
Mumbai Ahmedabad Bullet Train: देश की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना- मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (एमएएचएसआर) में मुंबई और अहमदाबाद के 508 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर में सूरत से बिलीमोरा के बीच 50 किलोमीटर रेल खंड पर अगले वर्ष 15 अगस्त तक ट्रेनों का परिचालन शुरू करने का लक्ष्य है।
परियोजना के पहले चरण में गुजरात के सूरत और बिलिमोरा के बीच करीब 50 किलोमीटर के हिस्से को तैयार किया जा रहा है। इसी खंड़ पर शुरुआती ट्रायल और संचालन शुरू किया जाएगा। इसे पूरे कॉरिडोर के लिए महत्वपूर्ण चरण माना जा रहा है। बुलेट ट्रेन परियोजना की कुल लागत एक लाख आठ हजार करोड़ रुपए है जिसमें से जापान की ओर से 88 हजार करोड़ रुपए, महाराष्ट्र तथा गुजरात सरकार पांच - पांच हजार करोड़ रुपए और भारत सरकार दस हजार करोड़ रुपए देगी।
जापानी तकनीक पर आधारित इस बुलेट ट्रेन की डिजाइन स्पीड 350 किलोमीटर प्रति घंटा है और इसकी परिचालन स्पीड 320 किलोमीटर रखी गई है। इस पूरे काॅरिडोर में 12 स्टेशन है । इनमें चार स्टेशन महाराष्ट्र और आठ स्टेशन गुजरात में हैं। महाराष्ट्र में बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी), ठाणे, विरार और बोइसर स्टेशन होंगे। गुजरात में वापी, बिलिमोरा, सूरत, भरूच, वडोदरा, आनंद, अहमदाबाद और साबरमती स्टेशन बनाए जा रहे हैं। इन स्टेशनों को प्रमुख औद्योगिक और व्यावसायिक केंद्रों से जोड़ने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है ताकि लोगों को इस ट्रेन सुविधा का अधिकतम उपयोग किया जा सके।
मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल कॉरिडोर का बड़ा हिस्सा एलिवेटेड बनाया जा रहा है। मुंबई के पास इस परियोजना की सबसे अहम बात समुद्र के नीचे बनने वाली रेल सुरंग है। यह सुरंग करीब सात किलोमीटर लंबी होगी और समुद्र के नीचे से गुजरेगी। ये भारत की पहली ऐसी रेल सुरंग होगी, जिसमें हाई स्पीड रेल संचालन के लिए अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा।
मुंबई में बांद्रा कुर्ला काम्पलेक्स स्टेशन पर छह प्लेटफार्म बनाए जाएंगे और इस स्टेशन को पास की मेट्रो रेल सेवा से जोड़ा गया है तथा इसके लिए राज्य सरकार की बातचीत अंतिम पड़ाव में है। इस कार्य में महाराष्ट्र सरकार के साथ समन्वय किया जा रहा है। इस स्टेशन की लागत तीन हजार 680 करोड़ रुपए आएगी और इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि भविष्य में इस पर 30 मंजिला इमारत बनाई जा सकती है। यहां जमीन खुदाई का 98 प्रतिशत कार्य पूरा कर लिया गया है और यह कंक्रीट स्टेज मेंं है।
इस स्टेशन का निर्माण कार्य मई 2023 में शुरू किया गया था और इसे 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। यहां जमीन के नीचे एक सुरंग का निर्माण किया जा रहा है जो आगे जाकर समुद्र के नीचे से गुजरेगी। यह समुद्र तल से 32 मीटर नीचे है और इसमें दबाव तथा प्राकृतिक वायुदाब है। इसके लिए एनएटीएम और टीबीएम दोनों तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। सुरंग में किसी भी तरह की पानी की लीकेज रोकने के लिए विशेष मेम्ब्रेन को लगाया गया है । इस सुरंग के निर्माण के लिए टीबीएम मशीन का इस्तेमाल किया गया है और यह एक महीने में 300 से 400 मीटर खुदाई करने में सक्षम है।
गुजरात के सूरत स्टेशन की लंबाई 420 मीटर रखी गई है और इस स्टेशन पर 2033 तक प्रतिदिन करीब आठ हजार यात्रियों के आने का अनुमान है जो 2053 तक बढ़कर 23 हजार यात्री प्रतिदिन होने की उम्मीद है।इस कॉरिडोर में ट्रैक्शन, विद्युतीकरण, रेल अवसंरचना तथा परिचालन से संबंधित अत्याधुनिक प्रणालियों को शामिल किया गया है। पूरे कॉरिडोर में 20,000 से अधिक ओवरहेड विद्युतीकरण प्रणाली (ओएचई) ओएचई मास्ट लगाए जाने की योजना है। दो गुणा 25 केवी ओवरहेड ट्रैक्शन प्रणाली जापानी शिनकान्सेन-स्टाइल की ओएचई कैंटिलीवर डिज़ाइन पर आधारित है।
ट्रैक्शन एवं विद्युत आपूर्ति में इस परियोजना में 12 ट्रैक्शन सबस्टेशन, दो डिपो ट्रैक्शन सबस्टेशन तथा 16 वितरण सबस्टेशन शामिल हैं। इसकी ट्रैक प्रणाली में भारत में पहली बार जे-स्लैब बैलेस्टलेस ट्रैक टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जा रहा है। इसके लिए समर्पित ट्रैक कंस्ट्रक्शन बेस विकसित किए जा रहे हैं। ये पटरियों, ट्रैक स्लैब, मशीनरी तथा अन्य उपकरणों के भंडारण और संचालन के लिए हैं। इसके लिए तीन रोलिंग स्टॉक डिपो गुजरात के साबरमती और सूरत में तथा महाराष्ट्र के ठाणे में बनाए जा रहे हैं।
मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना भारत की परिवहन यात्रा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह भविष्य के विस्तार के लिए आवश्यक ज्ञान, क्षमताएं और औद्योगिक इकोसिस्टम का निर्माण कर रही है। भारत इस ऐतिहासिक कॉरिडोर से प्राप्त अनुभव का उपयोग कर रहा है। यह भविष्य के हाई-स्पीड रेल विस्तार के लिए एक विस्तार योग्य दृष्टिकोण स्थापित कर रहा है। यह दृष्टिकोण देश भर में आने वाले नए हाई-स्पीड रेल मार्गों को समर्थन दे सकता है। जैसे-जैसे नए कॉरिडोर विकसित होंगे, यह आधार बेहतर कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने में मदद करेगा। यह यात्रा समय को कम करने और दीर्घकालिक आर्थिक विकास में भी योगदान देगा।
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