Mahashivratri Vrat Katha: इस कथा के बिना अधूरा माना जाता है महाशिवरात्रि का व्रत, यहां पढ़िए संपूर्ण पौराणिक व्रत कथा

महाशिवरात्रि का व्रत अत्यंत पवित्र माना गया है। शिव महापुराण के अनुसार एक क्रूर शिकारी ने अनजाने में बेलपत्र और जल शिवलिंग पर चढ़ाकर व्रत का फल पाया। उसकी भावना बदल गई और भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसे मोक्ष का वरदान दिया। यह व्रत पापों का नाश करता है।

Manali Rastogi
अपडेटेड15 Feb 2026, 06:05 AM IST
Mahashivratri Vrat Katha
Mahashivratri Vrat Katha(Pixabay)

भगवान शिव हिंदू धर्म के सबसे पूजनीय देवताओं में से एक हैं। उनकी पूजा करने से मनुष्य को सांसारिक सुख और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। भगवान शिव के लिए रखा गया व्रत, पूजा और प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती।

शिव महापुराण और जबाली श्रुति के अनुसार दस शैव व्रत ऐसे हैं जो भगवान शिव को अत्यंत प्रिय हैं और मनुष्य को संसारिक बंधनों से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करते हैं। हालांकि कलियुग में इन व्रतों का पालन करना कठिन माना गया है।

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प्राचीन समय में भगवान विष्णु, ब्रह्मा जी और माता पार्वती ने लोककल्याण के लिए भगवान शिव को शिवरात्रि व्रत का महत्व बताया। स्वयं भगवान शिव ने कहा कि जो लोग भोग और मोक्ष दोनों की इच्छा रखते हैं, उनके लिए शिवरात्रि से बढ़कर कोई व्रत नहीं है। यह व्रत सभी वर्णों, आश्रमों, स्त्री-पुरुषों, बच्चों और यहां तक कि देवताओं के लिए भी श्रेष्ठ है।

महाशिवरात्रि व्रत की कथा (Maha Shivratri Vrat Katha in Hindi)

शिव महापुराण में शिवरात्रि व्रत से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कथा वर्णित है। यह कथा बताती है कि किस प्रकार एक शिकारी ने अनजाने में शिवरात्रि का व्रत करके अंत में शिवपद को प्राप्त किया। नैमिषारण्य में महात्मा सूत जी ने ऋषियों को यह कथा सुनाई:

बहुत समय पहले गुरु-द्रुह नाम का एक शिकारी घने जंगल में रहता था। वह बलवान था, परंतु क्रूर स्वभाव का था और उसमें दया नहीं थी। वह जानवरों का शिकार करके अपना जीवन चलाता था और उसने कभी कोई पुण्य कार्य नहीं किया था।

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एक दिन कई दिनों तक शिकार न मिलने के कारण वह और उसका परिवार भूख से परेशान थे। संयोग से वह दिन महाशिवरात्रि का था। भोजन की तलाश में वह जंगल में भटकता रहा, लेकिन कोई शिकार नहीं मिला। इस प्रकार उसने और उसके परिवार ने अनजाने में ही शिवरात्रि का व्रत कर लिया।

खाली हाथ घर न लौटने के लिए वह एक तालाब के पास बेल के पेड़ पर चढ़ गया और शिकार की प्रतीक्षा करने लगा। पेड़ पर बैठे-बैठे उसके हाथ से कुछ बेलपत्र और पानी नीचे गिरा, जो पेड़ के नीचे स्थित शिवलिंग पर चढ़ गया। इस तरह अनजाने में उसकी पूजा हो गई।

पहला प्रहर

रात के पहले प्रहर में एक हिरणी पानी पीने आई। शिकारी ने धनुष ताना, तभी उसके हाथ से फिर बेलपत्र और पानी शिवलिंग पर गिर गया। इससे उसके कुछ पाप नष्ट हो गए।

हिरणी ने प्रार्थना की कि उसके छोटे-छोटे बच्चे हैं, वह उन्हें सुरक्षित कर वापस आ जाएगी। उसकी बात सुनकर और भगवान शिव की कृपा से प्रभावित होकर शिकारी ने उसे जाने दिया।

दूसरा प्रहर

दूसरे प्रहर में उस हिरणी की बहन आई। शिकारी ने फिर निशाना साधा, लेकिन फिर बेलपत्र और पानी शिवलिंग पर गिर गया। उसके और पाप समाप्त हो गए।

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उसने भी अपने बच्चों को सौंपकर लौटने की अनुमति मांगी और भगवान विष्णु की शपथ ली कि वह वापस आएगी। शिकारी ने उसे भी जाने दिया।

तीसरा प्रहर

कुछ समय बाद एक हिरण आया, जो उन दोनों हिरणियों का पति था। शिकारी ने जैसे ही उसे मारने का प्रयास किया, फिर बेलपत्र और जल शिवलिंग पर चढ़ गया। हिरण ने भी अपने परिवार से मिलने के लिए समय मांगा और शिकारी ने उसे भी अनुमति दे दी।

अंतिम परिवर्तन

कुछ समय बाद पूरा हिरण परिवार अपने वचन के अनुसार लौट आया। उनकी सच्चाई और त्याग देखकर शिकारी का हृदय पिघल गया। उसने अपने क्रूर जीवन पर पछतावा किया और उन्हें मारने का विचार छोड़ दिया।

तभी भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए और उसकी अनजानी लेकिन सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर बोले, “हे निषादराज, मैं तुम्हारे व्रत और पूजा से प्रसन्न हूं। वर मांगो।” शिकारी ने विनम्रता से कहा, “आपके दर्शन से ही मुझे सब कुछ मिल गया।”

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भगवान शिव ने उसे गुह नाम दिया और आशीर्वाद दिया, “तुम श्रंगवेरपुर में निवास करोगे और दिव्य सुख भोगोगे। एक दिन श्रीराम तुम्हारे घर आएंगे और तुम उनके प्रिय मित्र बनोगे। अंत में तुम्हें मोक्ष प्राप्त होगा।” उसी समय हिरण परिवार को भी दिव्य शरीर प्राप्त हुआ और वे शिवलोक को चले गए।

महात्म्य (आध्यात्मिक महत्व)

सूत जी ने कहा कि यदि एक अज्ञानी शिकारी अनजाने में शिवरात्रि व्रत करके मोक्ष प्राप्त कर सकता है, तो जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से यह व्रत करता है, उसे दुर्लभ सुख और अंत में मुक्ति अवश्य मिलती है।

महाशिवरात्रि का व्रत सभी व्रतों, तीर्थों, दानों और कठिन तपस्याओं से भी बढ़कर फल देने वाला माना गया है। यह पापों का नाश करता है और जीवन को शुभ और पवित्र बनाता है। इस प्रकार महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का पवित्र मार्ग है।

(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)

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