नाग पंचमी हर साल सावन महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। इस साल नाग पंचमी 17 अगस्त, सोमवार को मनाई जा रही है। इस दिन भक्त नाग देवता को दूध, लाई, फल और फूल अर्पित करते हैं। मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करने से कालसर्प दोष से मुक्ति मिल सकती है। खास बात यह है कि इस साल नाग पंचमी के दिन ही सावन का सोमवार भी पड़ रहा है।
ज्योतिष के नजरिए से नाग पंचमी और सावन सोमवार का एक साथ पड़ना बेहद खास और शुभ माना जा रहा है। ऐसे में भक्तों को नाग पंचमी के दिन नाग देवता के साथ भगवान शिव की भी पूजा करनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और तरक्की के रास्ते खुलते हैं। आइए जानते हैं कि नाग पंचमी क्यों मनाई जाती है और इसके पीछे की पौराणिक कहानी क्या है।
नाग पंचमी की पौराणिक कहानी क्या है?
पौराणिक कथा के अनुसार, अभिमन्यु के पुत्र और कुरु वंश के राजा परीक्षित को ऋषि शमिक के श्राप के कारण तक्षक नाग ने डस लिया था। अपने पिता की मौत की खबर सुनकर उनके पुत्र राजा जनमेजय बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने दुनिया के सभी सांपों को खत्म करने के लिए एक बड़े 'सर्प सत्र महायज्ञ' का आयोजन करने का फैसला किया।
राजा जनमेजय के सर्प सत्र यज्ञ के दौरान ऋषियों द्वारा मंत्रों का जाप किया गया। इन मंत्रों के प्रभाव से दुनिया के सभी सांप यज्ञ स्थल पर खिंचे चले आए और यज्ञ की आग में जलने लगे। अपनी जान बचाने के लिए तक्षक नाग ने देवराज इंद्र की शरण ली और उनके सिंहासन से लिपट गया।
इसके बाद जब ऋषियों ने मंत्रों का जाप कर तक्षक नाग को भगवान इंद्र सहित यज्ञ की अग्नि में बुलाना शुरू किया, तो स्वर्ग लोक में भी हलचल मच गई।
उस समय देवताओं के कहने पर आस्तिक मुनि राजा जनमेजय के यज्ञ स्थल पर पहुंचे। आस्तिक मुनि देवी मनसा के पुत्र और बहुत ज्ञानी ऋषि थे। उन्होंने अपनी बुद्धि और बातों से राजा जनमेजय को प्रसन्न कर दिया। इससे खुश होकर राजा ने आस्तिक मुनि से कोई भी वरदान मांगने को कहा।
तब आस्तिक मुनि ने राजा जनमेजय से सर्प सत्र यज्ञ तुरंत रोकने और सांपों की रक्षा करने का वरदान मांगा। आस्तिक मुनि के कहने पर राजा जनमेजय ने यज्ञ रोक दिया। इस तरह तक्षक नाग समेत बाकी सांपों की जान बच गई।
मान्यता है कि जिस दिन आस्तिक मुनि ने सर्प सत्र यज्ञ रुकवाकर सांपों की जान बचाई और उन्हें राहत देने के लिए उन पर कच्चा दूध और पानी डाला, वह सावन महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी। इसके बाद सांपों ने आस्तिक मुनि को आशीर्वाद दिया और कहा कि जो भी व्यक्ति इस तिथि पर नाग देवता की पूजा करेगा, उसे सांपों के डर से सुरक्षा मिलेगी। तभी से सावन शुक्ल पंचमी के दिन नाग पंचमी मनाने की परंपरा चली आ रही है।
(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)