Paush Putrada Ekadashi Vrat Katha: 30 या 31 दिसंबर, जानें किस दिन है पुत्रदा एकादशी? यहां पढ़ें व्रत कथा

Putrada Ekadashi 2025: एकादशी व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, पारण द्वादशी तिथि में ही करना चाहिए और हरि वासर के दौरान पारण नहीं करना चाहिए।

Manali Rastogi
अपडेटेड29 Dec 2025, 12:13 PM IST
पौष पुत्रदा एकादशी व्रत के नियम, शुभ मुहूर्त और शुभ संयोग, उपाय
पौष पुत्रदा एकादशी व्रत के नियम, शुभ मुहूर्त और शुभ संयोग, उपाय

शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि से जुड़ा यह दिन हिंदू पंचांग में बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। भक्त व्रत रखते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। हालांकि तारीख को लेकर भ्रम है। कुछ लोग इसे 30 दिसंबर बता रहे हैं, तो कुछ 31 दिसंबर। द्रिक पंचांग के अनुसार, एकादशी 30 दिसंबर से शुरू होकर 31 दिसंबर की सुबह तक रहेगी।

जानिए शुभ मुहूर्त

  • एकादशी तिथि शुरू: 30 दिसंबर 2025, सुबह 7:50 बजे
  • एकादशी तिथि समाप्त: 31 दिसंबर 2025, सुबह 5:00 बजे
  • पारण (व्रत तोड़ने का समय): 31 दिसंबर, दोपहर 1:48 बजे से 4:00 बजे तक

जानिए पूजा विधि

इस दिन व्रत रखने से समृद्धि आती है। सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, साफ कपड़े पहनें। घर के मंदिर को साफ करें और भगवान विष्णु को धूप-अगरबत्ती अर्पित करें। प्रसाद चढ़ाएं और प्रार्थना करें।

एकादशी व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, पारण द्वादशी तिथि में और हरि वासर के समय नहीं करना चाहिए। व्रत तोड़ने का सबसे अच्छा समय प्रातःकाल माना गया है, दोपहर में पारण से बचें।

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जो भक्त भगवान विष्णु की विशेष कृपा चाहते हैं, वे दोनों दिन एकादशी व्रत कर सकते हैं। इससे पाप नष्ट होते हैं और आत्मा शुद्ध होती है। इस दिन जरूरतमंदों को भोजन कराना या गायों को चारा खिलाना शुभ माना जाता है। कुछ भक्त पंचामृत से भगवान विष्णु का अभिषेक भी करते हैं, जिससे बाधाएं दूर होती हैं।

जानिए मंत्र

ॐ नमो नारायणाय!!

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय!!

यहां पढ़िए पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा

एक नगर में सुकेतुमान नाम के राजा रहते थे। उनकी पत्नी का नाम शैव्या था। राजा के कोई संतान नहीं थी, इसलिए वे दोनों बहुत दुखी रहते थे। राजा को चिंता रहती थी कि उनके बाद राज्य कौन संभालेगा और उनके जाने के बाद उनका अंतिम संस्कार और मोक्ष कैसे होगा।

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एक दिन राजा जंगल घूमने गए। वहां उन्होंने देखा कि पशु-पक्षी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ खुशी से रह रहे हैं। यह देखकर राजा और भी दुखी हो गए और सोचने लगे कि इतने अच्छे कर्म करने के बाद भी उन्हें संतान क्यों नहीं मिली।

कुछ समय बाद राजा को प्यास लगी। पानी की तलाश में वे नदी के किनारे बने ऋषियों के आश्रम पहुंचे। राजा ने सभी ऋषियों को प्रणाम किया। राजा की नम्रता से ऋषि बहुत प्रसन्न हुए और बोले कि वह कोई वर मांग सकते हैं। राजा ने कहा कि उनके पास सब कुछ है, लेकिन संतान नहीं है, इसी कारण वे दुखी हैं।

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ऋषियों ने कहा कि भगवान की कृपा से ही राजा वहां आए हैं। उन्होंने राजा को पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी। राजा ने पूरे नियम से व्रत किया। कुछ समय बाद रानी गर्भवती हुईं और उन्हें एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई। अंत में राजा को मोक्ष भी मिला। इस तरह पुत्रदा एकादशी व्रत का महत्व और भी बढ़ गया।

(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)

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