
New Year 2026: वर्ष 2026 के इस्तकबाल के लिये पूरी दुनिया में गर्मजोशी सातवें आसमान पर है मगर गणितज्ञों की माने तो ब्रह्मांडीय नियमों के अनुसार तीन जनवरी को साल का पहला दिन होगा। ब्रह्मांडीय घड़ी और मानव-निर्मित कैलेंडर के बीच के इसी गणित में उलझकर दुनिया भर में अंततः मनुष्य द्वारा बनाए गए कैलेंडर को प्राथमिकता दे दी गई और एक जनवरी को नए साल का पहला दिन घोषित कर दिया गया जबकि सूर्य के समीपक बिंदु (पेरिहेलियन) पर पहुंचने के कारण वास्तविक नया साल इस वर्ष तीन जनवरी को पड़ रहा है। इस दिन पृथ्वी सूर्य से 147,103,637 किलोमीटर की दूरी पर होगी, जो उसकी पूरी परिक्रमा के दौरान सबसे कम दूरी है और इसकी अधिकतम दूरी से करीब 50 लाख किलोमीटर कम है।
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के प्रति कुलपति एवं गणित विभाग में वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. मृदुल गुप्ता ने यह रोचक जानकारी 'यूनीवार्ता' से साझा करते हुये कहा कि क्या हो अगर साल वास्तव में तब शुरू ही नहीं होता, जब हम उसे शुरू मानते हैं। क्या हो अगर, चुपचाप और बिना किसी धूमधाम के, असली नया साल उस समय आ जाए जब हम सेकंड गिनने, ग्लास टकराने और कैलेंडर के पन्ने पलटने में व्यस्त हों।
डॉ. गुप्ता ने बताया कि हर साल पृथ्वी सूरज के चारों ओर अपनी यात्रा में एक सूक्ष्म लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंचती है, जब वह अपनी कक्षा में उस तारे के सबसे करीब होती है जो जीवन को संभव बनाता है। इस पल को न तो कोई आतिशबाजी चिह्नित करती है और न ही कोई सोशल मीडिया काउंटडाउन इसकी घोषणा करता है। फिर भी, ब्रह्मांडीय दृष्टि से यह क्षण बेहद मायने रखता है, क्योंकि इसी बिंदु पर पृथ्वी एक चक्कर पूरा कर अगले की शुरुआत करती है।
उन्होंने कहा कि यह विचार स्वाभाविक रूप से एक सवाल खड़ा करता है, क्या यह उस नए साल से अधिक वास्तविक और सच्चा नया साल नहीं हो सकता, जिसे हम परंपरा के अनुसार मनाते आए हैं। डॉ. गुप्ता ने बताया कि ब्रह्मांड अपना समय स्वयं तय करता है। वह महीनों, हफ्तों या सलीके से बांटे गए वर्षों को नहीं पहचानता। उसके लिए समय गति, कक्षाओं, चक्रों और गुरुत्वाकर्षण से मापा जाता है। पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर की कक्षा पूर्ण गोल नहीं बल्कि अंडाकार है जिसके कारण हर साल एक ऐसा क्षण आता है जब वह सूर्य के सबसे करीब होती है। ब्रह्मांडीय नजरिए से यह एक प्राकृतिक 'रीसेट' जैसा है, शुरुआत की रेखा पर एक शांत वापसी।
गणितज्ञ ने स्पष्ट किया कि सूर्य के सबसे करीब होने के बावजूद पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध का सर्दियों में होना अक्सर सहज बोध को भ्रमित करता है। आमतौर पर यह सवाल उठता है कि यदि पृथ्वी सूर्य के सबसे पास होती है तो यह वर्ष का सबसे गर्म समय क्यों नहीं होता? इसका कारण दूरी नहीं, बल्कि पृथ्वी का अपनी धुरी पर 23.5 डिग्री का झुकाव है, जो मौसम को सूर्य से दूरी की तुलना में कहीं अधिक प्रभावित करता है।
डॉ. गुप्ता के अनुसार कैलेंडर इसलिए प्रभावी होते हैं क्योंकि हम सभी सामूहिक रूप से उन पर सहमत होते हैं। जब पूरी दुनिया एक ही समय पर साल के खत्म होने और शुरू होने में विश्वास करती है, तो उस विश्वास को सामाजिक शक्ति मिलती है। लोग एक साथ नई योजनाएं बनाते हैं, पुराने मतभेद भूलते हैं और उम्मीद के साथ आगे बढ़ते हैं। इसी साझा ठहराव में उत्सव का आनंद निहित होता है, जबकि सौर टर्निंग पॉइंट (निर्णायक पड़ाव) अक्सर नजरअंदाज रह जाता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य वास्तव में दो घड़ियों के साथ जीता है, एक इंसान द्वारा बनाई गई, जो डेडलाइन, शेड्यूल और रिमाइंडर से चलती है, और दूसरी ब्रह्मांडीय, जो गति और गुरुत्वाकर्षण से संचालित होती है। हम अक्सर पहली घड़ी पर भरोसा करते हैं और दूसरी को भूल जाते हैं, जबकि हमारा शरीर, मौसम और ग्रह अब भी उसी प्राचीन लय का अनुसरण करते हैं। एक घड़ी जीवन को व्यवस्थित करती है, दूसरी हमें अंतरिक्ष में हमारी वास्तविक स्थिति का एहसास कराती है।
डॉ. मृदुल गुप्ता का कहना है कि सूरज कोई निमंत्रण नहीं भेजता और पृथ्वी तालियों का इंतज़ार नहीं करती। वह क्षण आता है, अपना काम करता है और आगे बढ़ जाता है। शायद यही इसका सबसे बड़ा संदेश है, हर शुरुआत काउंटडाउन के साथ नहीं आती और हर नवीनीकरण को नाम देने की ज़रूरत नहीं होती।
उन्होंने कहा कि कभी-कभी सबसे अर्थपूर्ण नया साल वही होता है, जो तब भी घटित होता है जब हम उसे देख रहे हों या नहीं। वह हमें याद दिलाता है कि हम केवल कैलेंडर की तारीखों से नहीं गुजर रहे, बल्कि एक जीवित ग्रह पर अंतरिक्ष की यात्रा कर रहे हैं, एक तारे के चारों ओर घूमते हुए, समय की गिनती से कहीं पुरानी कहानी का हिस्सा बनकर। यह एहसास किसी जश्न का नहीं, बल्कि एक दुर्लभ चीज़ की मांग करता है और वह है हमारा ध्यान।
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