, अपने भीतर एक खास शांति समेटे रहता है। भीड़ होने के बावजूद यहां ठहराव महसूस होता है। संगम पर यह मेला धीरे-धीरे आगे बढ़ता है, आस्था, रोज़मर्रा की साधना और नदी के किनारे बिताए लंबे समय से आकार लेता है। साल 2026 में माघ मेला 4 जनवरी से शुरू हुआ। इसके बाद के दिन शांत तरीके से आगे बढ़ते हैं।
लेकिन जिस दिन का सबसे ज्यादा इंतजार होता है, वह है मकर संक्रांति। यह दिन माघ मेला 2026 का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण शाही स्नान माना जाता है। मकर संक्रांति पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु संगम पहुंचते हैं। पास के कस्बों से भी और दूर-दराज़ से भी। सभी का उद्देश्य संगम में डुबकी लगाना होता है। कई लोगों के लिए इस स्नान का विशेष महत्व होता है।
दूसरा शाही स्नान कब है और इसका महत्व
हिंदू पंचांग के अनुसार मकर संक्रांति 14 जनवरी 2026 को है। इस साल यह षटतिला एकादशी के साथ पड़ रही है, जिससे इस दिन का महत्व और बढ़ जाता है। माघ मेला 2026 का दूसरा शाही स्नान इसी दिन किया जाएगा।
मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन संगम में स्नान करने से मन को शांति मिलती है और आत्मिक शुद्धि होती है। इसे पूरे माघ मेले का सबसे अर्थपूर्ण स्नान माना जाता है। ऐसा समय जब साधना और श्रद्धा एक साथ मिलती हैं।
मकर संक्रांति पर स्नान और पूजा विधि
इस दिन किए जाने वाले नियम सरल होते हैं, लेकिन उनमें अनुशासन बहुत जरूरी माना जाता है।
- मौन स्नान: संगम में स्नान करते समय श्रद्धालु मन ही मन मंत्रों का जाप करते हैं, जैसे ओम नमः शिवाय या गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। बातचीत कम से कम की जाती है।
- अर्घ्य देना: स्नान के बाद तांबे के लोटे से सूर्य देव को जल अर्पित किया जाता है। इसमें लाल फूल और साबुत चावल डाले जाते हैं। उत्तरायण के समय यह अर्घ्य मन और जीवन में स्थिरता लाने वाला माना जाता है।
- तिल का प्रयोग: काले तिल मिलाकर स्नान करना और तिल का लेप लगाना माघ महीने और मकर संक्रांति पर विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
- कल्पवास का संकल्प: कल्पवासी श्रद्धालुओं के लिए माघ मेला 2026 का दूसरा स्नान बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसे अमृत प्राप्ति के समान बताया गया है।
दूसरे स्नान के दिन दान का महत्व
इस दिन दान का भी खास महत्व होता है। मान्यता है कि दूसरे शाही स्नान के समय किया गया दान कई गुना फल देता है।
ध्यान रखने योग्य बातें
- ब्रह्म मुहूर्त को स्नान के लिए सबसे उत्तम समय माना जाता है।
- इस अवधि में नकारात्मक विचार और कर्म से बचें।
- नदी को साफ रखें।
- शारीरिक और मानसिक अनुशासन बनाए रखें।
(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)